बिजनेस
रेस्तरां इंडस्ट्री में अब सिर्फ स्वाद और मुनाफे का सिक्का नहीं चलेगा. निवेशक अब उन्हीं फूड ब्रांड्स पर करोड़ों का दांव लगा रहे हैं जो पर्यावरण, समाज और बेहतर गवर्नेंस (ESG) का ख्याल रख रहे हैं. बदलती उपभोक्ता मांग और सख्त नियमों के बीच यह बदलाव आतिथ्य क्षेत्र के भविष्य और आम जनता की जेब दोनों को प्र
क्या आप जानते हैं कि जब आप किसी रेस्तरां में बैठकर खाना ऑर्डर करते हैं, तो आपकी पसंद सिर्फ आपका पेट नहीं भर रही, बल्कि बड़े-बड़े निवेशकों के करोड़ों रुपये के फैसले भी तय कर रही है? जी हां, अब बात सिर्फ मुनाफे या स्वाद तक सीमित नहीं रह गई है. दुनिया भर में करीब 40 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का फंड उन कंपनियों पर नजर गड़ाए बैठा है जो पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझती हैं. इसी बदलाव को बिजनेस की भाषा में ईएसजी (ESG यानी एनवायरनमेंट, सोशल और गवर्नेंस) कहा जा रहा है, जो अब रेस्तरां उद्योग का नया क्रेडेंशियल बन चुका है.
पूरी दुनिया में जितना खाना बनता है, उसका लगभग 30 से 40 फीसदी हिस्सा बर्बाद हो जाता है. इस बर्बादी को लेकर अब निवेशक बेहद गंभीर हैं. सीवाईके हॉस्पिटैलिटीज के डायरेक्टर सिमरनजीत सिंह का मानना है कि रेस्तरां इंडस्ट्री अब उस मोड़ पर आ खड़ी हुई है जहां ईएसजी केवल नियमों का पालन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह टिके रहने का एकमात्र जरिया है. आज के निवेशक सिर्फ रेस्तारां की कमाई नहीं देखते, बल्कि वे यह जांचते हैं कि क्या वहां अनुशासन के साथ काम हो रहा है या सिर्फ बातें की जा रही हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में आपको ऐसे रेस्तरां ज्यादा दिखेंगे जो कचरा कम करते हैं, बिजली-पानी बचाते हैं और प्लास्टिक पैकेजिंग से तौबा कर रहे हैं.
इस पूरे बदलाव के पीछे सबसे बड़ी ताकत खुद उपभोक्ता हैं. आंकड़ों पर गौर करें तो करीब 74% ग्राहक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के लिए थोड़ी ज्यादा कीमत चुकाने को भी तैयार हैं. बेंगलुरु के ओटेरा होटल के जनरल मैनेजर श्रीनिवास अड़िगा कहते हैं कि ईएसजी को अब सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं माना जा सकता. निवेशक अब बहुत बारीकी से यह देखते हैं कि कोई ब्रांड अपने संसाधनों का मैनेजमेंट कैसे करता है, कर्मचारियों को कैसी सुविधाएं देता है और समाज के प्रति उसका क्या नजरिया है.
जब आप किसी ऐसे रेस्तरां को चुनते हैं जो जिम्मेदारी से काम कर रहा है, तो आप अनजाने में ही सही, एक बड़े बदलाव का हिस्सा बन रहे होते हैं. ग्राहकों का यही रुख निवेशकों को भरोसा देता है कि इन रेस्तरां का भविष्य लंबा और सुरक्षित है.
अब सवाल उठता है कि बड़े फंड्स अचानक इतने सचेत क्यों हो गए हैं? एंजेल इन्वेस्टर हरि बालासुब्रमण्यम ने एक बहुत ही पते की बात बताई है. उनके मुताबिक, ज्यादातर निवेश फंड्स ने अपने पार्टनर्स से यह वादा किया होता है कि वे केवल जिम्मेदार कंपनियों में ही पैसा लगाएंगे. यही वजह है कि अब जब भी किसी रेस्तरां को नया फंड चाहिए होता है, तो शेयर एग्रीमेंट (सीपी और सीएस) में ईएसजी की शर्तों को पहले ही जोड़ दिया जाता है. सरकारें भी अब सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग को लेकर नियम कड़े कर रही हैं.
इसका एक छिपा हुआ पहलू यह भी है कि जो रेस्तरां इन नियमों को नहीं मानेंगे, उन्हें आने वाले दिनों में भारी जुर्माना झेलना पड़ सकता है, जिससे वे बंद भी हो सकते हैं. यानी आपका पसंदीदा फूड जॉइंट तभी तक टिकेगा जब वह नियमों के प्रति वफादार रहेगा.
हालांकि, यह रास्ता इतना भी आसान नहीं है. रेस्तरां मालिकों के सामने शुरुआती लागत बढ़ने, सप्लाई चेन को मैनेज करने और डेटा को ट्रैक करने जैसी बड़ी चुनौतियां हैं. सबसे बड़ा संकठ यह है कि पर्यावरण को सुरक्षित रखने वाले तरीकों को अपनाते हुए खाने की कीमतों को आम आदमी के बजट में कैसे रखा जाए.
एक आम उपभोक्ता के तौर पर शुरुआत में आपको शायद कुछ जगहों पर मेनू थोड़ा महंगा लग सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यह आपके स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद साबित होगा. निवेशक भी इस बात को समझते हैं, इसलिए वे उन रेस्तरां पर भरोसा जता रहे हैं जो इन चुनौतियों के बावजूद लगातार सुधार कर रहे हैं.
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