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सोना खरीदने का आ गया है बेहतरीन मौका? जानें तेज रफ्तार के बीच निवेशकों के लिए Buy, Hold और Wait का सही रास्ता क्या है

Gold buy-hold-wait strategy: सोना ₹1.55 लाख के ऊपर पहुंचने के बाद निवेशकों के सामने बड़ा सवाल है कि अभी खरीदें या गिरावट का इंतजार करें. हाल की profit booking के बावजूद कमजोर डॉलर और Fed rate hike की घटती संभावना Gold को सहारा दे रही है.

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सोना खरीदने का आ गया है बेहतरीन मौका? जानें तेज रफ्तार के बीच निवेशकों के लिए Buy, Hold और Wait का सही रास्ता क्या है

सोना खरीदारी का यही है सही मौका? (फोटो एआई)

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  • सोना ₹1.55 लाख के पार पहुंचा
  • तेजी के बाद profit booking आई
  • Fed से Gold को मिल रहा सहारा
  • नए निवेशक जल्दबाजी से बचें
  • हिस्सों में खरीदारी बेहतर रणनीति

सोने की कीमत जब ₹1.55 लाख के ऊपर पहुंच जाए तो सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि अब पैसा लगाना समझदारी है या अगली गिरावट का इंतजार करना चाहिए. तेजी के बीच एक छोटी सी गलती भी खरीदारी की लागत बढ़ा सकती है.

14 अगस्त के उपलब्ध घरेलू बाजार आंकड़ों के मुताबिक 24 कैरेट सोने का भाव करीब ₹1,55,020 प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोना करीब ₹1,42,110 प्रति 10 ग्राम रहा. वहीं एमसीएक्स गोल्ड करीब ₹1,53,373 प्रति 10 ग्राम पर रहा, जबकि पिछला बंद भाव ₹1,54,882 था. यानी एमसीएक्स पर करीब 0.97 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई.

ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सोना आगे कितना महंगा होगा. असली सवाल है कि इस स्तर पर किस निवेशक को खरीदना चाहिए, किसे थोड़ा रुकना चाहिए और किसे अपनी खरीदारी को हिस्सों में बांटना चाहिए.

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तेज उछाल के बाद आई प्रॉफिट बुकिंग, लेकिन तस्वीर पूरी तरह कमजोर नहीं

सोने में हाल की तेजी के बाद बाजार में मुनाफावसूली देखने को मिली है. रॉयटर्स के मुताबिक 13 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड 1.2 फीसदी गिरकर 4,354.58 डॉलर प्रति औंस पर आ गया था. इससे पहले कीमत 4,449.39 डॉलर प्रति औंस के दो महीने के उच्च स्तर तक पहुंची थी. रॉयटर्स के मुताबिक उस समय निवेशकों ने मुनाफा वसूली की थी और 4,500 डॉलर का स्तर एक अहम रेजिस्टेंस बना हुआ था.  

लेकिन अगले ही दिन तस्वीर कुछ सुधरी. 14 अगस्त को स्पॉट गोल्ड 0.7 फीसदी बढ़कर 4,379.95 डॉलर प्रति औंस पर पहुंचा. अमेरिकी डॉलर में कमजोरी और अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों के बाद सितंबर में फेडरल रिजर्व की दर बढ़ाने की संभावना घटने से सोने को सहारा मिला. रॉयटर्स के अनुसार सितंबर में रेट हाइक की संभावना पिछले सप्ताह के 55 फीसदी से घटकर करीब 33 फीसदी रह गई.  

इसका सीधा असर भारतीय निवेशक पर पड़ता है. अंतरराष्ट्रीय सोने की कीमत और रुपये की चाल मिलकर घरेलू गोल्ड रेट को प्रभावित करती हैं. इसलिए सिर्फ भारतीय बाजार में आई एक दिन की गिरावट देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि सोने की तेजी खत्म हो गई है.

₹1.55 लाख के ऊपर खरीदारी करें या इंतजार?

इस समय सबसे बेहतर रणनीति पूरी रकम एक साथ सोने में लगाने की बजाय चरणबद्ध खरीदारी की हो सकती है. खासकर उन लोगों के लिए जो निवेश के नजरिए से गोल्ड खरीदना चाहते हैं और जिनका लक्ष्य कुछ साल का है.

अगर किसी निवेशक को पहले से गोल्ड में पर्याप्त एक्सपोजर नहीं है, तो वह अपनी तय रकम का एक हिस्सा अभी और बाकी रकम बाजार में गिरावट आने पर लगाने की रणनीति अपना सकता है. इससे अगर कीमत ऊपर जाती है तो पूरी तरह बाजार से बाहर रहने का जोखिम कम होता है और अगर करेक्शन आता है तो कम भाव पर खरीदने का मौका भी मिलता है.

लेकिन जिन निवेशकों ने हाल की तेजी में पहले ही बड़ी खरीदारी कर ली है, उनके लिए हर छोटी गिरावट को नई खरीदारी का मौका मानना जरूरी नहीं है. ऐसे निवेशकों को अपने कुल पोर्टफोलियो में गोल्ड का हिस्सा देखकर फैसला करना चाहिए.

बाय, होल्ड या वेट, किसके लिए कौन सी रणनीति?

कमोडिटी और शेयर मार्केट एक्सपर्ट देवकृष्ण पांडेय कहते हैं कि बाय की रणनीति उन निवेशकों के लिए ज्यादा उपयुक्त हो सकती है जिन्हें लंबी अवधि के लिए गोल्ड रखना है और जिनके पोर्टफोलियो में इसकी हिस्सेदारी कम है. हालांकि एकमुश्त बड़ी रकम लगाने के बजाय हिस्सों में खरीदारी करना जोखिम को कुछ कम कर सकता है.

होल्ड उन लोगों के लिए ज्यादा व्यावहारिक विकल्प है जिन्होंने पहले से गोल्ड खरीदा हुआ है और जिनका निवेश लंबी अवधि का है. हाल की प्रॉफिट बुकिंग को देखते हुए सिर्फ एक-दो दिन की गिरावट देखकर घबराकर बेचने की जरूरत नहीं मानी जानी चाहिए.

वेट उन लोगों के लिए बेहतर हो सकता है जो केवल हाल की तेजी देखकर बाजार में प्रवेश करना चाहते हैं. 13 अगस्त की गिरावट और उसके बाद 14 अगस्त की रिकवरी बताती है कि बाजार में वॉलेटिलिटी बनी हुई है. इसलिए एफओएमओ यानी तेजी छूट जाने के डर में पूरी रकम एक साथ लगाना जोखिम बढ़ा सकता है. रॉयटर्स के मुताबिक 13 अगस्त को गोल्ड ने दो महीने का उच्च स्तर छूने के बाद प्रॉफिट-टेकिंग देखी थी.  

फेड की चाल सोने के लिए क्यों बन गई सबसे बड़ी कुंजी?

गोल्ड पर ब्याज दरों का असर काफी अहम होता है. जब अमेरिकी ब्याज दरों में कटौती या दरों के स्थिर रहने की उम्मीद बढ़ती है, तो बिना ब्याज देने वाली संपत्ति के रूप में गोल्ड को अपेक्षाकृत समर्थन मिल सकता है.

14 अगस्त के रॉयटर्स अपडेट में अमेरिकी डॉलर की कमजोरी और इन्फ्लेशन डेटा के बाद सितंबर में फेड रेट हाइक की संभावना घटने को गोल्ड की तेजी के प्रमुख कारणों में गिना गया. 

हालांकि कहानी इतनी सीधी भी नहीं है. अगर आगे अमेरिकी महंगाई दोबारा तेज होती है और फेड ज्यादा सख्त रुख अपनाता है तो गोल्ड पर दबाव आ सकता है. इसलिए आने वाले अमेरिकी इन्फ्लेशन, रोजगार और फेड से जुड़े संकेत भारतीय निवेशकों के लिए भी महत्वपूर्ण रहेंगे.

मिडिल ईस्ट और तेल की कीमतें भी बदल सकती हैं समीकरण

सोने को वैश्विक अनिश्चितता में सुरक्षित निवेश के तौर पर देखा जाता है. इस समय मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े घटनाक्रम बाजार की दिशा पर असर डाल रहे हैं.

रॉयटर्स के मुताबिक 14 अगस्त को अमेरिका और ईरान के बीच तनावपूर्ण बातचीत तथा तेल की कीमतों में तेजी के बीच बाजार इन घटनाक्रमों पर नजर रख रहा था. ऊंची तेल कीमतें महंगाई को प्रभावित कर सकती हैं और इससे केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर संबंधी रणनीति पर असर पड़ सकता है.  

यही इस समय गोल्ड का छिपा हुआ जोखिम है. जियोपॉलिटिकल टेंशन बढ़ती है तो गोल्ड को सेफ-हेवन डिमांड मिल सकती है, लेकिन तेल महंगा होने से इन्फ्लेशन बढ़ा और सेंट्रल बैंक्स ज्यादा सख्त हुए तो दूसरी तरफ से गोल्ड पर दबाव बन सकता है.

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आम खरीदार के लिए ₹1.55 लाख का मतलब क्या है?

निवेशक और गहना खरीदने वाले को एक ही गोल्ड रेट देखकर फैसला नहीं करना चाहिए. 24 कैरेट और 22 कैरेट की कीमत अलग होती है. इसके अलावा ज्वैलरी खरीदते समय मेकिंग चार्जेज और जीएसटी जैसी लागत भी अंतिम बिल को बढ़ाती है.

इसलिए अगर कोई व्यक्ति शादी, त्योहार या किसी दूसरे निजी इस्तेमाल के लिए अगले कुछ महीनों में गहना खरीदने वाला है, तो केवल इस उम्मीद में खरीदारी टालना कि गोल्ड जरूर सस्ता होगा, जरूरी नहीं कि सही रणनीति हो. जरूरत तय है तो खरीदारी को दो या तीन हिस्सों में बांटना ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है.

वहीं केवल निवेश के लिए गोल्ड खरीद रहे व्यक्ति के लिए ज्वैलरी की बजाय इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट की लागत, लिक्विडिटी और उद्देश्य को भी देखना जरूरी है.

असली रणनीति कीमत नहीं, खरीदारी का तरीका तय करेगा

₹1.55 लाख के ऊपर गोल्ड पहुंचने के बाद बाजार में सबसे बड़ी गलती यह होगी कि निवेशक सिर्फ अगले टारगेट के पीछे भागे. गोल्ड में आगे तेजी की गुंजाइश हो सकती है, लेकिन बीच में करेक्शन और तेज उतार-चढ़ाव से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

इसलिए इस समय एक व्यावहारिक फॉर्मूला यह हो सकता है कि पूरी रकम एक साथ लगाने के बजाय खरीदारी को हिस्सों में बांटा जाए. पहले से गोल्ड रखने वाला निवेशक अपने एसेट एलोकेशन को देखे और केवल कीमत बढ़ने के डर से अतिरिक्त खरीदारी न करे. वहीं नया निवेशक फेड, डॉलर, रुपये और जियोपॉलिटिकल डेवलपमेंट्स पर नजर रखते हुए धीरे-धीरे एंट्री कर सकता है.

फिलहाल उपलब्ध संकेतों को देखते हुए गोल्ड की कहानी पूरी तरह खत्म होती नहीं दिख रही, लेकिन हाल की तेजी के बाद बाजार में सावधानी भी जरूरी है. यानी निवेशक के लिए सबसे संतुलित रास्ता केवल बाय या केवल वेट नहीं, बल्कि जरूरत और निवेश अवधि के हिसाब से बाय इन पार्ट्स हो सकता है.

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