बिजनेस
How to build your own gaming brand? आमिर मलिक ने सरकारी नौकरी की तैयारी और कॉरपोरेट करियर के बाद 2019 में 5 लाख रुपये से स्पिनबॉट शुरू किया. मोबाइल गेमिंग एक्सेसरीज की जरूरत को बिजनेस का मौका बनाया. स्पिनबॉट ने वित्त वर्ष 2025-26 में 13 करोड़ रुपये की नेट सेल्स की और अब 25 करोड़ रुपये का टारगेट है.
कल तक गेमिंग कैफे में घंटों गेम खेलने वाला एक लड़का आज करोड़ों रुपये का बिजनेस खड़ा कर चुका है. आमिर मलिक ने 2019 में अपनी 5 लाख रुपये की सेविंग लगाकर स्पिनबॉट शुरू किया था. आज यही कंपनी वित्त वर्ष 2026-27 में 24-25 करोड़ रुपये की नेट सेल्स का टारगेट लेकर चल रही है.
दिलचस्प बात यह है कि आमिर ने बिजनेस की शुरुआत किसी बड़े ऑफिस या भारी-भरकम निवेश से नहीं की थी. उन्होंने परिवार के घर के एक कमरे से काम शुरू किया और पहले साल ही 66.5 लाख रुपये की नेट सेल्स दर्ज कर ली.
आमिर मलिक का गेमिंग से रिश्ता बिजनेस शुरू करने के बाद नहीं बना था. आगरा में बड़े हुए आमिर बचपन से टेक्केन 3, मॉर्टल कॉम्बैट और कॉन्ट्रा जैसे गेम खेलते थे. कॉलेज पहुंचने के बाद काउंटर-स्ट्राइक का जुनून बढ़ गया और वह दोस्तों के साथ लोकल गेमिंग कैफे जाने लगे.
कई बार वह ट्यूशन तक छोड़कर गेमिंग कैफे पहुंच जाते थे. एक बार उनकी मां को इसका पता चला तो वह सीधे गेमिंग कैफे पहुंच गईं. उस समय आमिर के लिए यह काफी अजीब स्थिति थी. लेकिन गेमिंग का यही पुराना शौक आगे चलकर उनके बिजनेस की सबसे बड़ी ताकत बना. आमिर ने गेमर की समस्या को सिर्फ बाहर से नहीं देखा था, बल्कि खुद उसका अनुभव किया था.
यही वजह है कि जब उन्होंने कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सेसरीज कंपनी में प्रोडक्ट मैनेजर के तौर पर काम किया, तो ग्राहकों की एक मांग ने उनका ध्यान खींचा. मोबाइल गेम खेलने वाले ग्राहक ऐसे प्रोडक्ट चाहते थे जो उनके गेमिंग एक्सपीरियंस को बेहतर बना सकें. यहीं से उन्हें बाजार में एक खाली जगह दिखाई दी. उस समय ज्यादातर गेमिंग एक्सेसरीज कंपनियां पीसी गेमर्स पर ज्यादा फोकस कर रही थीं, जबकि मोबाइल गेमर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही थी.
आमिर के करियर की शुरुआत भी सीधे स्टार्टअप से नहीं हुई थी. उन्होंने 2012 में हिंदुस्तान कॉलेज से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन में बीटेक किया. इसके बाद करीब एक साल तक एसएससी-सीजीएल, बैंक पीओ और आर्म्ड फोर्सेज जैसी सरकारी नौकरियों की तैयारी की.
उन्होंने एसएससी-सीजीएल परीक्षा के टियर 1 और टियर 2 दोनों पास किए थे. लेकिन पेपर लीक के कारण भर्ती प्रक्रिया करीब एक साल तक आगे नहीं बढ़ सकी. आमिर ने महसूस किया कि सरकारी नौकरी के पीछे अनिश्चितता के साथ जीवन के कई साल लग सकते हैं. इसके बाद उन्होंने एमिटी यूनिवर्सिटी, नोएडा से मार्केटिंग एंड सेल्स में एमबीए किया और टाटा टेलीसर्विसेज यानी टाटा इंडिकॉम में नौकरी शुरू की.
उस समय उनकी मासिक सैलरी 15,000 रुपये थी. बाद में उन्होंने कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सेसरीज कंपनी में प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में काम किया. यहां उन्हें प्रोडक्ट डेवलपमेंट, सोर्सिंग, ई-कॉमर्स, सप्लाई चेन और ऑनलाइन मार्केटप्लेस का व्यावहारिक अनुभव मिला.
2019 तक उनकी मासिक सैलरी करीब 45,000 रुपये हो चुकी थी. इसके बावजूद उन्हें लगा कि कॉरपोरेट में करियर ग्रोथ उनकी उम्मीद के मुताबिक नहीं हो रही है. यहीं नौकरी छोड़ने का फैसला हुआ. आमिर ने अपनी 5 लाख रुपये की बचत लगाई और परिवार के घर के एक कमरे से स्पिनबॉट की शुरुआत कर दी.
स्पिनबॉट ने शुरुआत किसी बड़े प्रोडक्ट पोर्टफोलियो से नहीं की. कंपनी का पहला प्रोडक्ट कैपेसिटिव गेमिंग ट्रिगर था. बीजीएमआई, फ्री फायर और कॉल ऑफ ड्यूटी मोबाइल जैसे मोबाइल गेम्स में खिलाड़ी को एक साथ मूवमेंट, निशाना लगाना, शूट करना, कूदना और क्राउच करना पड़ता है. सिर्फ दो अंगूठों से मोबाइल स्क्रीन पर इन सभी कंट्रोल को संभालना मुश्किल हो सकता है.
स्पिनबॉट के कैपेसिटिव गेमिंग ट्रिगर ने इसी समस्या को टारगेट किया. इसे स्मार्टफोन पर क्लिप किया जा सकता है और यह कैपेसिटिव कंडक्शन टेक्नोलॉजी के जरिए फिजिकल बटन प्रेस को स्क्रीन टैप में बदलता है. इसमें ब्लूटूथ कनेक्शन या किसी अतिरिक्त ऐप की जरूरत नहीं होती.
यही प्रोडक्ट अमेजन पर स्पिनबॉट के बेस्ट सेलिंग प्रोडक्ट्स में शामिल हो गया. टेकबर्नर और बीबॉम जैसे पॉपुलर गेमिंग यूट्यूबर्स से मिले ऑर्गेनिक रिव्यू ने भी ब्रांड को बिना इंफ्लुएंसर मार्केटिंग पर पैसा खर्च किए देशभर में पहचान दिलाने में मदद की. यहां से स्पिनबॉट ने एक अहम रणनीति अपनाई. कंपनी ने सिर्फ सामान बेचने के बजाय गेमर्स की रोजमर्रा की समस्या को प्रोडक्ट डेवलपमेंट का आधार बनाया.
स्पिनबॉट की कहानी में ग्रोथ के साथ बड़ा रिस्क भी आया. लॉन्च के कुछ ही महीनों बाद कोविड-19 लॉकडाउन ने सप्लाई चेन को प्रभावित किया. कंपनी के ज्यादातर प्रोडक्ट चीन, ताइवान और वियतनाम में मैन्युफैक्चर होते थे और महामारी के दौरान सप्लाई में दिक्कतें आईं. इसके बाद 2020 में भारत सरकार ने पबजी पर बैन लगा दिया. स्पिनबॉट के शुरुआती ग्राहकों में पबजी प्लेयर्स की बड़ी संख्या थी. ऐसे में गेम पर रोक लगने से कंपनी की डिमांड पर सीधा असर पड़ा.
हालांकि कुछ महीनों बाद यही गेम बैटलग्राउंड्स मोबाइल इंडिया यानी बीजीएमआई के रूप में वापस आया और मोबाइल गेमिंग एक्सेसरीज की डिमांड फिर बढ़ने लगी. इस झटके से आमिर ने एक बड़ा सबक सीखा. किसी एक गेम पर निर्भर रहना बिजनेस के लिए जोखिम भरा है. इसके बाद स्पिनबॉट ने मोबाइल गेमिंग से आगे पीसी और कंसोल गेमिंग एक्सेसरीज में भी विस्तार किया.
स्पिनबॉट की ग्रोथ का सबसे दिलचस्प हिस्सा इसका रेवेन्यू ट्रैक है. कंपनी ने अपने पहले वित्तीय वर्ष में सिर्फ दो प्रोडक्ट्स के साथ 66.5 लाख रुपये की नेट सेल्स दर्ज की थी. दूसरे साल नेट सेल्स बढ़कर 90 लाख रुपये हुई. तीसरे साल यह आंकड़ा तेजी से बढ़कर 3.8 करोड़ रुपये पहुंच गया.
स्टार्टअप पेडिया को दिए इंटरव्यू में आमिर मलिक के मुताबिक, 90 लाख रुपये से 3.8 करोड़ रुपये की छलांग के पीछे इंटरनेशनल सेलिंग और प्रोडक्ट पोर्टफोलियो का विस्तार अहम वजह रहा. चौथे साल भी कंपनी की रेवेन्यू करीब इसी स्तर पर रही. इसके बाद पांचवें साल 5.5 करोड़ रुपये, छठे साल 9.5 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2025-26 में नेट सेल्स 13 करोड़ रुपये तक पहुंच गई.
अब वित्त वर्ष 2026-27 में कंपनी औसतन करीब 2 करोड़ रुपये की मंथली सेल्स कर रही है और साल के अंत तक 24-25 करोड़ रुपये की नेट सेल्स की उम्मीद कर रही है. खास बात यह है कि स्पिनबॉट ने शुरुआत से कोई बाहरी फंडिंग नहीं ली. कंपनी बूटस्ट्रैप्ड रही है और आमिर के मुताबिक पहले ही साल से ईबीआईटीडीए पॉजिटिव रही.
स्पिनबॉट आज सिर्फ मोबाइल ट्रिगर बेचने वाली कंपनी नहीं है. कंपनी के पास करीब 45 अलग-अलग प्रोडक्ट हैं. मोबाइल कैटेगरी में गेमिंग ट्रिगर्स, फिंगर स्लीव्स, मोबाइल कूलर्स और गेमपैड्स शामिल हैं. पीसी गेमिंग में कंपनी कीबोर्ड, माउस, कंट्रोलर्स, लैपटॉप कूलिंग पैड्स, गेमिंग माउसपैड्स, हेडफोन्स, ईयरफोन्स और कैप्चर कार्ड्स बेचती है.
कंपनी का एक माउसपैड भारत का पहला 5 एमएम मोटा गेमिंग माउसपैड बताया गया है, जिसे प्रो गेमर्स के बीच पसंद किया जाता है. स्पिनबॉट के प्रोडक्ट्स उसकी वेबसाइट, अमेजन, फ्लिपकार्ट, ब्लिंकिट, फ्लिपकार्ट मिनट्स, इंस्टामार्ट, अमेजन यूके और अमेजन यूएस पर उपलब्ध हैं.
कंपनी की करीब 20 फीसदी रेवेन्यू अब क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म और अपनी वेबसाइट से आती है. दोनों का योगदान लगभग 10-10 फीसदी बताया गया है. कंपनी अब ऑस्ट्रेलिया के बाजार में भी जाने की तैयारी कर रही है. साथ ही क्रोमा और विजय सेल्स जैसी ऑफलाइन रिटेल चेन के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाने की योजना है.
स्पिनबॉट की रणनीति केवल एक्सेसरीज बेचकर रुकने की नहीं है. कंपनी ईस्पोर्ट्स प्लेयर्स और ऐसी उभरती टीमों को स्पॉन्सर करती है जिन्हें टैलेंट होने के बावजूद फंडिंग और विजिबिलिटी की कमी होती है. कंपनी गेमिंग टूर्नामेंट भी आयोजित करती है और स्पिनबॉट ट्राइब नाम की कम्यूनिटी चलाती है. इसके जरिए कंपनी उन गेमर्स और टीमों को सामने लाने की कोशिश करती है जिन्हें वह सपोर्ट करती है.
स्पिनबॉट को पिछले साल इंक42 की ओर से भारत के तेजी से बढ़ते स्टार्टअप्स में शामिल किया गया था. कंपनी को एंटरप्रेन्योर और शार्क टैंक इंडिया के जज अमन गुप्ता से भी अवॉर्ड मिला. आगे कंपनी स्मार्टफोन पर क्लाउड गेमिंग के लिए एक्सेसरीज और प्लेस्टेशन जैसे गेमिंग कंसोल के लिए कंट्रोलर्स की रेंज बढ़ाने पर काम कर रही है.
आमिर मलिक की कहानी को सिर्फ 5 लाख रुपये से 25 करोड़ रुपये तक पहुंचने की कहानी के तौर पर देखना अधूरा होगा. असली बात यह है कि उन्होंने अपने शौक को सीधे बिजनेस में बदलने के बजाय उस शौक से जुड़ी समस्या को पहचाना. उनका अनुभव प्रोडक्ट मैनेजर की नौकरी में मिली मार्केट समझ से जुड़ा. फिर गेमिंग की अपनी समझ को उन्होंने प्रोडक्ट आइडिया में बदला और ऑनलाइन मार्केटप्लेस से शुरुआत की.
यही मॉडल छोटे शहरों और नौकरीपेशा लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है. हर किसी के पास करोड़ों रुपये का निवेश नहीं होता. लेकिन किसी खास कम्यूनिटी की समस्या को समझकर छोटा प्रोडक्ट शुरू करना, ग्राहक की प्रतिक्रिया लेना और धीरे-धीरे कैटेगरी बढ़ाना एक व्यावहारिक रास्ता हो सकता है. स्पिनबॉट की कहानी यह भी दिखाती है कि सिर्फ तेजी से बढ़ती मार्केट में उतरना काफी नहीं है. पबजी बैन जैसे झटके के बाद बिजनेस को एक गेम से निकालकर मोबाइल, पीसी और कंसोल तक फैलाना ही कंपनी की अगली ग्रोथ का आधार बना.
अब आमिर का लक्ष्य सिर्फ 25 करोड़ रुपये की सेल्स तक पहुंचना नहीं है. उनका कहना है कि स्पिनबॉट का लॉन्ग टर्म विजन गेमर्स के लिए ऐसा इकोसिस्टम बनाना है, जहां स्मार्टफोन से शुरुआत करने वाला गेमर आगे चलकर पीसी और कंसोल गेमिंग तक पहुंच सके. यही इस पूरी कहानी का सबसे उपयोगी सबक है. कभी-कभी बिजनेस का बड़ा आइडिया किसी ट्रेंड को देखने से नहीं, बल्कि उस ट्रेंड के साथ जीने वाले लोगों की परेशानी को समझने से निकलता है.
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