बिजनेस
Cosmetic Queen Success Story: विनीता सिंह ने करोड़ रुपये की नौकरी छोड़कर उद्यमिता का रास्ता चुना. शुरुआती बिजनेस में असफलता और कॉस्मेटिक के लिए फंडिंग की लंबी जद्दोजहद के बाद उन्होंने ऐसा ब्रांड बनाया जिसकी FY24 आय 505.1 करोड़ रुपये रही.
जब कोई व्यक्ति नौकरी छोड़कर अपना बिजनेस शुरू करने की सोचता है, तो सबसे बड़ा सवाल अक्सर पैसा नहीं बल्कि डर होता है. अगर कारोबार नहीं चला तो क्या होगा. अगर निवेशक पैसा नहीं देंगे तो क्या होगा. और अगर पहली कोशिश फेल हो गई तो क्या दोबारा शुरुआत की जा सकती है.
विनीता सिंह की कहानी इन सवालों का काफी सीधा जवाब देती है. उन्होंने आईआईटी मद्रास और आईआईएम अहमदाबाद से पढ़ाई के बाद करीब 1 करोड़ रुपये के जॉब ऑफर को ठुकराकर उद्यमिता का रास्ता चुना. फोर्ब्स इंडिया के मुताबिक, उनका पहला स्टार्टअप Quetzal बुरी तरह असफल हुआ था. इसके बाद उन्होंने 2012 में Fab Bag शुरू किया और बाद में शुगर कॉस्मेटिक्स की नींव रखी.
यानी शुगर की कहानी किसी ऐसे उद्यमी की कहानी नहीं है जिसने पहली कोशिश में ही सफलता हासिल कर ली. असली कहानी यह है कि एक फेलियर के बाद अगली कोशिश किस तरह ज्यादा समझदारी के साथ की गई.
विनीता सिंह के शुरुआती स्टार्टअप Quetzal का बिजनेस मॉडल सफल नहीं हो सका. फोर्ब्स इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यह कारोबार ऐसा क्षेत्र था जहां कंपनियां कीमत के आधार पर मुकाबला कर रही थीं और बिजनेस में अलग पहचान बनाना मुश्किल हो गया था. यही अनुभव आगे उनके लिए एक अहम सीख बना.
इसके बाद 2012 में विनीता सिंह और कौशिक मुखर्जी ने Fab Bag शुरू किया. यह महिलाओं के लिए ब्यूटी प्रोडक्ट्स का सब्सक्रिप्शन बिजनेस था. इंडिया टुडे के मुताबिक, इस कारोबार ने करीब 2 लाख कस्टमर्स तक पहुंच बनाई.
यहीं से एक बड़ा बिजनेस सबक निकलता है. पहला आइडिया फेल होना और खुद फेल हो जाना एक ही बात नहीं है. कारोबार में असफलता अक्सर यह बताती है कि बाजार किस चीज के लिए पैसा देने को तैयार है और किस चीज के लिए नहीं.
शुगर कॉस्मेटिक्स की शुरुआत 2015 में विनीता सिंह और कौशिक मुखर्जी ने की. लेकिन यहां भी सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ प्रोडक्ट बनाना नहीं थी. पैसा जुटाना भी उतना ही मुश्किल था. योरस्टोरी को दिए एक इंटरव्यू में विनीता सिंह ने बताया था कि शुगर को फंडिंग मिलने में लंबा समय लगा. एक समय कंपनी को भारत में अपने लिपस्टिक प्रोडक्ट लाने के लिए करीब 1 करोड़ रुपये की जरूरत थी. इंडिया क्वोशिएंट ने यह रकम उपलब्ध कराई और शुरुआती पूंजी को बेहद सावधानी से इस्तेमाल किया गया.
मनीकंट्रोल की रिपोर्ट में भी बताया गया है कि शुगर के शुरुआती दौर में कंपनी लगभग बंद होने की स्थिति तक पहुंच गई थी. टीम और वेयरहाउस को छोटा करना पड़ा था. यही हिस्सा नए कारोबार शुरू करने वालों के लिए सबसे ज्यादा काम का है. फंडिंग मिलना अपने आप में सफलता नहीं है. असली सवाल यह है कि उस पैसे से कितना समय खरीदा जा सकता है, कितने कस्टमर बनाए जा सकते हैं और बिजनेस को कमाई के रास्ते पर कितना आगे ले जाया जा सकता है.
शुगर की शुरुआती कहानी का एक कम चर्चा वाला पहलू यह है कि कंपनी को शुरुआती वर्षों में जरूरत से ज्यादा पूंजी नहीं मिली. विनीता सिंह ने मनीकंट्रोल से बातचीत में कहा था कि बहुत ज्यादा कैपिटल जल्दी मिल जाना भी खराब आदतें पैदा कर सकता है. यानी किसी नए उद्यमी के लिए सबसे पहली प्राथमिकता बड़ी फंडिंग हासिल करना नहीं होनी चाहिए. पहले यह समझना जरूरी है कि ग्राहक वास्तव में क्या खरीदना चाहता है.
यह सीख छोटे कारोबारियों के लिए और भी महत्वपूर्ण है. अगर कोई व्यक्ति घर से फूड बिजनेस, सर्विस बिजनेस, ऑनलाइन प्रोडक्ट या छोटा मैन्युफैक्चरिंग कारोबार शुरू करना चाहता है, तो शुरुआत में पूरा पैसा लगाने के बजाय छोटे स्तर पर बाजार को टेस्ट करना जोखिम घटा सकता है. शुगर ने भी पहले प्रोडक्ट और ग्राहक के बीच कनेक्शन को मजबूत किया और फिर कारोबार को बड़े स्तर पर फैलाया.
शुगर कॉस्मेटिक्स अब सिर्फ एक ऑनलाइन ब्यूटी ब्रांड नहीं है. कंपनी ने ऑनलाइन के साथ ऑफलाइन नेटवर्क भी खड़ा किया है. वेंचर इंटेलिजेंस के मुताबिक, कंपनी की भारत में 45,000 से ज्यादा रिटेल स्टोर्स में मौजूदगी बताई गई है.
कंपनी की वित्तीय तस्वीर भी इसके सफर को समझने में मदद करती है. Inc42 के मुताबिक, FY24 में शुगर कॉस्मेटिक्स की ऑपरेटिंग रेवेन्यू करीब 505.1 करोड़ रुपये रही, जो FY23 के 420.3 करोड़ रुपये से करीब 20 फीसदी ज्यादा थी. हालांकि इसी दौरान कंपनी को 67.6 करोड़ रुपये का नेट लॉस भी हुआ.
इसका मतलब साफ है. 500 करोड़ रुपये से ज्यादा की आय वाला कारोबार भी हर साल मुनाफे में हो, यह जरूरी नहीं. बड़े बिजनेस में रेवेन्यू, खर्च, कैश फ्लो और मुनाफा अलग अलग चीजें हैं. यही वह बात है जिसे नया उद्यमी अक्सर नजरअंदाज कर देता है. सिर्फ बिक्री बढ़ना सफलता नहीं है. यह देखना भी जरूरी है कि हर बिक्री के बाद वास्तव में कितना पैसा बच रहा है.
शुगर ने आगे बढ़ने के लिए लगातार निवेशकों से पूंजी जुटाई. दिसंबर 2024 में कंपनी ने करीब 38 करोड़ रुपये यानी 4.5 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई थी. इसमें मौजूदा निवेशकों की भागीदारी थी. उस समय कंपनी ने बताया था कि पूंजी का इस्तेमाल Quench Botanics को बढ़ाने और शुगर POP की डिस्ट्रीब्यूशन पहुंच बढ़ाने के लिए किया जाना था.
Inc42 के मुताबिक, कंपनी ने 2024 तक 85 मिलियन डॉलर से ज्यादा की कुल फंडिंग जुटाई थी और बाद की फंडिंग के साथ यह आंकड़ा और बढ़ा. यहां नए कारोबारियों के लिए सबसे बड़ी सीख निकलती है. निवेश मिलने के बाद पैसा सिर्फ ऑफिस, विज्ञापन या टीम बढ़ाने में खर्च करना पर्याप्त नहीं है. हर रुपये का इस्तेमाल उस जगह होना चाहिए जहां उससे कारोबार के अगले स्तर तक पहुंचने की संभावना सबसे ज्यादा हो.
विनीता सिंह की कहानी को सिर्फ 1 करोड़ रुपये की नौकरी छोड़ने वाली कहानी के तौर पर देखना अधूरा होगा. इसका ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि पहला कारोबार सफल नहीं हुआ, फिर भी उन्होंने उद्यमिता छोड़ी नहीं.
शुगर तक पहुंचने के पहले उन्हें बाजार, ग्राहक, प्रोडक्ट और पूंजी की चुनौतियों से गुजरना पड़ा. इसी वजह से उनका सफर उन लोगों के लिए ज्यादा प्रासंगिक बन जाता है जो पहली कोशिश में कारोबार नहीं चला पाते.
फेलियर के बाद दो रास्ते होते हैं. पहला, नुकसान को अपनी क्षमता का प्रमाण मानकर रुक जाना. दूसरा, यह देखना कि गलती कहां हुई और अगली कोशिश में क्या बदलना है. विनीता सिंह की कहानी दूसरे रास्ते की मिसाल देती है.
विनीता सिंह की यात्रा से सबसे व्यावहारिक सीख यह है कि बिजनेस शुरू करने से पहले फंडिंग को मंजिल नहीं बल्कि साधन समझना चाहिए. पहले यह देखना जरूरी है कि ग्राहक मौजूद है या नहीं, प्रोडक्ट की जरूरत कितनी वास्तविक है, लागत कितनी आएगी और ग्राहक से दोबारा कमाई कैसे होगी. इसके बाद फंडिंग की जरूरत तय होनी चाहिए. अगर छोटा बिजनेस कम पूंजी में शुरू होकर ग्राहक से शुरुआती कमाई कर सकता है तो पहले बाजार को समझना ज्यादा बेहतर हो सकता है.
शुगर का सफर यह भी दिखाता है कि बड़ा ब्रांड एक दिन में नहीं बनता. शुरुआती असफलता, सीमित पूंजी, बाजार का संदेह और कैश की कमी के बीच भी अगर बिजनेस मॉडल को लगातार सुधारा जाए तो वही सफर आगे चलकर बड़े कारोबार में बदल सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि फेलियर बिजनेस का अंत नहीं होता. कई बार वही फेलियर अगली कोशिश के लिए सबसे महंगा लेकिन सबसे उपयोगी सबक बन जाता है.
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