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अमेरिका की 10 करोड़ की नौकरी छोड़ भारत लौटे, शुरू किया पत्तल-दोने का बिजनेस, खड़ा कर दिया 250 करोड़ का कारोबार

Entrepreneur inspirational business story: अमेरिका की 10 करोड़ रुपये सालाना वेतन वाली नौकरी छोड़कर भारत लौटे राहुल सिंह ने कोविड के बीच कारोबार शुरू किया. निवेशकों ने प्लास्टिक का विकल्प बनाने का आइडिया खारिज किया, तो उन्होंने अपना घर बेच दिया. आज उनका कारोबार 250 करोड़ रुपये का बताया जाता है.

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अमेरिका की 10 करोड़ की नौकरी छोड़ भारत लौटे, शुरू किया पत्तल-दोने का बिजनेस, खड़ा कर दिया 250 करोड़ का कारोबार

10 करोड़ की नौकरी छोड़ने के बाद घर तक बेचना पड़ा, राहुल सिंह ने पत्तों से बदल दी पूरी कहानी (फोटो सोशल मीडिया)

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किसी के लिए 10 करोड़ रुपये सालाना वेतन वाली नौकरी छोड़ना शायद कल्पना से भी बाहर की बात हो सकती है. लेकिन राहुल सिंह ने अमेरिका में ऐसी नौकरी मिलने के बाद भी भारत लौटने का फैसला किया. उनका मकसद सिर्फ पैसा कमाना नहीं था, बल्कि भारत में कुछ ऐसा करना था जिससे बड़े स्तर पर बदलाव लाया जा सके.

राहुल ने एक वीडियो में बताया कि वह छोटे शहर से आते हैं और पढ़ाई पूरी करने के बाद बेहतरीन अंकों की वजह से उन्हें अमेरिका में 10 करोड़ रुपये सालाना वेतन वाली नौकरी मिली थी. इसके बावजूद उन्होंने भारत लौटकर अपना बिजनेस शुरू करने का फैसला किया. लेकिन भारत लौटने के करीब एक महीने बाद ही कोविड आ गया. जिस समय नए बिजनेस के लिए बाजार और निवेश दोनों बेहद मुश्किल हो गए थे, उसी समय राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई.

प्लास्टिक को खत्म करने का आइडिया, निवेशकों ने कहा मुश्किल है

राहुल ने प्लास्टिक के खिलाफ काम करने का फैसला किया. उनका आइडिया पेड़ के पत्तों से पर्यावरण के अनुकूल दोने और पत्तल तैयार करने का था. मकसद ऐसा विकल्प तैयार करना था जिसे इस्तेमाल करके प्लास्टिक पर निर्भरता कम की जा सके. लेकिन किसी नए आइडिया को कारोबार में बदलना आसान नहीं था. जोश टॉक्स में बताई गई कहानी के अनुसार, राहुल जब फंडिंग के लिए निवेशकों के पास गए तो उन्हें यह कहकर मना किया गया कि प्लास्टिक को हटाना लगभग असंभव है.

यहीं से कहानी का सबसे अहम हिस्सा शुरू होता है. ज्यादातर लोग ऐसी स्थिति में आइडिया बदल सकते हैं या नौकरी की तरफ वापस लौट सकते हैं. राहुल ने इसके उलट अपने आइडिया पर काम जारी रखा.

निवेशक नहीं मिला तो अपना घर ही बेच दिया

कारोबार के लिए पूंजी की जरूरत थी. बाहर से फंडिंग नहीं मिली तो राहुल ने अपने घर को ही बेचने का फैसला किया. यह फैसला सिर्फ आर्थिक जोखिम नहीं था, बल्कि परिवार और भविष्य से जुड़ा बहुत बड़ा दांव भी था. राहुल ने अपना घर बेचकर कारोबार में पैसा लगाया. इसके बाद उन्होंने पत्तों से बनने वाले पर्यावरण-अनुकूल दोने और पत्तल को बाजार तक पहुंचाने पर ध्यान दिया.

यही हिस्सा आम लोगों के लिए सबसे बड़ा सबक देता है. बिजनेस में सिर्फ आइडिया होना काफी नहीं होता. उसके लिए बाजार, ग्राहक, पूंजी और लगातार काम करने की क्षमता भी चाहिए. राहुल की कहानी में सबसे बड़ा जोखिम आइडिया का नहीं, बल्कि उस आइडिया पर अपना पैसा लगाने का था.

जिस आइडिया को असंभव कहा, वही धीरे-धीरे बाजार में पहुंचा

शुरुआत में जिन लोगों ने प्लास्टिक का विकल्प तैयार करने के आइडिया को मुश्किल माना, धीरे-धीरे वही प्रोडक्ट ग्राहकों तक पहुंचने लगा. लोगों ने पत्तों से बने प्रोडक्ट को अपनाना शुरू किया और कारोबार बढ़ता गया.

इस कहानी का एक अहम कारोबारी एंगल यह है कि राहुल ने कोई बिल्कुल अनजानी जरूरत पैदा नहीं की. उन्होंने पहले से मौजूद समस्या यानी प्लास्टिक के इस्तेमाल के सामने एक विकल्प खड़ा करने की कोशिश की.

यानी छोटे कारोबार के लिए सीख यह है कि हमेशा बिल्कुल नया बाजार बनाने की जरूरत नहीं होती. कई बार पहले से मौजूद समस्या का सस्ता, उपयोगी या पर्यावरण-अनुकूल समाधान भी बड़ा कारोबार खड़ा कर सकता है.

10 करोड़ की नौकरी छोड़ने की कहानी में असली फर्क क्या है?

राहुल सिंह की कहानी को सिर्फ नौकरी छोड़कर करोड़ों का कारोबार खड़ा करने की कहानी मानना अधूरा होगा. इसका असली हिस्सा वह जोखिम है जो उन्होंने नौकरी छोड़ने के बाद उठाया. एक तरफ अमेरिका में 10 करोड़ रुपये सालाना वेतन वाली नौकरी थी. दूसरी तरफ भारत लौटकर नया कारोबार शुरू करने का अनिश्चित रास्ता था. इसके बाद कोविड आया, निवेशकों ने फंडिंग देने से मना किया और कारोबार चलाने के लिए घर तक बेचना पड़ा.

राहुल सिंह ने अपना कारोबार आगे बढ़ाया और आज 250 करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा करने वाले कारोबारी के रूप में सामने आते हैं.  आम नौकरीपेशा व्यक्ति के लिए इस कहानी का मतलब यह नहीं है कि नौकरी छोड़कर घर बेच देना ही सफलता का रास्ता है. असली सीख यह है कि किसी बिजनेस आइडिया को लेकर जोखिम लेने से पहले बाजार, ग्राहक, पूंजी और नुकसान सहने की क्षमता को समझना जरूरी है.

राहुल सिंह की कहानी से आम आदमी क्या सीख सकता है?

इस कहानी का सबसे उपयोगी पहलू यही है कि बड़ा कारोबार हमेशा बड़े ऑफिस या भारी भरकम आइडिया से शुरू हो, यह जरूरी नहीं है. पत्ते, जो आम तौर पर बहुत साधारण चीज लगते हैं, उन्हें कारोबार का आधार बनाया गया.

दूसरी सीख पूंजी को लेकर है. निवेशक नहीं मिलना किसी बिजनेस आइडिया के खत्म होने का प्रमाण नहीं है. हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं कि हर व्यक्ति अपनी संपत्ति बेचकर कारोबार शुरू करे. राहुल का फैसला बहुत बड़ा निजी जोखिम था और इसे सामान्य बिजनेस रणनीति नहीं माना जा सकता.

तीसरी और शायद सबसे बड़ी सीख यह है कि नौकरी और कारोबार के बीच चुनाव सिर्फ कमाई का सवाल नहीं होता. नौकरी में निश्चित आय होती है, जबकि बिजनेस में कमाई के साथ नुकसान का जोखिम भी रहता है. राहुल सिंह की कहानी इसी अंतर को बेहद साफ तरीके से सामने रखती है.

 राहुल ने 10 करोड़ रुपये सालाना वेतन वाली नौकरी से निकलकर भारत में पर्यावरण-अनुकूल कारोबार की राह चुनी और आगे चलकर 250 करोड़ रुपये का कारोबार खड़ा किया. यह कहानी नौकरी छोड़ने की सलाह नहीं देती, बल्कि बताती है कि बड़े फैसले के पीछे किसी समस्या का समाधान और उसे बाजार तक पहुंचाने की क्षमता कितनी अहम होती है.  

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