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India anti drone market growth:15 अगस्त पर लाल किले की सुरक्षा में एंटी ड्रोन सिस्टम की तैनाती भारत के तेजी से बढ़ते counter-drone बाजार की झलक देती है. Kotak ने अगले दशक में 3.5-4.5 अरब डॉलर की मांग का अनुमान लगाया है, जबकि Motilal Oswal ने पांच साल में ₹12,000 करोड़ का अवसर बताया था.
15 अगस्त को लाल किले की सुरक्षा सिर्फ हजारों बंदूकें और सीसीटीवी ट्रैक तक सीमित नहीं रहने वाली है. इस बार स्काई से आने वाले खतरे पर भी खास नजर है और इसके लिए एंटी-साम्राज्य सिस्टम स्थापित किए गए हैं. दिल्ली में होने वाली यह सुरक्षा तैयारी एक ऐसे डिफेंस बिजनेस की तरफ से जारी की जा रही है, जिसकी मांग आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ सकती है. कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के अनुमान के मुताबिक भारत में अगले 10 साल में काउंटर बेंचमार्क सिस्टम की मांग करीब 3.5 से 4.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है.
लाल किले के ऊपर ड्रोन पर नजर क्यों जरूरी हो गई
दिल्ली पुलिस ने 15 अगस्त की सुरक्षा व्यवस्था में एंटी डायाफ्राम सिस्टम की जानकारी दी है. उत्तर दिल्ली के डीसीपी राजा बांठिया के मुताबिक सुरक्षा तैनातियों में 15,000 से 20,000 सुरक्षाकर्मी, पैरामिलिट्री डिपो, एनएसजी स्नाइपर्स और 1,000 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरे शामिल हैं. लेकिन यह पूरा डिज़ाइन एक नए आसमानी आसमान की निगरानी का है.
आज का दिन पहले की तरह सिर्फ सेना या बड़े पैमाने पर सीमित तकनीक नहीं हैं. कम कीमत वाले महाराजाधिराज आसानी से उपलब्ध हैं और इसी वजह से एयरपोर्ट, पावर प्लांट, सैन्य उद्यम, सरकारी प्रतिष्ठान और सार्वजनिक बड़े कार्यक्रमों के आसपास इस्तेमाल को लेकर सुरक्षा चुनौती प्रमुख है. यानि कि लाल किले पर एंटी आर्काइव सिस्टम की सिर्फ 15 अगस्त की सुरक्षा का मामला नहीं है. यह बताता है कि आने वाले समय में जमीन के साथ-साथ आकाश की सुरक्षा भी एक बड़ा व्यवसाय बनने वाली है.
काउंटर-मानव रहित विमान प्रणाली यानी सी-यूएएस में ऐसे सिस्टम शामिल होते हैं जो किसी संदिग्ध या डूबे हुए व्यक्ति को पहले खोजते हैं, उसकी सूची को ट्रैक और पहचानते हैं और उसे ठीक करने की आवश्यकता होती है.
कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के मुताबिक भारत में अगले एक दशक में काउंटरब्रांड सिस्टम की मांग 3.5 से 4.5 अरब डॉलर तक हो सकती है. यह अनुमान भारत में डूबते समुद्र तट पर इस्तेमाल किया गया और सैन्य और सुरक्षा इंजीनियरों से बना है.
इससे पहले मोतीलाल ओसवाल ने जुलाई 2024 में भारत के काउंटर-ड्रोन बाजार का पता लगाने योग्य अवसर करीब ₹120 अरब यानि ₹12,000 करोड़ का आंकड़ा था. रिपोर्ट में करीब 1,200 सिस्टम की जरूरत बताई गई और हर सिस्टम की कीमत करीब ₹8 करोड़ से ₹15 करोड़ के बीच बताई गई थी. रिपोर्ट में इस बाजार के लिए करीब 28 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान भी दिया गया था.
इसका मतलब साफ़ है. पहले जहां साम्राज्य पर मुख्य रूप से निगरानी और हमलों की तकनीक के रूप में देखा जा रहा था, वहीं अब दमन पर रोक वाली तकनीक भी डिफेंसिव इंडस्ट्री का अलग और बड़ा कारोबार बन रही है.
काउंटर-ड्रोन सिस्टम कोई एक मशीन नहीं है. सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और महाराजा को निष्क्रिय करने वाले अलग-अलग सिस्टम शामिल हो सकते हैं.
कोटक के अध्ययन में एंटी-आरपीए डिफेंस सिस्टम, हार्ड-किल काउंटर-यूएएस सिस्टम, एंटी-ड्रोन फायर कंट्रोल सिस्टम, स्मार्ट एडेप्टिव जैमर, यूएवी आधारित जैमर और सामरिक उच्च-ऊर्जा लेजर सिस्टम जैसे वर्गीकरण शामिल हैं.
इनमें हार्ड-किल सिस्टम सबसे बड़ी कीमत वाले खंड में दिखाई देते हैं. कोटक के अनुमान के अनुसार 200 से 225 ऐसे सिस्टम की जरूरत हो सकती है और इसका बाजार करीब 2 से 3 अरब डॉलर बताया गया है. यूएवी आधारित जैमर की संख्या सबसे अधिक हो सकती है. अनुमान के मुताबिक करीब 1,200 से 1,300 सिस्टम की जरूरत पड़ सकती है और इसका बाजार करीब 0.4 से 0.5 अरब डॉलर का हो सकता है.
एंटी डाइजेस्ट फायर कंट्रोल सिस्टम के लिए 1,200 से 1,250 सिस्टम की मांग का अनुमान है, जिसका बाजार मूल्य 0.8 से 1 अरब डॉलर बताया गया है. वहीं सामरिक उच्च-ऊर्जा लेजर सिस्टम की संख्या कम है, लेकिन कीमत काफी अधिक हो सकती है. कोटक ने 20 से 30 ऐसे सिस्टम की पेशकश की मांग की और करीब 0.6 से 0.8 अरब डॉलर के बाजार का अनुमान लगाया है.
यानि इस व्यवसाय में केवल अधिकांश थोक वाली कंपनी का ही उत्पादन है, न कि स्टॉक का. आईआईटी, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर, जैमिंग और ऊर्जा आधारित उद्यमों से जुड़ी कंपनियों के लिए भी अवसर बन सकते हैं.
भारत में पिछले कुछ वर्षों से रक्षा उत्पादन में बढ़ोतरी पर जोर दिया जा रहा है. काउंटर-ड्रोन क्षेत्र में भी येशी रणनीति दिखाई देती है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की खरीद व्यवस्था ने घरेलू स्टॉक एक्सचेंज में विदेशी निवेशकों की सीधी भूमिका सीमित कर दी है. रिपोर्ट में इजराइल की आईएआई और राफेल और अमेरिका की आरटीएक्स जेट कंपनी का जिक्र है. इसका सबसे बड़ा लाभ भारतीय रक्षा संगठनों को मिल सकता है.
डीआरडीओ स्वदेशी सिस्टम के विकास में अहम भूमिका निभा रहा है, जबकि भारत इलेक्ट्रॉनिक्स यानी बीईएल स्केल बड़े पैमाने पर निर्माण से जुड़ा है. इसके साथ निजी क्षेत्र में ज़ेन टेक्नोलॉजीज, पारस डिफेंस, अदानी डिफेंस और बिग बैंग बूम बिल्डर्स भी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं.
कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के अनुसार ज़ेन टेक्नोलॉजीज, पारस डिफेंस और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स भारत के काउंटर-ड्रोन सिस्टम बाजार में प्रमुख लोग शामिल हो सकते हैं. ज़ेन टेक्नोलॉजीज डिटेक्टर, रडार, जैमर और हार्ड-किल सिस्टम पर काम करती है. बीईएल एकीकृत ड्रोन डिटेक्शन और इंटरडिक्शन सिस्टम विकसित कर रहा है. पारस डिफेंस जैमर, डिटेक्टर और एकीकृत सिस्टम के क्षेत्र में मौजूद है.
सोलर इंडस्ट्रीज और अदानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस में ड्रोन और काउंटर-ड्रोन दोनों शामिल हैं. डेटा पैटर्न माइक्रो-डॉपलर रडार तकनीक पर काम कर रही है. इसके अलावा आइडियाफोर्ज, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और एक्सिसकेड्स टेक्नोलॉजीज भी इस व्यापक इकोसिस्टम का हिस्सा हैं. ज़ेन टेक्नोलॉजीज के अपने आधिकारिक अपडेट में भी 2026 में एंटी-ड्रोन और स्मार्ट बॉर्डर उत्पादों की जानकारी दी गई है, जो बताती है कि यह सेगमेंट अब केवल नए भविष्य की अवधारणा नहीं बल्कि सक्रिय उत्पाद विकास का क्षेत्र बन गया है.
पहली नज़र में काउंटर-ड्रोन बाज़ार में किसी परिवार से बातचीत का विषय नहीं दिखता. लेकिन इसका असर शोरूम के रूप में काफी बड़ा हो सकता है.
रोजगार और विनिर्माण पर सबसे पहले असर पड़ सकता है. अगर भारत में हजारों करोड़ रुपये के काउंटर-ड्रोन सिस्टम की मांग है तो केवल बड़ी डिफेंस कंपनियों को ही काम नहीं मिलेगा. इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, सॉफ्टवेयर, बैटरी, कम्युनिकेशन और प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी छोटी-बड़ी कंपनियों के ऑर्डर भी बढ़ सकते हैं.
दूसरा प्रभाव भारत के रक्षा सेवा पर हो सकता है. अगर घरेलू उद्योग का पता लगाने, जैमिंग और हार्ड-किल तकनीक में क्षमता बढ़ाई जाती है तो आने वाले वर्षों में कुछ विदेशी स्टार्टअप पर स्टार्टअप कम करने की बोली लगेगी.
तीसरा प्रभाव सुरक्षा का है. एयरपोर्ट, बिजली संयंत्र, महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठान और बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम ऐसे क्षेत्र हैं जहां सैन्य क्षेत्र के बाहर काउंटर-ड्रोन सिस्टम की मांग में भी वृद्धि हो सकती है. यानी ये सिर्फ सेना के लिए तकनीक जाने वाली तकनीक नहीं है. धीरे-धीरे यह महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा का हिस्सा भी बन सकता है.
इस पूरे बाजार की सबसे दिलचस्प स्थिति यह है कि साम्राज्य की कीमत घटने के साथ-साथ उसकी रोकथाम की लागत और तकनीक की जरूरत बढ़ रही है. एक सस्ता साज़िश और किसी संवेदनशील इलाके में पहुंच सकता है तो उसकी खोज के लिए मेगा राडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध अवरोधन प्रणाली की आवश्यकता हो सकती है. यही कारण है कि आने वाले समय में ड्रोन उद्योग की वृद्धि के साथ-साथ काउंटर-ड्रोन उद्योग की मांग भी बढ़ सकती है.
वैश्विक बाजार भी इसी दिशा में बढ़ रहा है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट में ग्लोबल सी-यूएएस मार्केट को 2025 में करीब 6.6 अरब डॉलर का अनुमान लगाया गया है, जबकि 2030 तक करीब 20.3 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. ([फाइनेंशियल एक्सप्रेस][3])
भारत के लिए यहां सिर्फ घरेलू सुरक्षा की जरूरत नहीं है, बल्कि भविष्य में निर्यात का मौका भी बन सकता है. यदि भारतीय उद्यमियों ने कम लागत में विश्वसनीय पहचान, जैमिंग और न्यूट्रलाइजेशन सिस्टम विकसित कर लिया है तो जिन देशों के पास मशीनरी पश्चिमी प्राणलाइसेस की क्षमता सीमित है, वहां भारतीय तकनीक के लिए बाजार खुल सकता है.
काउंटर-ड्रोन बाज़ार का विस्तार विपक्ष और सहयोगियों के लिए भी किया जा सकता है. हालांकि किसी भी कंपनी के बिजनेस में इस सेगमेंट का कितना योगदान होता है और भविष्य में उसे कितना ऑर्डर मिलता है, यह अलग-अलग होता है. इसलिए केवल एंटी-ड्रोन बाजार के अनुमान को देखकर किसी भी शेयर में निवेश का निर्णय लेना सही नहीं होगा.
फिर भी बाजार के लिए संकेत महत्वपूर्ण है. ज़ेन टेक्नोलॉजीज, पारस डिफेंस, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर इंडस्ट्रीज, डेटा पैटर्न और अदानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस एंटरप्राइजेज अलग-अलग स्तर के ड्रोन और काउंटर-ड्रोन इकोसिस्टम से जुड़े हुए हैं. यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी खरीद, घरेलू विनिर्माण नियम, प्रौद्योगिकी विकास और वास्तविक रक्षा आदेश मिलकर इस बाजार की खरीद तय करेंगे.
लाल किले की सुरक्षा में एंटी-बीमार सिस्टम का एक छोटा-सा परिचालन विवरण लग सकता है, लेकिन इसके पीछे भारत के रक्षा बाजार में बड़ा बदलाव छिपा हुआ है. मोतीलाल ओसवाल ने 2024 में पांच साल के लिए करीब ₹12,000 करोड़ का पता योग्य काउंटर-ड्रोन अवसर बताया था. वहीं कोटक के ताजा अनुमान के मुताबिक अगले दशक में भारत की जवाबी ड्रोन डिमांड 3.5 से 4.5 अरब डॉलर तक हो सकती है.
इन दोनों अनुमानों को एक साथ देखने पर तस्वीर साफ होती है. भारत में ड्रोन की कहानी अब सिर्फ ड्रोन तक सीमित नहीं है. डूबो को डूबने, ट्रैक बनाने, जाम करने और जरूरतमंदों को गिराने वाली पूरी इंडस्ट्री तैयार हो रही है. और यही वह बदलाव है जो आने वाले वर्षों में भारत के रक्षा विनिर्माण, रोजगार, प्रौद्योगिकी विकास और रक्षा निर्यात के लिए अहम साबित हो सकता है.
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