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रेलवे के एसी कोचों से 4 साल में यात्रियों ने उड़ाया 104 करोड़ का सामान, मुसाफिरों की इस आदत ने छीन ली गरीब रेलकर्मियों की रोजी-रोटी

भारतीय रेलवे के एसी कोच में मिलने वाले तकिए-चादर और तौलिए की चोरी का खामियाजा गरीब रेल कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा है. चार साल में यात्रियों ने एसी कोच से 104 करोड़ का सामान चुरा लिया और नतीजा ये हुआ की कई गरीब रेलकर्मियों की रोजी-रोटी तक छिन गई.

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रेलवे के एसी कोचों से 4 साल में यात्रियों ने उड़ाया 104 करोड़ का सामान, मुसाफिरों की इस आदत ने छीन ली गरीब रेलकर्मियों की रोजी-रोटी

सावधान-ट्रेन से आपका सामान चुराना किसी गरीब के मुंह का निवाला छीन रहा है (फोटो एआई)

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क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो ट्रेन के एसी डिब्बे में सफर करते वक्त यह सोचते हैं कि टिकट के बदले मिलने वाला तौलिया या चादर घर ले जाने के लिए ही है? अगर हां, तो आपको यह जानकर झटका लगेगा कि आपकी इस आदत की कीमत रेलवे नहीं, बल्कि ट्रेन में दिन-रात आपकी सेवा करने वाले गरीब कोच अटेंडेंट चुका रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट में सामने आया है कि देश में हर हजार में से एक एसी यात्री अपने साथ रेलवे का बेडरोल समेट कर घर ले जा रहा है. परदे के पीछे का सच यह है कि इस चोरी की भरपाई उन अटेंडेंट की मामूली तनख्वाह से की जा रही है जो रोजाना सिर्फ 700 रुपये की दिहाड़ी पर काम करते हैं.

जब मुसाफिरों की चालाकी बन गई ठेका मजदूरों की सबसे बड़ी मुसीबत

रेलवे की इस व्यवस्था को करीब से देखें तो एक हैरान करने वाला गणित सामने आता है. जब भी आप किसी सफर के बाद चुपके से कोई तौलिया या तकिए का कवर अपने बैग में डाल लेते हैं, तो वह सीधे तौर पर एक मजदूर की जेब पर डाका होता है. ईस्ट सेंट्रल रेलवे की एक ट्रेन में काम करने वाले एक अटेंडेंट ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि महीने भर बिना छुट्टी लिए काम करने पर उन्हें मुश्किल से 21 हजार रुपये मिलने चाहिए. लेकिन हर महीने उनकी जेब से दो से तीन हजार रुपये सिर्फ इसलिए कट जाते हैं क्योंकि उनकी देखरेख वाले कोच से चादरें और कंबल गायब हो जाते हैं. मार्च और अप्रैल के महीने में ही कई अटेंडेंट के जिम्मे से दर्जनों चादरें और तकिए चोरी हो गए, जिसकी पूरी कीमत उनके वेतन से वसूल ली गई.

बीकानेर से लेकर सोनपुर तक फैला मुसाफिरों की पसंदीदा चोरी का अनोखा जाल

इंडियन एक्सप्रेस की आरटीआई रिपोर्ट बताती है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में यात्रियों की पसंद भी काफी अजीब है. आरटीआई से मिले आंकड़ों के मुताबिक, देश के कुछ खास इलाकों में कुछ खास चीजों की चोरी सबसे ज्यादा होती है. राजस्थान के बीकानेर और जोधपुर जैसे इलाकों में चादर और कंबल पर सबसे ज्यादा हाथ साफ किया जाता है, जबकि दिल्ली, मुंबई और अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों की तरफ आने वाली ट्रेनों में लोग चेहरा पोंछने वाला छोटा तौलिया सबसे ज्यादा चुराते हैं. वहीं बिहार के सोनपुर और दानापुर के रूट पर तकिए के कवर गायब होने की दर सबसे ज्यादा है. आरटीआई डेटा बताता है कि पिछले चार सालों में करीब 1.27 करोड़ से ज्यादा बेडरोल के सामान चोरी हो चुके हैं, जिससे ठेकेदारों को 104.51 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा है.

प्रभावित रेलवे डिवीजन (High Theft Zones) चोरी की गई वस्तुओं की संख्या विशेष विवरण व स्थिति
बीकानेर (Bikaner) 25.76 लाख सभी 69 डिवीजनों में सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र. यहाँ 2022 के बाद से चोरी में 4 गुना की चौंकाने वाली वृद्धि हुई है.
रांची (Ranchi) 9.31 लाख चोरी के मामलों में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा प्रभावित रहने वाला क्षेत्र.
दिल्ली (Delhi) 8.21 लाख कुल मामलों में तीसरे स्थान पर, हालांकि यहाँ तौलियों की सबसे ज्यादा चोरी दर्ज की गई.
मुंबई (Mumbai) 8.17 लाख महानगरीय रूटों में भारी संख्या में बेडरोल आइटम गायब होने की सूची में शामिल.
जोधपुर (Jodhpur) 8.09 लाख शीर्ष प्रभावित क्षेत्रों में शामिल, जहां यात्रियों का मुख्य निशाना सबसे महंगे कंबल रहे.
नोट: पूरे भारतीय रेलवे नेटवर्क में होने वाली कुल लिनेन चोरी का 67% हिस्सा केवल इन्हीं शीर्ष 10 डिवीजनों में केंद्रित है।

सबसे ज्यादा किन चीजों की हो रही चोरी और किन क्षेत्रों की ट्रेनों में हो रहे कांड

वस्तु (Item Type) चार वर्षों में चोरी की संख्या विशेष विवरण व मुख्य प्रभावित क्षेत्र
तौलिया (Towel) 46.54 लाख सबसे अधिक चोरी होने वाली वस्तु. दिल्ली, रांची, मुंबई और दानापुर डिवीजनों में इसका सबसे ज्यादा दबदबा रहा.
चादर (Bedsheet) 41.13 लाख दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा गायब होने वाला सामान. अकेले बीकानेर डिवीजन में कुल चोरी का करीब आधा हिस्सा चादरों का था.
तकिया कवर (Pillow Cover) 23.59 लाख सोनपुर और बिलासपुर डिवीजन में चोरियों की सूची में तकिया कवर सबसे शीर्ष पर रहे.
कंबल (Blanket) 12.95 lakh जोधपुर डिवीजन में चोरों का मुख्य निशाना (वहां की कुल चोरी में कंबलों की हिस्सेदारी अकेले 42% रही).
तकिया (Pillow) 2.76 लाख आकार में बड़ा होने के कारण यह ट्रेन के एसी कोचों से सबसे कम चोरी होने वाली वस्तु रही.

कानून की नजर में यह महज एक शौक नहीं बल्कि गंभीर गैर-जमानती अपराध है

कई बार लोग इसे महज एक आम बात समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन रेलवे सुरक्षा बल यानी आरपीएफ के मुताबिक, रेलवे की संपत्ति को चुराना रेलवे संपत्ति अधिनियम के तहत एक गंभीर और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आता है. शक होने पर चेकिंग स्टाफ को आपके सामान की तलाशी लेने का पूरा अधिकार है. रेलवे अब इस चोरी को रोकने के लिए कोच मित्र ऐप, सीसीटीवी कैमरों की मदद ले रहा है और यात्रियों को ट्रेन रुकने से आधा घंटा पहले ही सामान वापस करने का नियम कड़ाई से लागू कर रहा है.

इन रेलवे डिवीजन में चोरी के मामले में आई है कमी

रेलवे डिवीजन (Positive Trend Zones) सुधार / चोरी में कमी वर्तमान स्थिति व विशेष विवरण
दिल्ली (Delhi) 79% की भारी कमी नकारात्मक चलन को पूरी तरह उलटते हुए चोरियों के ग्राफ को नीचे लाया (3.27 लाख से घटकर मामले 68,013 रह गए).
अहमदाबाद (Ahmedabad) 83% की गिरावट कड़े सुरक्षा उपायों और निगरानी के चलते बेडरोल चोरी के मामलों में बेहतरीन सुधार दर्ज किया.
समस्तीपुर (Samastipur) 86% की रिकॉर्ड कमी बेडरोल नुकसान को रोकने में यह डिवीजन पूरे देश के शीर्ष सुधार वाले क्षेत्रों में शामिल रहा.
तिरुचिरापल्ली और पलक्कड़ (Tiruchirappalli & Palakkad) 0% चोरी (शून्य मामले) दक्षिण भारत के इन दो डिवीजनों से चादर-कंबल या तौलिया चोरी होने की एक भी घटना सामने नहीं आई.
आद्रा डिवीजन (Adra - SER) कोई चोरी नहीं यहां भी चोरी शून्य रही, लेकिन तकनीकी तौर पर यह सिर्फ मालगाड़ियों का डिवीजन है (एसी यात्री कोच नहीं हैं).

आपकी जेब पर कैसे पड़ता है चादर-कंबल की इस चोरी का सीधा असर

शायद आपको लगता होगा कि कुछ तौलिए या कंबल चोरी होने से रेलवे को क्या फर्क पड़ता है, लेकिन यह सीधे तौर पर आम जनता की जेब से जुड़ा मामला है. जब बड़े पैमाने पर लिनेन गायब होता है, तो रेलवे को भारी मात्रा में नए सेट खरीदने पड़ते हैं. इस अतिरिक्त खर्च का बोझ अंततः टिकट की कीमतों में बढ़ोतरी या अन्य सुविधाओं में कटौती के रूप में आम यात्रियों पर ही ट्रांसफर कर दिया जाता है. इसके अलावा, बेडरोल का स्टॉक कम होने से अगले यात्रियों को गंदे या पुराने लिनेन से समझौता करना पड़ता है. इसलिए अगली बार जब आप सफर करें, तो यह याद रखें कि आपके बेडरोल को सहेज कर रखना सिर्फ रेलवे का नहीं, बल्कि आपकी अपनी नागरिक जिम्मेदारी का भी हिस्सा है.

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