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IIT-MBA की कॉर्पोरेट जॉब छोड़ दोस्तों ने खोला डिलीवरी चैनल, 37,779 करोड़ की कंपनी बनी हाइपरलोकल किंग और बन गए लोगों की जरूरत

Hyperlocal Delivery Startup Company: पटियाला से निकले अलबिंदर ढिंडसा ने अपनी कड़ी मेहनत और सूझबूझ से भारत के हाइपरलोकल बाजार की तस्वीर बदल दी. छोटे दुकानदारों की परेशानियों को समझते हुए उन्होंने जिस ग्रोफर्स (अब ब्लिंकिट) की नींव रखी, उसने आज करोड़ों लोगों की जिंदगी को बेहद आसान बना दिया है.

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IIT-MBA की कॉर्पोरेट जॉब छोड़ दोस्तों ने खोला डिलीवरी चैनल, 37,779 करोड़ की कंपनी बनी हाइपरलोकल किंग और बन गए लोगों की जरूरत

हाइपरलोकल डिलीवरी बिजनेस बना बड़ी सफलता की मिसाल (फोटो सोशल मीडिया)

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  • पटियाला के साधारण परिवार से आए उद्यमी
  • आईआईटी और कोलंबिया से पूरी की पढ़ाई
  • ज़ोमैटो से सीखा सप्लाई चेन का गहरा हुनर
  • वननंबर से शुरू हुआ ग्रोफर्स का सफर
  • छोटे दुकानदारों और ग्राहकों का रखा पूरा ध्यान

क्या आपको याद है जब घर में अचानक मेहमान आ जाने पर मम्मी आपको पड़ोस की उस छोटी दुकान पर मक्खन या दूध लेने के लिए दौड़ती थीं? हमारे देश में मोहल्ले की किराना दुकान से सामान लाना सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि बचपन की एक बहुत पुरानी याद है. वक्त बदला, सुपरमार्केट्स आए, लेकिन रोजमर्रा की जरूरतों को खरीदने का यह पारंपरिक तरीका जस का तस बना रहा. हर कोई जानता था कि इसमें बदलाव की गुंजाइश है, पर किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि इस आदत को कैसे बदला जाए. यहीं पर पंजाब के पटियाला शहर में जन्मे अलबिंदर ढिंडसा ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने देश के किराना बाजार की पूरी दिशा ही बदल कर रख दी.

पटियाला की गलियों से लेकर अमेरिका के क्लासरूम तक का सफर

अलबिंदर ढिंडसा का यह मुकाम तक पहुंचना बिल्कुल भी आसान नहीं था. दिल्ली के प्रतिष्ठित आईआईटी संस्थान से टेक्नोलॉजी में ग्रेजुएशन करने के बाद उनके पास चैन से बैठने का कोई कारण नहीं था. उन्होंने पहले परिवहन और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमाई और कई बड़ी कंपनियों में काम किया. लेकिन उनका मन अभी भी कुछ बड़ा करने के लिए बेताब था. इसी चाहत ने उन्हें अमेरिका के मशहूर कोलंबिया विश्वविद्यालय तक पहुंचा दिया, जहां से उन्होंने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर डिग्री हासिल की. अमेरिका में पढ़ाई के दौरान ही उनकी मुलाकात सौरभ कुमार से हुई, जो आगे चलकर उनके इस बड़े सफर में सबसे बड़े हमसफर बने. दोनों की सोच और लॉजिस्टिक्स को लेकर गहरी समझ ने भविष्य की एक बड़ी नींव रख दी थी.

जब जोमैटो के अनुभव ने दी एक नई दिशा

पढ़ाई पूरी करने के बाद अलबिंदर देश वापस लौट आए और फूड डिलीवरी के क्षेत्र की दिग्गज कंपनी ज़ोमैटो के साथ जुड़ गए. यहां उन्होंने करीब तीन साल तक काम किया और सप्लाई चेन व डिलीवरी के अंदरूनी कामकाज को बहुत बारीकी से समझा. इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि भारत का स्थानीय डिलीवरी बाजार बुरी तरह बिखरा हुआ है और ग्राहकों तक सामान समय पर पहुंचाने में भारी परेशानियां आ रही हैं. बाजार में बड़ी कंपनियां होने के बावजूद संचार और तालमेल की कमी साफ दिख रही थी. बस यहीं से अलबिंदर के दिमाग में एक चिंगारी सुलग उठी कि अगर इस हाइपरलोकल सिस्टम को थोड़ा सुधार दिया जाए, तो यह देश का सबसे बड़ा बिजनेस बन सकता है.

वननंबर से शुरू हुई थी असल कहानी

अपने इस विजन को हकीकत में बदलने के लिए साल 2013 में अलबिंदर और सौरभ ने मिलकर 'वननंबर' नाम से एक छोटी सी डिलीवरी कंपनी शुरू की. शुरुआत में यह कंपनी आसपास के इलाकों में कोई भी सामान इधर से उधर पहुंचाने का काम करती थी. लेकिन लोगों की नब्ज टटोलने के लिए दोनों संस्थापकों ने खुद अपनी साइकिल या बाइक उठाकर सिर्फ चार किलोमीटर के दायरे में 50 से ज्यादा डिलीवरी खुद कीं. इस दौरान वे छोटे दुकानदारों से मिले और उनकी दिक्कतों को बहुत करीब से समझा. उन्होंने पाया कि सबसे ज्यादा ऑर्डर किराने की दुकानों और दवाइयों की दुकानों से आ रहे हैं. इस एक छोटी सी खोज ने पूरी बाजी पलट दी और वननंबर को एक नए रूप में पेश किया गया, जिसे आज पूरी दुनिया ग्रोफर्स के नाम से जानती है.

असफलता के बाद मिली असली कामयाबी का स्वाद

रास्ता इतना आसान नहीं था. शुरुआत में कंपनी को करोड़ों रुपए का घाटा उठाना पड़ा और हालात इतने खराब हो गए कि कर्मचारियों की छंटनी तक करनी पड़ी. ऐसे मुश्किल वक्त में अलबिंदर ढिंडसा ने घबराने के बजाय अपनी तकनीक पर काम किया. उन्होंने मोबाइल ऐप लॉन्च किया और सीधे किसानों व बड़े निर्माताओं से सामान मंगवाने का नेटवर्क तैयार किया. बिचौलियों को पूरी तरह से बाहर करने से लागत कम हुई और ग्राहकों को सामान बहुत कम समय में मिलने लगा. आज यही सोच आम आदमी के बहुत काम आ रही है, जहां घर बैठे चंद मिनटों में हर जरूरी सामान दरवाजे पर पहुंच जाता है. यह कहानी हमें सिखाती है कि इरादे अगर पक्के हों, तो हर बड़ी चुनौती को मात दी जा सकती है.

जानिए मौजूदा समय में कंपनी का कितना है टर्नओवर (2026 में)?

क्विक कॉमर्स सेगमेंट में ब्लिंकिट (अब ज़ोमैटो/एटर्नल लिमिटेड का मुख्य हिस्सा) तेजी से आगे बढ़ रही है. वित्त वर्ष 2026 के आंकड़ों के अनुसार, ब्लिंकिट का ग्रॉस ऑर्डर वैल्यू (NOV) और ऑपरेशंस से होने वाला रेवेन्यू काफी बड़े स्तर पर पहुंच चुका है.   वित्त वर्ष 2026 के आखिरी दौर (Q4 FY26) में ही ब्लिंकिट का तिमाही रेवेन्यू ₹13,232 करोड़ से अधिक दर्ज किया गया था.   सालाना आधार पर इसका ऑपरेशनल रेवेन्यू बढ़कर लगभग ₹37,779 करोड़ तक पहुंच चुका है, जो देश के क्विक-कॉमर्स बाजार में इसे सबसे आगे खड़ा करता है. इसके अलावा कंपनी अब मुनाफे (Adjusted EBITDA पॉजिटिव) की राह पर भी आ चुकी है. 

शुरुआत कितनी पूंजी से हुई थी?

जब साल 2013 में अलबिंदर ढिंडसा और सौरभ कुमार ने इस कंपनी की शुरुआत 'वननंबर' (बाद में ग्रोफर्स) के रूप में की थी, तब इसे किसी बड़े निवेश के साथ शुरू नहीं किया गया था. यह एक छोटे स्टार्टअप के तौर पर उतरी थी. शुरुआती दौर में संस्थापकों ने खुद के सीमित संसाधनों से इसकी नींव रखी थी.  इसके बाद साल 2014 के अंत में इसे सिकोइया कैपिटल (Sequoia Capital) से अपनी पहली शुरुआती फंडिंग (सीड फंडिंग) के रूप में करीब 50,000 डॉलर ($500,000) यानी शुरुआती निवेश मिला था, जिसके बाद निवेशकों का इसमें बड़ा पैसा आना शुरू हुआ.  

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