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भूख ने खड़ी की ₹10,400 करोड़ की डिलीवरी कंपनी; फूड डिलीवरी से कूरियर किंग बनी, अब फिर मिलेगा स्विगी-जोमैटो को तगड़ा कंपटीशन

How delhivery changed online shopping: आधी रात को भूख मिटाने के लिए मंगवाए गए खाने की एक मामूली डिलीवरी से शुरू हुआ सफर आज देश के लॉजिस्टिक्स सेक्टर की सबसे बड़ी कामयाबी बन चुका है. डेल्हीवरी ने तकनीक और सूझबूझ के दम पर ई-कॉमर्स और आम लोगों की डिलीवरी का तरीका हमेशा के लिए बदल दिया है.

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भूख ने खड़ी की ₹10,400 करोड़ की डिलीवरी कंपनी; फूड डिलीवरी से कूरियर किंग बनी, अब फिर मिलेगा स्विगी-जोमैटो को तगड़ा कंपटीशन

कूरियर का बादशाह बनने के बाद अब स्विगी-जोमैटो से महामुकाबला (फोटो सोशल मीडिया)

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  • आधी रात का वो कमाल का आइडिया
  • पांच कर्मचारियों से अरबों का सफर
  • 24 घंटे में अब होगी डिलीवरी
  • ई-कॉमर्स की दुनिया का असली सिकंदर
  • फूड डिलीवरी में फिर जोरदार वापसी

क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप आधी रात को अपने स्मार्टफोन से खाना ऑर्डर करते हैं, तो वह साधारण सा कदम किसी बड़ी बिजनेस क्रांति की शुरुआत हो सकता है? आज हम जिस फ्लिपकार्ट या एमेजॉन से सामान मंगाकर खुश होते हैं, उसे आपके घर तक 24 घंटे में पहुंचाने के पीछे एक ऐसी ही आधी रात की दिलचस्प कहानी है. गुरुग्राम से शुरू हुई डेल्हीवरी कंपनी आज देश के रसद (लॉजिस्टिक्स) बाजार की बादशाह बन चुकी है. यह कहानी सिर्फ एक कंपनी की नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि कैसे एक छोटी सी जरूरत को पहचानकर देश के आम लोगों की जिंदगी और ऑनलाइन शॉपिंग के अनुभव को पूरी तरह बदला जा सकता है.

एक बातचीत जिसने बदल दी पांच बेरोजगारों की तकदीर

यह बात साल 2011 की है जब साहिल बरुआ और सूरज सहारन नाम के दो दोस्तों ने रात के करीब साढ़े बारह बजे खाना ऑर्डर किया. खाना लेकर आए डिलीवरी बॉय से जब उनकी बातचीत हुई, तो उन्हें पता चला कि वह रेस्टोरेंट बंद होने वाला है और वहां काम करने वाले लोग बेराजगार हो जाएंगे. दोनों दोस्तों ने तुरंत रेस्टोरेंट के मालिक बालाजी से मुलाकात की और उसके सभी कर्मचारियों को नौकरी पर रख लिया. यहीं से डेल्हीवरी की शुरुआत हुई.

महज 5 कर्मचारियों और 250 स्क्वायर फीट के एक छोटे से कमरे से शुरू हुई इस कंपनी ने सबसे पहले रेस्टोरेंट्स के लिए 30 मिनट में खाना पहुंचाने का जिम्मा उठाया. बाद में मोहित टंडन, भावेश मंगलानी और कपिल भारती भी इस मुहिम से जुड़े. यह कहानी सिखाती है कि जब आप दूसरों की समस्या का समाधान ढूंढते हैं, तो रास्ते अपने आप खुलते चले जाते हैं.

जब खाने की प्लेट से निकलकर ई-कॉमर्स के मैदान में उतरी कंपनी

शुरुआती सफलता के बाद साल 2012 में निवेशकों के कहने पर कंपनी ने भांप लिया कि असली खेल खाने की डिलीवरी में नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ रहे ई-कॉमर्स बाजार में है. उस समय बड़ी-बड़ी कूरियर कंपनियां तो थीं, लेकिन कोई भी 24 से 48 घंटे के भीतर सामान पहुंचाने पर ध्यान नहीं दे रहा था. डेल्हीवरी ने इसी कमी को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया.

उन्होंने पारंपरिक डाक या कूरियर सेवा को छोड़कर पूरी तरह से तकनीक पर आधारित नेटवर्क तैयार किया. आज इसका असर यह है कि जो ऑनलाइन सामान पहले आपके घर पहुंचने में 4 से 7 दिन लगाता था, वह अब महज 24 घंटे या उससे भी कम समय में आपके दरवाजे पर आ जाता है. इससे आम ऑनलाइन खरीदारों का भरोसा इंटरनेट शॉपिंग पर कई गुना बढ़ गया.

स्विगी और जोमैटो के भारी कमीशन से परेशान रेस्टोरेंट्स को मिला नया सहारा

डेल्हीवरी की सफलता का एक छिपा हुआ और सबसे नया पहलू यह है कि कंपनी अब एक बार फिर अपने पुराने प्यार यानी फूड डिलीवरी की तरफ लौट रही है. लेकिन इस बार उनका अंदाज बिल्कुल अलग है. आज के समय में बहुत से क्लाउड किचन और रेस्टोरेंट्स इस बात से परेशान हैं कि स्विगी और जोमैटो जैसी बड़ी कंपनियां उनसे बहुत भारी कमीशन वसूलती हैं.

डेल्हीवरी ने इसी का फायदा उठाकर रेस्टोरेंट्स के साथ सीधा हाथ मिलाया है ताकि उन्हें एक सस्ता और बेहतर डिलीवरी विकल्प मिल सके. इसका सीधा फायदा आने वाले समय में आम ग्राहकों को मिल सकता है, क्योंकि जब रेस्टोरेंट का खर्च कम होगा, तो खाने की कीमतें भी काबू में रह सकती हैं.

यूनिकॉर्न क्लब में एंट्री और आम कारोबारियों के लिए बड़ा मौका

आज यह कंपनी 3 बिलियन डॉलर से ज्यादा की वैल्यूएशन के साथ दुनिया के सबसे बड़े इनवेस्टर्स जैसे सॉफ्टबैंक और कार्लाइल ग्रुप की पसंदीदा बन चुकी है. कंपनी का सालाना टर्नओवर हजारों करोड़ में है. लेकिन एक आम आदमी या छोटे व्यापारी के लिए इसका क्या मतलब है?

रिविगो या ब्लैकबक जैसी कंपनियां सिर्फ बड़े कॉर्पोरेट और ट्रकों के बड़े बेड़ों पर ध्यान देती हैं, जबकि डेल्हीवरी ने अपने डिलीवरी नेटवर्क को छोटे दुकानदारों (SMEs) और आम लोगों के लिए खोला है. कंपनी अब देश के 20,000 से ज्यादा पिन कोड्स तक अपनी पहुंच बढ़ा रही है, जिससे छोटे शहरों के व्यापारी भी अपना सामान पूरे देश में आसानी से और बेहद कम लागत में बेच पा रहे हैं.

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