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NSE IPO 2026 shareholder companies list: एनएसई का करीब 30 हजार करोड़ रुपये का आईपीओ अब सेबी की मंजूरी के बाद आगे बढ़ रहा है. कुछ कंपनियों ने एनएसई के शेयर बेहद कम कीमत पर हासिल किए थे. आईपीओ में हिस्सेदारी बेचने पर इन्हें भारी मुनाफा और कैश मिल सकता है.
वीएलएस फाइनेंस के पास 178 करोड़ रुपये मूल्य का एनएसई स्टेक है और इसकी खुद की मार्केट कैप केवल 800 करोड़ रुपये है. जीआईसी री के पास 8,547 करोड़ रुपये मूल्य का एनएसई स्टेक है, जबकि इसकी मार्केट कैप करीब 62,000 करोड़ रुपये है.
एल्प्रो इंटरनैशनल के पास 403 करोड़ रुपये का स्टेक है और इसकी मार्केट कैप 2,955 करोड़ रुपये है. एलआईसी के एनएसई स्टेक की वैल्यू 55,708 करोड़ रुपये है, जबकि इसकी विशाल मार्केट कैप 5.34 लाख करोड़ रुपये है.
आईसीआईसीआई लोम्बार्ड के पास 4,935 करोड़ रुपये का एनएसई स्टेक है और इसकी मार्केट कैप 80,000 करोड़ रुपये है. जेएम फाइनेंशियल के पास 634 करोड़ रुपये का स्टेक है, जबकि इसकी मार्केट कैप लगभग 12,273 करोड़ रुपये है.
एनएसई की कहानी में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला आंकड़ा उसकी कुछ पुरानी हिस्सेदारियों की खरीद लागत है. द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने एनएसई के शेयर औसतन केवल 0.32 रुपये प्रति शेयर की लागत पर हासिल किए थे.
स्टॉक होल्डिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड यानी एसएचसीआईएल की औसत अधिग्रहण लागत 0.46 रुपये प्रति शेयर थी. यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की लागत 0.50 रुपये, बैंक ऑफ बड़ौदा की 0.54 रुपये और भारतीय स्टेट बैंक यानी एसबीआई की 0.80 रुपये प्रति शेयर थी. जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी जीआईसी री की औसत लागत 5.26 रुपये प्रति शेयर थी.
यहां आम निवेशक के लिए समझने वाली बात यह है कि इन कंपनियों की पुरानी खरीद कीमत और एनएसई के संभावित आईपीओ मूल्य के बीच बहुत बड़ा अंतर है. यही अंतर संभावित मुनाफे की कहानी को इतना दिलचस्प बना रहा है.
एनएसई का यह आईपीओ 100 फीसदी ऑफर फॉर सेल यानी ओएफएस है. इसका सीधा मतलब है कि आईपीओ में शेयर बेचने वाली मौजूदा कंपनियों के पास पैसा जाएगा.
भारतीय स्टेट बैंक आईपीओ में अपने 2.47 करोड़ शेयर बेच रही है. इन शेयरों की औसत खरीद लागत केवल 0.80 रुपये प्रति शेयर थी.
बैंक ऑफ बड़ौदा करीब 1.1 करोड़ शेयर बेच रही है और इनकी औसत खरीद लागत 0.54 रुपये प्रति शेयर है. द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी 1.05 करोड़ शेयर बेच रही है, जिनकी औसत खरीद लागत सिर्फ 0.32 रुपये प्रति शेयर है.
जीआईसी री 1.06 करोड़ से अधिक शेयर बेच रही है और इसकी औसत खरीद लागत 5.26 रुपये प्रति शेयर है. एसएचसीआईएल 1.08 करोड़ से अधिक शेयर बेच रही है और इसकी औसत खरीद लागत 0.46 रुपये प्रति शेयर है.
इंडियन बैंक 24.75 लाख शेयर बेचेगी, जिसकी खरीद लागत 18.06 रुपये प्रति शेयर है. आईसीआईसीआई लोम्बार्ड 23.50 लाख शेयर बेचेगी और इसकी खरीद लागत 169.49 रुपये प्रति शेयर है.

इन आंकड़ों का सबसे बड़ा मतलब यह है कि एनएसई की लिस्टिंग के बाद बाजार में सिर्फ एक नया बड़ा शेयर नहीं आएगा, बल्कि पुराने हिस्सेदारों की संपत्ति का बाजार मूल्य भी ज्यादा साफ तरीके से सामने आएगा.
मसलन एलआईसी आईपीओ में अपनी 10.72 फीसदी हिस्सेदारी से एक भी शेयर नहीं बेच रही है. इसके बावजूद एनएसई की लिस्टिंग के बाद उसके निवेश पोर्टफोलियो में मौजूद इस हिस्सेदारी का मूल्य 55,708 करोड़ रुपये से अधिक आंका जाएगा. यानी किसी कंपनी को फायदा उठाने के लिए हमेशा शेयर बेचना जरूरी नहीं है.
आईएफसीआई का मामला और भी दिलचस्प है. आईएफसीआई सीधे एनएसई के शेयर नहीं बेच रहा है, लेकिन एसएचसीआईएल में उसकी 52.86 फीसदी हिस्सेदारी है. एसएचसीआईएल के एनएसई शेयर बेचने से आईएफसीआई को अप्रत्यक्ष वित्तीय फायदा मिल सकता है.
एनएसई की लिस्टिंग का फायदा सिर्फ मौजूदा शेयरहोल्डर्स तक सीमित रहने की उम्मीद नहीं है. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी बीएसई भी इस प्रक्रिया में अहम भूमिका में रहेगा.
नियमों के अनुसार एनएसई खुद के प्लैटफॉर्म पर लिस्ट नहीं हो सकता. इसलिए उसके शेयर बीएसई पर लिस्ट और ट्रेड होंगे. इससे बीएसई के ट्रेडिंग वॉल्यूम और बाजार में उसके आकर्षण में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है.
यही वह छिपा हुआ एंगल है जिस पर आम निवेशक की नजर कम जाती है. एक एक्सचेंज की लिस्टिंग का असर दूसरे एक्सचेंज के कारोबार पर भी पड़ सकता है.
एनएसई आईपीओ की कहानी जितनी आकर्षक दिख रही है, उसमें जोखिम भी उतना ही महत्वपूर्ण है. बाजार विशेषज्ञों के अनुसार आईपीओ को लेकर उम्मीदों और उत्साह का असर शेयर कीमतों में पहले ही प्राइस्ड-इन हो चुका है.
अनलिस्टेड मार्केट में एनएसई का शेयर लगभग 1,975 रुपये तक पहुंच चुका है और इसके आधार पर कुल मूल्यांकन करीब 4.88 लाख करोड़ रुपये बैठता है. वहीं संभावित आईपीओ प्राइस बैंड 2,100 रुपये से 2,300 रुपये प्रति शेयर बताया गया है.
यानी सिर्फ यह देखकर किसी शेयर में पैसा लगाना समझदारी नहीं होगी कि उसके पास एनएसई की हिस्सेदारी है. अगर एनएसई का फाइनल प्राइस बैंड उम्मीद से कम रहा या बाजार में मुनाफावसूली शुरू हुई तो आईएफसीआई, न्यू इंडिया एश्योरेंस और बीएसई जैसे शेयरों में बिकवाली का दबाव आ सकता है.

एनएसई आईपीओ की सबसे बड़ी कहानी उन कंपनियों की है, जिन्होंने कई साल पहले बेहद कम कीमत पर हिस्सेदारी हासिल की थी. 0.32 रुपये की औसत खरीद लागत से लेकर 0.80 रुपये और 5.26 रुपये तक के आंकड़े बताते हैं कि पुरानी हिस्सेदारी का मूल्य अब कितना बदल चुका है.
लेकिन आम निवेशक के लिए असली फैसला आईपीओ की चर्चा या अनलिस्टेड मार्केट की हलचल देखकर नहीं होना चाहिए. अंतिम प्राइस बैंड, वैल्यूएशन, बाजार की स्थिति और संबंधित कंपनियों के फंडामेंटल को देखकर ही फैसला लेना बेहतर होगा.
एनएसई की लिस्टिंग कई कंपनियों के लिए वैल्यू अनलॉक करने वाला बड़ा मौका बन सकती है, लेकिन हर शेयरहोल्डर कंपनी का शेयर उसी अनुपात में ऊपर जाए, यह जरुरी नहीं है. यही इस पूरी कहानी का सबसे अहम सबक है.
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