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शादी की अंगूठी गिरवी रख सीखी थी ड्राइविंग और खड़ी कर दी 30 करोड़ की कंपनी, Ola-Uber तक नहीं तोड़ पाईं इनका बिजनेस नेक्सेस

Pravasi cabs bangalore owner: रेणुका आराध्या की शून्य से शिखर तक की कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो हालातों से हार मान लेता है. कभी पेट की भूख मिटाने के लिए भीख मांगने और गार्ड की नौकरी करने वाले रेणुका ने आज अपनी लगन से 30 करोड़ रुपये की प्रवासी कैब्स खड़ी कर दी है.

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शादी की अंगूठी गिरवी रख सीखी थी ड्राइविंग और खड़ी कर दी 30 करोड़ की कंपनी, Ola-Uber तक नहीं तोड़ पाईं इनका बिजनेस नेक्सेस

बेंगलुरु के इस शख्स के आइडिय के आगे ओला-उबर के ग्लोबल ऑफर्स भी घुटने टेक गए (फोटो एआई+ सोशल मीडिया)

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क्या आप भी अपनी जिंदगी की रोजमर्रा की दिक्कतों से परेशान होकर हार मान चुके हैं? अगर हां, तो आपको बेंगलुरु के रेणुका आराध्या की कहानी जरूर जाननी चाहिए. कभी पेट की भूख मिटाने के लिए सड़कों पर हाथ फैलाने वाले रेणुका आज 30 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाली कंपनी के मालिक हैं और उनकी कंपनी में 150 से अधिक लोग काम कर रहे हैं. उनकी यह जीवन यात्रा हर आम इंसान को सिखाती है कि अगर आपके पास आगे बढ़ने का विजन है, तो दुनिया की कोई भी चुनौती आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती.

जब भूख ने सिखाया जिंदगी का सबसे बड़ा सबक

रेणुका आराध्या का जन्म बेंगलुरु के पास अनेकल तालुका के गोपसंद्रा गांव में एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था. उनके पिता मंदिर में पुजारी थे लेकिन उनका कोई निश्चित वेतन नहीं था. वे अनाज मांगने पास के गांवों में जाते थे और रेणुका भी उनके साथ भीख मांगने जाया करते थे. गरीबी का आलम यह था कि छठी कक्षा के बाद उन्हें घरेलू नौकर के तौर पर काम करना पड़ा, जहां वे बर्तन धोने और झाड़ू लगाने का काम करते थे ताकि स्कूल की फीस दे सकें. इसके बाद उन्होंने एक आश्रम में भी समय बिताया जहां दिन में सिर्फ दो बार खाना मिलता था. रेणुका बताते हैं कि उनका दिमाग हमेशा यही सोचता रहता था कि खाना कैसे मिलेगा. उन्होंने संस्कृत और वेद इसलिए सीखे ताकि शादियों में जाकर भोजन करने का मौका मिल सके.

इस संघर्ष से आम पाठकों को यह सीख मिलती है कि शुरुआती नाकामी या बेहद खराब आर्थिक स्थिति आपकी किस्मत तय नहीं करती. जब इंसान के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता, तो उसका अपनी भूख और हालातों से लड़ना ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाता है.

गार्ड की नौकरी से ड्राइवर बनने का वो एक साहसी फैसला

पिता के निधन के बाद रेणुका पर मां की जिम्मेदारी आ गई. उन्होंने प्लास्टिक फैक्ट्री से लेकर बर्फ कारखाने और एडलैब्स में सफाईकर्मी तक का काम किया. इसके बाद उन्होंने सूटकेस की हाथगाड़ी खींचने का काम किया और खुद का बैग कवर का बिजनेस भी शुरू किया, जिसमें उन्हें 30 हजार का नुकसान हुआ. फिर उन्होंने 600 रुपये महीने पर सुरक्षा गार्ड की नौकरी की. लेकिन इस उधमी के भीतर कुछ बड़ा करने की चाहत हमेशा जिंदा थी. 20 साल की उम्र में जिम्मेदारी संभालने के लिए उन्होंने शादी की और अतिरिक्त कमाई के लिए नारियल के पेड़ चढ़ने का काम भी किया.

इसके बाद उन्होंने ड्राइवर बनने का फैसला किया. ड्राइविंग सीखने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपनी शादी की अंगुठी गिरवी रख दी. शुरुआती दिनों में गाड़ी ठीक से रिवर्स न कर पाने के कारण पहली नौकरी पहले ही दिन छूट गई. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और रातों में बिना पत्थरों वाली ढलान पर गाड़ी चलाने का अभ्यास किया. इसके बाद उन्होंने एक ट्रैवल कंपनी में शवों को ले जाने वाली गाड़ी भी चलाई और लगभग 300 शवों का परिवहन किया. इस अनुभव ने उन्हें सिखाया कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है और जो भी मौका मिले, उसे पूरी शिद्दत से जीना चाहिए. यह इस बात का सबूत है कि कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर लिया गया एक रिस्क आपकी पूरी जिंदगी बदल सकता है.

कॉर्पोरेट जगत में एंट्री और अमेज़न का साथ

विदेशी पर्यटकों को गाड़ी घुमाते हुए रेणुका को डॉलर में टिप मिलने लगी, जिससे उन्होंने पैसे बचाए. साल 2006 में उन्होंने अपनी सारी गाड़ियां बेचकर 6.5 लाख रुपये में 'इंडियन सिटी टैक्सी' नाम की एक बंद होने की कगार पर खड़ी कंपनी को खरीद लिया. बाद में उन्होंने इसका नाम 'प्रवासी कैब्स' रखा. उनके काम करने के बेहतरीन तरीके को देखकर अमेज़न इंडिया उनका पहला बड़ा कोर्पोरेट क्लाइंट बना. हालांकि शुरुआत में उन्हें भुगतान मिलने में देरी हुई और बिजनेस चलाने के लिए भारी ब्याज पर कर्ज लेना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. इसके बाद उन्होंने वॉलमार्ट, अकामाई और जनरल मोटर्स जैसी बड़ी कंपनियों को भी अपने साथ जोड़ा.

इस बिजनस से यह छिपा हुआ एंगल सामने आता है कि बिजनेस में केवल शुरुआती मुनाफे पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय मार्केट में अपनी पैठ बनाना और क्लाइंट्स का भरोसा जीतना सबसे जरूरी होता है. यदि आप केवल पैसों के पीछे भागेंगे तो आपका कारोबार कभी बड़ा नहीं हो पाएगा.

ओला और उबर के तूफान में ऐसे बचाया अपना साम्राज्य

जब भारतीय बाजार में ओला और उबर जैसी बड़ी कैब कंपनियों ने दस्तक दी, तो देश के कई स्थानीय टैक्सी ऑपरेटर्स का धंधा चौपट हो गया. रेणुका की भी लगभग 200 टैक्सियां उनके हाथ से निकल गईं, लेकिन उनके पास कुल 700 गाड़ियां थीं. उन्होंने अपने ड्राइवरों को रोकने के लिए एक बेहद अनोखी 'मालिक-सह-ड्राइवर' योजना शुरू की. इस योजना के तहत ड्राइवरों को सिर्फ 50 हजार रुपये के अग्रिम भुगतान पर नई कार दी गई और 36 महीने तक काम करने के बाद कार पूरी तरह ड्राइवर के नाम कर दी जाती थी. इस इंसानी और व्यावहारिक कदम की वजह से उनके ड्राइवर उनके साथ टिके रहे और बड़ी कंपनियां भी उनका बाल बांका नहीं कर पाईं.

यह बात साफ करती है कि जब बड़े ग्लोबल ब्रांड्स आपके सामने हों, तो भारी-भरकम तकनीक से ज्यादा आपका जमीनी स्तर पर अपने कर्मचारियों के साथ जुड़ाव और उनकी परगति में अपनी भलाई देखना काम आता है. आज रेणुका तीन अन्य स्टार्टअप्स में निदेशक हैं और अगले तीन साल में अपनी संपत्ति को 100 करोड़ के पार ले जाकर कंपनी का आईपीओ लाने की तैयारी में हैं. कभी भीख मांगने वाला यह शख्स आज खुद 23 लाख रुपये की कार चलाता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए महिला ड्राइवरों को आगे बढ़ा रहा है.

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