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आरबीआई 1 लाख करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचकर बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त पैसा कम करेगा. इसका सीधा मतलब लोन महंगा होना नहीं है, लेकिन बॉन्ड यील्ड और बाजार दरों में बदलाव से होम लोन, पर्सनल लोन और एफडी ब्याज पर असर पड़ सकता है.
नीचे की खबर में एक जरूरी तथ्य-सुधार किया गया है: आरबीआई की 1 लाख करोड़ रुपये की ओएमओ बिक्री की पहली नीलामी 17 सितंबर को है, 16 सितंबर को नहीं. 16 सितंबर को 24,000 करोड़ रुपये के ट्रेजरी बिल की अलग नीलामी है.
सोचिए, बैंकिंग सिस्टम में पैसा अचानक कम होने लगे तो इसका असर सिर्फ शेयर बाजार या बॉन्ड मार्केट तक सीमित नहीं रहता. इसका असर धीरे-धीरे उस व्यक्ति तक पहुंच सकता है जिसकी होम लोन की ईएमआई चल रही है, जो नया पर्सनल लोन लेने वाला है या अपनी एफडी पर बेहतर ब्याज की उम्मीद कर रहा है.
आरबीआई ने सरकारी बॉन्ड बेचकर बैंकिंग सिस्टम से 1 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त लिक्विडिटी सोखने का फैसला किया है. पहली नीलामी 17 सितंबर को 50,000 करोड़ रुपये की होगी और इसके बाद 21 सितंबर और 28 सितंबर को 25,000-25,000 करोड़ रुपये की बिक्री होगी.
इस फैसले को समझने के लिए पहले बैंकिंग सिस्टम की मौजूदा तस्वीर समझना जरूरी है. इस समय बैंकों के पास जरूरत से काफी ज्यादा पैसा मौजूद है. रिपोर्टों के मुताबिक 10.4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की अतिरिक्त लिक्विडिटी बैंकिंग सिस्टम में बनी हुई थी.
इस अतिरिक्त पैसे की वजह विदेशी मुद्रा से जुड़े बड़े प्रवाह समेत कई कारण हैं. रिपोर्ट के मुताबिक एक विशेष फॉरेक्स मोबिलाइजेशन स्कीम के जरिए करीब 127 अरब डॉलर का प्रवाह हुआ, जिससे बैंकिंग सिस्टम में रुपये की उपलब्धता बढ़ी.
जब बैंकों के पास जरूरत से ज्यादा पैसा होता है तो बहुत कम दर पर भी पैसा उपलब्ध कराने की होड़ बढ़ सकती है. यही वजह है कि ओवरनाइट मनी मार्केट की दरें आरबीआई के 5.25 प्रतिशत रेपो रेट से नीचे चली गई थीं. रिपोर्ट के अनुसार वेटेड एवरेज कॉल रेट 5.02 प्रतिशत पर बंद हुआ था. आरबीआई अब इस अतिरिक्त पैसे को सिस्टम से बाहर करके शॉर्ट टर्म ब्याज दरों को अपने पॉलिसी रेट के आसपास रखने की कोशिश कर रहा है.
यह इस खबर का सबसे बड़ा सवाल है और यहां सबसे ज्यादा गलतफहमी हो सकती है. 1 लाख करोड़ रुपये की बॉन्ड बिक्री का मतलब यह नहीं है कि अगले दिन आपकी होम लोन ईएमआई बढ़ जाएगी. खासकर वे होम लोन जिनकी ब्याज दर एक्सटर्नल बेंचमार्क से जुड़ी है, उनके लिए ईएमआई पर सबसे बड़ा असर रेपो रेट जैसे बेंचमार्क में बदलाव से आता है. सिर्फ ओएमओ के जरिए लिक्विडिटी कम करने से लोन रेट अपने आप नहीं बढ़ता.
लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा भी अहम है. आरबीआई जब सरकारी बॉन्ड बेचता है तो बाजार में बॉन्ड की सप्लाई बढ़ती है. इससे बॉन्ड की कीमत और यील्ड पर दबाव पड़ सकता है. 11 सितंबर को आरबीआई की घोषणा के बाद 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 7.035 प्रतिशत तक पहुंच गई थी.
अगर बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी टिकाऊ रहती है और बैंकिंग सिस्टम में फंडिंग की लागत भी बढ़ती है, तो भविष्य में लोन की दरों पर दबाव बन सकता है. इसलिए मौजूदा होम लोन ग्राहक को अभी घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन नए लोन लेने वालों और फ्लोटिंग रेट वाले ग्राहकों को बाजार की अगली चाल पर नजर रखनी चाहिए.
पर्सनल लोन की ब्याज दर आमतौर पर होम लोन की तुलना में ज्यादा होती है. इसलिए अगर आने वाले समय में बैंकों की फंडिंग लागत बढ़ती है और इसका असर नए लोन की कीमत पर आता है, तो पर्सनल लोन लेने वाले ग्राहक को ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ सकता है. हालांकि यहां भी आरबीआई के मौजूदा कदम को सीधे ईएमआई बढ़ने से जोड़ना सही नहीं होगा. ओएमओ एक लिक्विडिटी मैनेजमेंट टूल है, रेपो रेट में बदलाव नहीं.
इसका मतलब यह है कि अगर आप अगले कुछ महीनों में पर्सनल लोन लेने की सोच रहे हैं तो सिर्फ आज की ब्याज दर देखकर फैसला करना ठीक नहीं होगा. बैंक की प्रोसेसिंग फीस, ब्याज दर, लोन की अवधि और प्रीपेमेंट शर्तों को साथ में देखना ज्यादा समझदारी होगी.
एफडी निवेशकों के लिए यह खबर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है. अगर बैंकिंग सिस्टम में पैसा कुछ कम होता है और बैंकों को डिपॉजिट जुटाने की जरूरत बढ़ती है, तो कुछ बैंक ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए एफडी की ब्याज दरों में बदलाव कर सकते हैं. लेकिन यहां भी कोई सीधा नियम नहीं है कि आरबीआई के 1 लाख करोड़ रुपये की बॉन्ड बिक्री के बाद एफडी रेट जरूर बढ़ जाएंगे.
बैंकों के पास जमा की जरूरत, क्रेडिट ग्रोथ, बाजार में फंडिंग की लागत और आरबीआई की आगे की मौद्रिक नीति जैसे कई फैक्टर होंगे. इसलिए एफडी निवेशक के लिए सबसे अहम बात यह है कि सिर्फ एक बैंक की दर देखकर पूरी रकम लंबे समय के लिए लॉक न करें.
आरबीआई का मकसद लोगों से पैसा छीनना नहीं बल्कि बैंकिंग सिस्टम में मौजूद जरूरत से ज्यादा लिक्विडिटी को मैनेज करना है. आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी कहा है कि केंद्रीय बैंक के पास लिक्विडिटी मैनेज करने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं, जिनमें ओपन मार्केट ऑपरेशन और एफएक्स स्वैप शामिल हैं.
आरबीआई ने पहले वीआरआरआर जैसे उपायों से अतिरिक्त पैसा सोखने की कोशिश की थी, लेकिन बैंकों की भागीदारी सीमित रही. इसके बाद बॉन्ड बिक्री जैसे ज्यादा प्रभावी उपाय का इस्तेमाल किया गया.
यानी यह कदम इस बात का संकेत है कि आरबीआई बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त पैसे को लेकर गंभीर है. साथ ही इसका उद्देश्य शॉर्ट टर्म ब्याज दरों को उस स्तर के करीब लाना भी है जहां केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति का असर ठीक से काम कर सके.
यह इस पूरे फैसले का सबसे छिपा हुआ लेकिन महत्वपूर्ण पहलू है. सरकारी बॉन्ड की यील्ड केवल निवेशकों की चिंता का विषय नहीं होती. यह अर्थव्यवस्था में कई दूसरी ब्याज दरों के लिए भी एक अहम बेंचमार्क होती है.
अगर सरकारी बॉन्ड की यील्ड लंबे समय तक ऊंची रहती है तो सरकार की उधारी की लागत बढ़ सकती है. इसके अलावा बाजार में दूसरी उधारी की कीमत पर भी असर पड़ सकता है.
यही वह रास्ता है जिसके जरिए आरबीआई का तकनीकी लिक्विडिटी फैसला धीरे-धीरे आम ग्राहक के लोन तक पहुंच सकता है. हालांकि यह असर तुरंत और एक जैसा नहीं होता.
अगर आपकी होम लोन की ईएमआई चल रही है तो फिलहाल केवल इस फैसले के आधार पर ईएमआई बढ़ने की आशंका मान लेना सही नहीं होगा. अपने लोन का बेंचमार्क और रीसेट डेट जरूर चेक करें.
अगर आप पर्सनल लोन लेने वाले हैं तो ब्याज दर के साथ कुल भुगतान और लोन अवधि की तुलना करें. सिर्फ कम ईएमआई देखकर लंबी अवधि का महंगा लोन न चुनें. अगर आपकी एफडी मैच्योर होने वाली है तो अलग-अलग बैंकों की दरों की तुलना करें. बहुत लंबी अवधि के लिए पूरा पैसा एक साथ लॉक करने के बजाय जरूरत और ब्याज दर के माहौल को देखते हुए रकम को अलग-अलग अवधि में रखना उपयोगी हो सकता है.
सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि आरबीआई का 1 लाख करोड़ रुपये का कदम सीधे तौर पर आपकी ईएमआई बढ़ाने का फैसला नहीं है. यह बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त पैसा कम करने की कोशिश है. लेकिन अगर इसके चलते बॉन्ड यील्ड और बाजार की फंडिंग लागत ऊंची रहती है, तो आगे चलकर लोन और डिपॉजिट रेट पर असर देखने को मिल सकता है.
इसलिए इस खबर को केवल आरबीआई की लिक्विडिटी चाल समझकर छोड़ देना सही नहीं होगा. आने वाले दिनों में बॉन्ड यील्ड, बैंक की एफडी दरें और नए लोन की ब्याज दरें यह बताएंगी कि इसका असली असर आपकी जेब तक कितना पहुंचता है.
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