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सोना खरीदने का सही वक्त आ गया या बड़ी गिरावट का करें इंतजार? एक्सपर्ट से जानिए सराफा बाजार क्या दे रहा है संकेत

When is the right time to buy gold? सराफा बाजार में सोने के दाम में कभी तेज उतार तो कभी चढ़ाव को देखकर निवेशक संशय में हैं कि क्या त्योहारी सीजन से पहले सोना खरीद लेना चाहिए? तो चलिए एक्सपर्ट से जानते हैं कि सोना खरीदने का ये सही समय है या नहीं?

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सोना खरीदने का सही वक्त आ गया या बड़ी गिरावट का करें इंतजार? एक्सपर्ट से जानिए सराफा बाजार क्या दे रहा है संकेत

सोने के भाव को लेकर असमंजस- खरीदें या रुके? (फोटो एआई)

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  • 17 अगस्त को सोना 1.55 लाख पहुंचा
  • दिल्ली में 22 कैरेट 1.42 लाख
  • कमजोर डॉलर ने सोने को सहारा दिया
  • भू-राजनीतिक तनाव से सुरक्षित मांग बढ़ी
  • एकमुश्त खरीद के बजाय किस्त बेहतर

सोना इस समय उस जगह खड़ा है जहां खरीदार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अभी खरीदारी कर ली जाए या कुछ दिन इंतजार किया जाए. 17 अगस्त के सराफा बाजार के भाव ने इस सवाल को और अहम बना दिया है, क्योंकि कीमत में मामूली नरमी के बावजूद सोना ऊंचे स्तर पर टिका हुआ है.

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कमोडिटी एंड शेयर मार्केट एक्सपर्ट देवकृष्ण पांडेय कहते हैं कि 17 अगस्त 2026 को साउथ ईस्ट दिल्ली में 24 कैरेट सोने का भाव 1,55,270 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा. इससे एक दिन पहले 16 अगस्त को यही भाव 1,55,280 रुपये था. यानी एक दिन में सिर्फ 10 रुपये की मामूली गिरावट आई. 22 कैरेट सोना 1,42,340 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर था. 

यह आंकड़ा अपने आप में एक अहम संकेत देता है. सोने की कीमत भले ही बहुत ऊंचे स्तर पर है, लेकिन अभी ऐसी तेज बिकवाली नहीं दिख रही जिससे बाजार में बड़ी गिरावट की पक्की तस्वीर बने. यही वजह है कि 18 अगस्त को खरीदार के लिए सबसे बड़ा सवाल गिरावट आएगी या नहीं से ज्यादा यह है कि अगर गिरावट आती भी है तो कितनी और कितने समय के लिए.

17 अगस्त का भाव क्या बता रहा है?

17 अगस्त को देश के प्रमुख शहरों में भी सोने की कीमत लगभग इसी दायरे में रही. दिल्ली में 24 कैरेट सोना 1,55,270 रुपये, मुंबई और कोलकाता में 1,55,120 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास रहा. दिल्ली में 22 कैरेट का भाव 1,42,340 रुपये दर्ज किया गया.  

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अगस्त की शुरुआत से सोना काफी ऊपर आ चुका है. साउथ ईस्ट दिल्ली के आंकड़ों के अनुसार 1 अगस्त को 24 कैरेट सोने का भाव 1,44,370 रुपये था, जो 17 अगस्त तक बढ़कर 1,55,270 रुपये हो गया. यानी करीब 10,900 रुपये प्रति 10 ग्राम की बढ़त हुई. अगस्त में अब तक सबसे ऊंचा स्तर 16 अगस्त को 1,55,280 रुपये रहा.  

इसका मतलब यह है कि मौजूदा स्तर पर सोना सस्ता नहीं है. जिसने अगस्त की शुरुआत में खरीदारी की थी, उसके मुकाबले आज खरीदने वाले को काफी ऊंची कीमत चुकानी पड़ रही है. इसलिए केवल यह देखकर कि सोना सुरक्षित निवेश है, पूरी रकम एक साथ लगा देना समझदारी नहीं होगी.

क्या सराफा बाजार बड़ी गिरावट का संकेत दे रहा है?

अभी उपलब्ध आंकड़ों को देखें तो सराफा बाजार से बड़ी गिरावट का साफ संकेत नहीं मिल रहा है. उलटे 17 अगस्त को घरेलू बाजार में सोने और चांदी दोनों में मजबूती दिखाई दी.

महाराष्ट्र टाइम्स की 17 अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार सुबह कॉमेक्स पर सोना 1.19 फीसदी बढ़कर 4,464.10 डॉलर प्रति औंस तक पहुंचा था. इसी दौरान MCX पर सोने का वायदा भाव 1.55 लाख रुपये के स्तर पर पहुंच गया, जबकि चांदी का वायदा 0.78 फीसदी बढ़कर 2,37,427 रुपये प्रति किलो तक पहुंचा. 

यहां एक और महत्वपूर्ण बात है. 17 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की तेजी सिर्फ स्थानीय मांग की वजह से नहीं थी. कमजोर अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों के नरम पड़ने से ब्याज दरों को लेकर बाजार की उम्मीदें बदली हैं.

रॉयटर्स की 17 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक कमजोर अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों और डॉलर में नरमी के कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व की निकट अवधि में दरें बढ़ाने की संभावना कम हुई, जिससे सोने को फायदा मिला.   यानी फिलहाल सोने के सामने गिरावट का सबसे बड़ा जोखिम ऊंची कीमत है, जबकि तेजी को सहारा देने वाले कारणों में डॉलर, ब्याज दरों और भू-राजनीतिक अनिश्चितता का योगदान बना हुआ है.

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अमेरिका ईरान तनाव से क्यों मिल रहा सोने को सहारा?

सोने की मौजूदा चाल को समझने के लिए भू-राजनीतिक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अमेरिका ईरान तनाव और पश्चिम एशिया की अनिश्चितता ने निवेशकों को फिर से सुरक्षित परिसंपत्तियों की तरफ देखने पर मजबूर किया है. 17 अगस्त की रिपोर्ट में भी इस तनाव को सोने और चांदी की तेजी के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया.  

रॉयटर्स ने 17 अगस्त को यह भी रिपोर्ट किया कि अगस्त में सोना लगभग 9 फीसदी उछलकर करीब 4,400 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंचा है. यह उस तेज बिकवाली के बाद वापसी है जिसमें जनवरी के रिकॉर्ड स्तर 5,595 डॉलर से सोना जून में 4,000 डॉलर से नीचे तक चला गया था.  लेकिन यहां खरीदार को एक सावधानी भी समझनी चाहिए. भू-राजनीतिक तनाव जितना सोने को ऊपर ले जा सकता है, तनाव कम होने पर वही प्रीमियम तेजी से निकल भी सकता है. इसलिए आज की कीमत देखकर अगले कई महीनों की दिशा तय करना सही नहीं होगा.

कमजोर डॉलर और Fed का रुख कितना महत्वपूर्ण है?

सोने की कीमत के लिए अमेरिकी डॉलर और ब्याज दरों का समीकरण बेहद अहम है. आम तौर पर डॉलर कमजोर होने और ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद बढ़ने पर सोने को सपोर्ट मिलता है, क्योंकि सोना ब्याज नहीं देता और कम दरों के माहौल में इसकी अवसर लागत घटती है.

17 अगस्त को यही तस्वीर दिखाई दी. रॉयटर्स के अनुसार अमेरिकी खुदरा बिक्री में नौ महीनों में पहली बार गिरावट आई और इससे फेड के ब्याज दरों को लेकर बाजार की उम्मीदों में बदलाव आया. डॉलर भी कमजोर हुआ. 

इसका सीधा असर भारतीय खरीदार पर भी पड़ता है. हालांकि भारत में सोने की कीमत केवल अंतरराष्ट्रीय भाव से तय नहीं होती. रुपये की चाल, आयात लागत, स्थानीय प्रीमियम, टैक्स और ज्वेलर के चार्ज भी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं.

यानी अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना थोड़ा नीचे भी आता है, तब भी भारतीय बाजार में उतनी ही मात्रा में गिरावट आना जरुरी नहीं है.

सोना खरीदें या अभी वेट करें?

यहीं पर आम खरीदार के लिए सबसे व्यावहारिक रणनीति निकलती है. अगर खरीदारी शादी, त्योहार या किसी तय जरूरत के लिए करनी है और अगले कुछ हफ्तों या महीनों में सोने की जरूरत पड़ने वाली है, तो पूरी खरीदारी को टालना भी जोखिम भरा हो सकता है.

इसके उलट अगर खरीदारी केवल निवेश के लिए है और तत्काल जरूरत नहीं है, तो 1,55 लाख रुपये से ऊपर के स्तर पर एकमुश्त खरीदारी करने के बजाय चरणबद्ध खरीदारी बेहतर रणनीति हो सकती है.

मसलन, कोई खरीदार अपनी तय रकम का एक हिस्सा अभी लगा सकता है और बाकी रकम संभावित गिरावट के लिए बचाकर रख सकता है. इससे अगर कीमत नीचे आती है तो औसत खरीद भाव कम करने का मौका मिलेगा और अगर सोना फिर तेजी पकड़ता है तो पूरी रकम बाजार से बाहर भी नहीं रहेगी.

यह खास तौर पर इसलिए अहम है क्योंकि रॉयटर्स की रिपोर्ट में सोने के तकनीकी संकेतकों को भी सावधानी का कारण बताया गया है. रिपोर्ट के अनुसार सोना ओवरबॉट स्थिति के करीब पहुंच रहा है और 200-दिन का मूविंग एवरेज लगभग 4,504 डॉलर प्रति औंस एक महत्वपूर्ण प्रतिरोध स्तर है.  इसका मतलब यह नहीं कि कीमत निश्चित तौर पर गिरेगी. लेकिन मौजूदा तेजी के बाद छोटी अवधि में मुनाफावसूली की गुंजाइश जरूर बनती है.

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एक और बड़ा संकेत केंद्रीय बैंकों की खरीदारी

सोने की लंबी अवधि की कहानी केवल छोटे निवेशकों की खरीदारी पर निर्भर नहीं है. केंद्रीय बैंकों की मांग भी बाजार के लिए एक बड़ा सहारा बनी हुई है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार 2026 की पहली तिमाही में केंद्रीय बैंकों और अन्य संस्थानों की सोने की मांग 243.7 टन रही, जो पिछली तिमाही के मुकाबले 17 फीसदी ज्यादा थी. पोलैंड और उज्बेकिस्तान प्रमुख खरीदारों में रहे, जबकि चीन के केंद्रीय बैंक ने भी अपनी सोने की होल्डिंग बढ़ाई. 

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल का 2026 आउटलुक यह भी कहता है कि भू-राजनीतिक जोखिम, केंद्रीय बैंक खरीद और निवेश मांग सोने के लिए सहायक बने रह सकते हैं, जबकि ऊंची कीमतों का असर ज्वेलरी मांग पर पड़ सकता है. 

यही इस समय सोने का सबसे बड़ा विरोधाभास है. कीमत महंगी है, इसलिए आम खरीदार और ज्वेलरी मांग दब सकती है. लेकिन दूसरी तरफ निवेश और केंद्रीय बैंक की मांग कीमत को नीचे आने से रोक सकती है.

आपके के लिए इसका असली मतलब क्या है?

अगर आपके पास शादी या पारिवारिक जरूरत के लिए सोना खरीदने का बजट पहले से तय है, तो केवल सस्ती कीमत का इंतजार करते रहना जोखिम पैदा कर सकता है. पिछले कुछ हफ्तों में कीमत ने जिस तरह तेजी दिखाई है, उससे यह साफ है कि कुछ हजार रुपये की गिरावट के इंतजार में बाजार उलटा ऊपर भी जा सकता है.

दूसरी तरफ निवेशक के लिए कहानी अलग है. 1,55 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास 24 कैरेट सोना पहले ही ऊंचे स्तर पर है. ऐसे में पूरा पैसा एक दिन में लगाने के बजाय कुछ हिस्सों में खरीदारी करना जोखिम को नियंत्रित कर सकता है.

एक महत्वपूर्ण बात और है. 24 कैरेट का बाजार भाव और ज्वेलरी खरीदने की अंतिम कीमत एक जैसी नहीं होती. आभूषण खरीदते समय मेकिंग चार्ज, GST और ज्वेलर का प्रीमियम भी जुड़ता है. इसलिए केवल टीवी या वेबसाइट पर दिख रहे प्रति 10 ग्राम भाव के आधार पर अंतिम बजट तय नहीं करना चाहिए.

आगे सोने में गिरावट कब ज्यादा बढ़ सकती है?

सोने में बड़ी गिरावट के लिए सिर्फ एक दिन की मुनाफावसूली काफी नहीं होगी. इसके लिए कई संकेत एक साथ बदलने होंगे. अगर अमेरिका में आर्थिक आंकड़े मजबूत होते हैं, ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कम होती है, डॉलर मजबूत होता है और पश्चिम एशिया का तनाव कम होता है, तो सोने पर एक साथ कई तरफ से दबाव बन सकता है.

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने भी अपने 2026 आउटलुक में कहा है कि अगर आर्थिक वृद्धि मजबूत होती है, ब्याज दरें ऊंची रहती हैं और अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है तो सोने पर दबाव आ सकता है. इसके उलट कमजोर आर्थिक वृद्धि और कम ब्याज दरों का माहौल सोने को समर्थन दे सकता है. 

इसलिए 18 अगस्त को सबसे बड़ा संकेत यह नहीं है कि सोना कल कितना ऊपर या नीचे जाएगा. असली संकेत यह है कि कीमत ऊंचे स्तर पर टिक रही है या नहीं और वैश्विक बाजार के सपोर्टिंग फैक्टर कितने समय तक कायम रहते हैं.

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निष्कर्ष खरीदारी में जल्दबाजी से ज्यादा रणनीति जरूरी

कमोडिटी एंड शेयर मार्केट एक्सपर्ट देवकृष्ण पांडेय कहते हैं कि 17 अगस्त के 1,55,270 रुपये प्रति 10 ग्राम के 24 कैरेट भाव को देखते हुए यह कहना जल्दबाजी होगी कि सोने में अब बड़ी गिरावट आने वाली है. उसी तरह यह दावा करना भी सही नहीं होगा कि कीमत लगातार बढ़ती ही जाएगी.

सराफा बाजार के मौजूदा संकेत बताते हैं कि सोना ऊंचे स्तर पर है, लेकिन इसके नीचे आने पर खरीदारों की दिलचस्पी बनी रह सकती है. रॉयटर्स के मुताबिक कमजोर डॉलर, Fed से जुड़ी नरम उम्मीदें, भू-राजनीतिक जोखिम और केंद्रीय बैंक की खरीदारी इसके लिए सपोर्ट दे रहे हैं. दूसरी ओर ऊंची कीमत, तकनीकी रूप से ओवरबॉट के करीब स्थिति और कमजोर ज्वेलरी मांग छोटी अवधि में दबाव पैदा कर सकती है.  

इसलिए अगर खरीदारी जरूरी है तो पूरी रकम एक साथ लगाने के बजाय हिस्सों में खरीदना ज्यादा संतुलित रास्ता दिखता है. और अगर खरीदारी केवल निवेश के लिए है, तो थोड़ी गिरावट या बेहतर एंट्री का इंतजार करने के लिए कुछ रकम बचाकर रखना समझदारी हो सकती है.

अंतिम फैसला आपकी जरूरत, निवेश अवधि और जोखिम उठाने की क्षमता पर निर्भर होना चाहिए. सोने की कीमत में कोई भी छोटी अवधि की भविष्यवाणी निश्चित नहीं होती.

नोट यह खबर बाजार में उपलब्ध 17 अगस्त 2026 के सोने के भाव और उपलब्ध वैश्विक बाजार संकेतों के आधार पर तैयार की गई है. सोने की कीमत शहर, शुद्धता, ज्वेलर, प्रीमियम और खरीदारी के समय के अनुसार बदल सकती है. यह निवेश सलाह नहीं है.

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