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Silver buying opportunity: चांदी दो दिनों में करीब ₹5,000 किलो फिसली है और 2026 के शिखर से करीब 48 फीसदी नीचे है. इसके बावजूद बाजार में लगातार छठे साल डेफिसिट का अनुमान है. निवेशकों के लिए गिरावट में खरीदारी से ज्यादा जरूरी चरणबद्ध निवेश और जोखिम प्रबंधन है.
चांदी में तेज उछाल के बाद अब गिरावट ने निवेशकों को फिर एक बड़े सवाल के सामने खड़ा कर दिया है. क्या भाव गिरना खरीदारी का मौका है या चांदी में अभी और करेक्शन बाकी है?14 अगस्त 2026 को आई बाजार रिपोर्ट के मुताबिक, चांदी की कीमत दो दिनों में करीब ₹5,000 प्रति किलो नीचे आई है.
कमोडिटी एंड शेयर मार्केट एक्सपर्ट देवकृष्ण पांडेय कहते हैं कि इस गिरावट के पीछे हालिया तेजी के बाद मुनाफावसूली और ईरान को लेकर फिर बढ़ी जियोपॉलिटिकल चिंता जैसे कारण बताए गए हैं. वहीं, 1 Finance Research की रिपोर्ट के अनुसार 2026 के शिखर से चांदी करीब 48 फीसदी नीचे आ चुकी है. इसके बावजूद पांच साल में चांदी का CAGR करीब 27 फीसदी रहा है. यानी गिरावट बड़ी है, लेकिन लंबी अवधि का प्रदर्शन भी निवेशकों के लिए नजरअंदाज करने लायक नहीं है.
चांदी ने इस साल जबरदस्त तेजी दिखाई थी. अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत जनवरी में करीब 122 डॉलर प्रति औंस तक पहुंची थी. इसके बाद मुनाफावसूली शुरू हुई और कीमतों में तेज करेक्शन आया. द वॉल स्ट्रीट जर्नल (The Wall Street Journal) के मार्केट डेटा के अनुसार 13 अगस्त को COMEX चांदी 1.04 फीसदी गिरकर 64.873 डॉलर प्रति औंस पर बंद हुई. यह अपने 52 हफ्ते के उच्चतम स्तर से करीब 43.63 फीसदी नीचे थी. वहीं 14 अगस्त को कॉमैक्स (COMEX) चांदी 64.988 डॉलर प्रति औंस पर बंद हुई थी (सप्ताह के अंत में इसमें कुल 2.61% की साप्ताहिक बढ़त दर्ज की गई थी. सिल्वर अपने 52 हफ्ते के उच्चतम स्तर 115.08 डॉलर, जो 26 जनवरी 2026 को दर्ज किया गया था, जो ये करीब 43.53% नीचे था.
भारत में चांदी में भी हालिया गिरावट का असर दिखा है. Economic Times के अनुसार, MCX पर चांदी दो दिनों में करीब ₹5,000 प्रति किलो फिसली. रिपोर्ट में इस गिरावट को हालिया तेजी के बाद प्रॉफिट बुकिंग और ईरान से जुड़े तनाव के बीच बाजार की बदलती धारणा से जोड़ा गया है. इसका सीधा मतलब यह है कि सिर्फ भाव गिरने को देखकर खरीदारी करना सही रणनीति नहीं होगी. पहले यह देखना होगा कि गिरावट अस्थायी है या बाजार की दिशा ही बदल रही है.
यहां निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि चांदी केवल कीमती धातु नहीं है. इसका इस्तेमाल इंडस्ट्री में भी बड़े पैमाने पर होता है. इसलिए इसकी कीमत पर निवेश मांग के साथ-साथ औद्योगिक मांग, डॉलर, ब्याज दर और वैश्विक अर्थव्यवस्था का भी असर पड़ता है.
Silver Institute के 2026 आउटलुक के मुताबिक, इस साल वैश्विक चांदी बाजार लगातार छठे साल डेफिसिट में रहने का अनुमान है. रिपोर्ट में 2026 का अनुमानित बाजार घाटा 67 मिलियन औंस बताया गया है. कुल सप्लाई 1.5 फीसदी बढ़कर करीब 1.05 अरब औंस पहुंचने का अनुमान है, फिर भी सप्लाई मांग से कम रहने की संभावना है. यही वह बिंदु है जो लंबी अवधि के निवेशकों के लिए चांदी को दिलचस्प बनाता है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर गिरावट पर एकमुश्त पैसा लगा देना चाहिए.
चांदी में हाल की तेज गिरावट यह दिखाती है कि इस एसेट में उतार चढ़ाव काफी तेज हो सकता है. इसलिए निवेशक पूरी रकम एक ही स्तर पर लगाने के बजाय चरणबद्ध तरीके से निवेश कर सकते हैं.
मसलन, किसी निवेशक ने चांदी में लंबी अवधि के लिए रकम लगाने का फैसला किया है तो वह अपनी पूरी पूंजी एक साथ लगाने के बजाय अलग अलग हिस्सों में खरीदारी कर सकता है. इससे अगर कीमत और नीचे जाती है तो औसत खरीद भाव कम करने की गुंजाइश बनी रहती है.यह रणनीति खासतौर पर उन निवेशकों के लिए उपयोगी हो सकती है जो चांदी को ट्रेडिंग के बजाय लंबी अवधि के एसेट के तौर पर देख रहे हैं.
शिखर से करीब 48 फीसदी गिरावट सुनने में बहुत बड़ी लगती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि चांदी अब अपने निचले स्तर पर पहुंच गई है. 1 Finance Research के मुताबिक 2026 के शिखर से चांदी करीब 48 फीसदी नीचे आ चुकी है. फिर भी पांच साल के दौरान इसका CAGR करीब 27 फीसदी रहा है. यानी पुराने रिटर्न को देखकर भविष्य की कीमत तय नहीं की जा सकती. निवेशक को यह देखना होगा कि मौजूदा कीमत पर जोखिम और संभावित रिटर्न का संतुलन कैसा है.
चांदी की खासियत यह है कि इसका इस्तेमाल निवेश के साथ इंडस्ट्रियल सेक्टर में भी होता है. Silver Institute के अनुसार, 2026 में इंडस्ट्रियल फैब्रिकेशन डिमांड करीब 650 मिलियन औंस रहने का अनुमान है, जो चार साल का निचला स्तर होगा. फोटोवोल्टिक सेक्टर में सिल्वर की बचत और कुछ जगहों पर दूसरे पदार्थों से रिप्लेसमेंट इसका एक कारण है. लेकिन दूसरी तरफ डेटा सेंटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल सेक्टर जैसे क्षेत्र चांदी की खपत को सपोर्ट कर सकते हैं.
यही चांदी का छिपा हुआ एंगल है. इसकी कीमत केवल महंगाई या युद्ध जैसी खबरों से तय नहीं होती. आने वाले वर्षों में टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्रियल मांग भी इसकी कहानी का बड़ा हिस्सा हो सकती है.
चांदी समेत कीमती धातुओं पर अमेरिकी ब्याज दर और डॉलर की चाल का बड़ा असर पड़ता है. Upstox के मुताबिक जब डॉलर मजबूत होता है और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो बिना ब्याज देने वाली परिसंपत्तियों पर दबाव आ सकता है. जुलाई में MCX पर सोने और चांदी में आई कमजोरी को मजबूत डॉलर और अमेरिकी फेड की ब्याज दरों को लेकर बदली उम्मीदों से भी जोड़ा गया था. अब अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों के बाद सितंबर में फेड की दर बढ़ाने की उम्मीद कमजोर हुई है.
Reuters के अनुसार, सितंबर में दर बढ़ने की बाजार संभावना 33 फीसदी रह गई, जो पिछले सप्ताह 44 फीसदी थी. हालांकि तेल की कीमत और ईरान से जुड़ा तनाव अभी भी बाजार के लिए जोखिम बना हुआ है. इसलिए चांदी खरीदने वाले निवेशक केवल घरेलू सर्राफा भाव नहीं, बल्कि डॉलर, अमेरिकी ब्याज दर और कच्चे तेल की चाल पर भी नजर रखें.
चांदी में निवेश करने वाले व्यक्ति और MCX पर ट्रेड करने वाले ट्रेडर की रणनीति एक जैसी नहीं होनी चाहिए. ट्रेडर के लिए कीमत के सपोर्ट और रेजिस्टेंस महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि लंबी अवधि के निवेशक के लिए सप्लाई डेफिसिट, इंडस्ट्रियल डिमांड और पोर्टफोलियो में एसेट एलोकेशन ज्यादा अहम हो सकता है.
पहले के बाजार विश्लेषणों में MCX चांदी के लिए ₹2.40 लाख के आसपास महत्वपूर्ण स्तर और ₹2.10 लाख के आसपास मजबूत सपोर्ट का उल्लेख किया गया था. हालांकि मौजूदा बाजार परिस्थितियों में इन स्तरों को पुराने तकनीकी संदर्भ के तौर पर ही देखना चाहिए, निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं. इसलिए केवल यह सोचकर ट्रेड न करें कि भाव पहले बहुत ऊपर जा चुका है और अब वापस वहीं जाएगा. चांदी में तेजी और गिरावट दोनों ही अपेक्षाकृत तेज हो सकती हैं.
अगर कोई व्यक्ति शादी, त्योहार या घरेलू जरूरत के लिए चांदी खरीदना चाहता है तो निवेशक वाली रणनीति पूरी तरह लागू नहीं होगी. उसके लिए सबसे अहम चीज है कि जरूरत कब है और कितनी मात्रा में खरीदनी है.14 अगस्त को भारत में चांदी का रिटेल भाव करीब ₹255 प्रति ग्राम यानी ₹2.55 लाख प्रति किलो बताया गया.
ऐसे खरीदार के लिए भाव का एकदम निचला स्तर पकड़ने की कोशिश जोखिम भरी हो सकती है. जरूरत तय है तो खरीदारी को दो या तीन हिस्सों में बांटना ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है. वहीं सिर्फ निवेश के लिए खरीद रहे व्यक्ति को एकमुश्त रकम लगाने के बजाय लंबी अवधि और चरणबद्ध निवेश पर विचार करना चाहिए.
कमोडिटी एंड शेयर मार्केट एक्सपर्ट देवकृष्ण पांडेय कहते हैं कि चांदी की मौजूदा गिरावट को सीधे तौर पर सस्ता खरीदने का संकेत मानना जल्दबाजी होगी. लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी सही नहीं होगा. एक तरफ कीमत शिखर से करीब 48 फीसदी नीचे आ चुकी है, दूसरी तरफ Silver Institute लगातार छठे साल बाजार में डेफिसिट का अनुमान दे रहा है. यानी चांदी की कहानी में शॉर्ट टर्म में अस्थिरता और लॉन्ग टर्म में सप्लाई की चुनौती दोनों साथ मौजूद हैं.
निवेशक के लिए सबसे अहम सबक यही है कि गिरते भाव में सिर्फ इसलिए खरीदारी न करें क्योंकि कीमत पहले के मुकाबले कम है. अपनी निवेश अवधि तय करें, रकम को हिस्सों में लगाएं और डॉलर, ब्याज दर, तेल तथा इंडस्ट्रियल डिमांड जैसे संकेतकों को लगातार देखते रहें. यही तरीका चांदी की अगली चाल में जोखिम को कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद कर सकता है.