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79 साल में सोना 1700 गुना चढ़ा, चांदी भी पहुंची लाखों में; अब 2036 तक जानिए कितना होगा गोल्ड-सिल्वर?

Sona-Chandi Bhav Forecast in 2036: आजादी के समय 10 ग्राम सोना ₹88.62 और चांदी करीब ₹107 किलो थी. 2026 में सोना डेढ़ लाख रुपये और चांदी ढाई लाख रुपये किलो के आसपास पहुंच चुकी है. अब सवाल है, अगले 10 साल में दोनों धातुओं का भाव कहां तक जा सकता है.

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79 साल में सोना 1700 गुना चढ़ा, चांदी भी पहुंची लाखों में; अब 2036 तक जानिए कितना होगा गोल्ड-सिल्वर?

सोना-चांदी ने 79 साल में कितना बदला खेल और अब आगे 10 साल में क्या होंगे दाम? (फोटो एआई)

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  • 1947 से सोना पहुंचा डेढ़ लाख
  • चांदी भी लाखों किलो तक पहुंची
  • 79 साल में बदला सराफा बाजार
  • 2036 में सोना चार लाख तक?
  • चांदी छह लाख तक पहुंच सकती है

1947 में देश आजाद हुआ तो 10 ग्राम सोने की कीमत ₹100 से भी कम थी. आज वही सोना डेढ़ लाख रुपये के पार है. चांदी भी उस दौर की करीब ₹100 किलो वाली धातु से निकलकर लाखों रुपये किलो के बाजार तक पहुंच चुकी है. 79 साल का यह सफर सिर्फ महंगाई की कहानी नहीं है. यह रुपये की बदलती ताकत, वैश्विक अर्थव्यवस्था, युद्ध, ब्याज दर, केंद्रीय बैंकों की खरीद और भारत की निवेश आदतों का भी आईना है. अब सबसे बड़ा सवाल है कि 2036 में सोना और चांदी कहां होंगे? क्या अगले 10 साल भी पिछली कई दशकों जैसी तेजी दिखेगी या अब रफ्तार कुछ धीमी होगी? चलिए मौजूदा डेटा- रिपोर्ट और कमोडिटी एंड शेयर मार्केट एक्सपर्ट देवृकृष्ण पांडेय से इसे समझते हैं

1947 में सोना 88 रुपये, चांदी करीब 107 रुपये किलो

ऐतिहासिक आंकड़ों के मुताबिक 1947 में 10 ग्राम सोने का भाव करीब ₹88.62 था. वहीं कई प्रकाशित ऐतिहासिक स्रोतों में चांदी का भाव करीब ₹107 प्रति किलो बताया गया है. यानी आजादी के समय 10 ग्राम सोना और आधा किलो चांदी खरीदने के लिए करीब ₹142 ही चाहिए थे. आज की कीमतों से तुलना करें तो तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है.

2026 में सोना करीब ₹1.5 लाख प्रति 10 ग्राम के स्तर पर पहुंच चुका है. आरबीआई की ऐतिहासिक प्राइस सीरीज भी दिखाती है कि सोने की घरेलू कीमत पिछले कई दशकों में लगातार ऊपर गई है, हालांकि बीच-बीच में गिरावट के दौर भी आए हैं. 

79 साल में सोना कहां से कहां पहुंचा?

सोने की कहानी को कुछ प्रमुख पड़ावों से समझिए.

| साल  | 10 ग्राम सोने का भाव |
| ---- | -------------------: |
| 1947 |               ₹88.62 |
| 1950 |             करीब ₹99 |
| 1964 |               ₹63.25 |
| 1970 |                 ₹184 |
| 1980 |          करीब ₹1,330 |
| 1990 |          करीब ₹3,200 |
| 2000 |          करीब ₹4,400 |
| 2010 |         करीब ₹18,500 |
| 2020 |         करीब ₹48,651 |
| 2024 |         करीब ₹75,000 |
| 2025 |       करीब ₹1.35 लाख |
| 2026 | करीब ₹1.5 लाख से ऊपर |

मोतीलाल ओसवाल से मिले डेटा के मुताबिक 1950 से 2026 तक उपलब्ध ऐतिहासिक सीरीज में सोने की कीमत में कई चरणों में तेज उछाल दिखता है. 2000 के बाद इसकी रफ्तार खास तौर पर तेज हुई और 2025-26 में कीमतों ने नया स्तर बनाया. 

RBI के आंकड़े यह भी बताते हैं कि सोने की कीमत का सफर सीधी रेखा नहीं रहा. उदाहरण के लिए 2012 के बाद कुछ वर्षों में कीमतों में गिरावट या ठहराव भी देखने को मिला.  यानी 79 साल का लेसन यह है कि सोना लंबी अवधि में मजबूत रहा है, लेकिन हर साल एक जैसा रिटर्न नहीं देता.

चांदी की कहानी और भी ज्यादा उतार-चढ़ाव वाली

चांदी को कभी आम आदमी का सोना कहा जाता था. लेकिन पिछले कुछ सालों में इसकी कीमत और इंडस्ट्रियल डिमांड दोनों ने इसे निवेशकों के रडार पर ला दिया है.

मोतीलाल ओसवाल के उपलब्ध ऐतिहासिक सीरीज के अनुसार चांदी 1981 में करीब ₹2,715 किलो थी. 2000 में यह करीब ₹7,900 किलो, 2010 में ₹27,255 किलो और 2020 में ₹63,435 किलो तक पहुंची. 2024 में भाव करीब ₹95,700 और 2025 में करीब ₹2.62 लाख किलो तक पहुंचा.  

2026 में कीमतों ने इससे भी ऊपर के स्तर देखे हैं. आईबीजेए के जुलाई के बेंचमार्क आंकड़ों में 999 सिल्वर करीब ₹2.25 लाख प्रति किलो के आसपास थी और अगस्त में बाजार के दूसरे संकेतकों में चांदी करीब ₹2.5 लाख किलो के आसपास दिखाई गई.  यानी चांदी की सबसे बड़ी खासियत उसकी वोलैटिलिटी है. यह तेजी के दौर में सोने से भी तेज भाग सकती है, लेकिन गिरावट में उतनी ही तेज करेक्शन भी दिखा सकती है.

1947 से 2026 तक कितना बदला सराफा बाजार

अगर सिर्फ नॉमिनल प्राइस ग्रोथ देखें तो दोनों धातुओं की तस्वीर चौंकाने वाली है.

| धातु  |     1947 का भाव |   2026 का करीब भाव |                     बदलाव |
| ----- | --------------: | -----------------: | ------------------------: |
| सोना  | ₹88.62/10 ग्राम | ₹1.5 लाख+/10 ग्राम | करीब 1,700 गुना से ज्यादा |
| चांदी |    करीब ₹107/केजी |   करीब ₹2.5 लाख/केजी |      2,000 गुना से ज्यादा |

हालांकि यहां एक जरूरी सावधानी है. 1947 और 2026 के भाव अलग-अलग हिस्टोरिकल मेथडोलॉजी, प्योरिटी, मार्केट बेंचमार्क और तारीखों पर आधारित हैं. इसलिए इस टेबल को इंडिकेटिव लॉन्ग-टर्म कम्पैरिजन समझना चाहिए, बिल्कुल समान बेंचमार्क का वैज्ञानिक इंडेक्स नहीं. फिर भी यह साफ है कि पिछले 79 साल में सराफा बाजार की कीमतों में जबरदस्त बदलाव हुआ है.

सोने की तेजी के पीछे अब सिर्फ महंगाई नहीं

सोने को पहले मुख्य रूप से गहनों और बचत की धातु माना जाता था. अब इसके पीछे इन्वेस्टमेंट डिमांड भी बड़ी ताकत बन चुकी है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक 2026 में सोने का आउटलुक सेंट्रल-बैंक बाइंग, जियोपॉलिटिकल रिस्क, इंटरेस्ट-रेट एक्सपेक्टेशंस और निवेश मांग से काफी प्रभावित हो रहा है. भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड मार्केट्स में से एक है और यहां सालाना नेट डिमांड करीब 800 टन बताई गई है.  

इसके अलावा जब ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद बढ़ती है या डॉलर कमजोर होता है, तो सोने को समर्थन मिल सकता है. 14 अगस्त 2026 को रॉयटर्स ने भी कमजोर डॉलर और अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों से जुड़ी ब्याज दर उम्मीदों को सोने की चाल का अहम कारण बताया.  

लेकिन ऊंची कीमतों का दूसरा पहलू भी है. महंगा सोना ज्वेलरी डिमांड को कमजोर कर सकता है और भारत में इंपोर्ट डिमांड पर दबाव डाल सकता है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने भी ऊंची कीमत और बढ़ी इंपोर्ट ड्यूटी के कारण भारतीय ज्वेलरी, बार और कॉइन डिमांड पर असर की संभावना बताई है. ([वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल][8])

चांदी के अगले 10 साल की कहानी अलग क्यों हो सकती है?

चांदी की मांग सिर्फ निवेश और गहनों तक सीमित नहीं है. इसका बड़ा हिस्सा इंडस्ट्रियल एप्लिकेशंस से आता है. सोलर पैनल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और दूसरी टेक्नोलॉजीज में सिल्वर की भूमिका इसकी लॉन्ग-टर्म डिमांड स्टोरी को मजबूत करती है.

इसी वजह से भारत का प्रेशस-मेटल मार्केट 2030 तक मजबूत ग्रोथ दिखा सकता है. ग्रैंड व्यू रिसर्च के अनुसार भारत का प्रेशस-मेटल मार्केट 2024 के करीब $63.3 बिलियन रेवेन्यू से बढ़कर 2030 में लगभग $125.7 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है और सिल्वर को इस मार्केट में फास्टेस्ट-ग्रोइंग सेगमेंट बताया गया है. लेकिन इंडस्ट्रियल डिमांड जितनी ताकत देती है, उतना ही इकोनॉमिक स्लोडाउन जोखिम भी पैदा करता है. अगर मैन्युफैक्चरिंग या सोलर डिमांड कमजोर होती है तो चांदी पर दबाव आ सकता है.

2036 में सोना कितना हो सकता है?

देव कहते हैं अब सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है. अगले 10 साल के लिए कोई भरोसेमंद संस्था आज यह नहीं बता सकती कि 2036 में सोने का एग्जैक्ट भाव कितना होगा. इसलिए बेहतर तरीका सीनारियो एनालिसिस है. अगर 2026 के करीब ₹1.52 लाख प्रति 10 ग्राम के स्तर को आधार मानकर अगले 10 साल में औसतन 5 फीसदी एनुअल ग्रोथ मानें तो 2036 में कीमत करीब ₹2.47 लाख हो सकती है.

8 फीसदी एनुअल ग्रोथ पर यह करीब ₹3.27 लाख और 10 फीसदी एनुअल ग्रोथ पर करीब ₹3.93 लाख तक पहुंच सकती है.

| 2036 का अनुमान       | औसत सालाना बढ़त |  10 ग्राम सोना |
| -------------------- | --------------: | -------------: |
| सतर्क परिदृश्य       |              5% | करीब ₹2.47 लाख |
| बेस परिदृश्य         |              8% | करीब ₹3.27 लाख |
| तेज तेजी का परिदृश्य |             10% | करीब ₹3.93 लाख |

यह फोरकास्ट नहीं बल्कि मैथमेटिकल सीनारियो है. इसमें भविष्य के वास्तविक सोने के दाम की गारंटी नहीं है.

और यह सावधानी बहुत जरूरी है क्योंकि रॉयटर्स के जुलाई 2026 सर्वे में 29 एनालिस्ट्स का 2026 गोल्ड प्राइस मीडियन फोरकास्ट $4,509 प्रति औंस और 2027 के लिए $4,610 था. यानी एनालिस्ट्स के एस्टिमेट्स भी समय के साथ बदलते हैं.  

2036 में चांदी कितनी हो सकती है?

चांदी में अनसर्टेनिटी और ज्यादा है. 2026 में करीब ₹2.5 लाख प्रति किलो का आधार लें और अगले 10 साल के लिए तीन सीनारियोज बनाएं. 5 फीसदी एनुअल ग्रोथ पर 2036 में चांदी करीब ₹4.07 लाख किलो हो सकती है. 8 फीसदी ग्रोथ पर करीब ₹5.40 लाख और 10 फीसदी ग्रोथ पर करीब ₹6.48 लाख किलो.

| 2036 का अनुमान       | औसत सालाना बढ़त |   1 किलो चांदी |
| -------------------- | --------------: | -------------: |
| सतर्क परिदृश्य       |              5% | करीब ₹4.07 लाख |
| बेस परिदृश्य         |              8% | करीब ₹5.40 लाख |
| तेज तेजी का परिदृश्य |             10% | करीब ₹6.48 लाख |

ये भी केवल गणितीय सीनारियोज हैं, प्राइस टार्गेट्स नहीं. मौजूदा मार्केट फोरकास्ट्स में इससे भी ज्यादा बुलिश एस्टिमेट्स मिलते हैं. उदाहरण के लिए एक हालिया इंडिया-फोकस्ड एनालिसिस में 2030-31 के लिए सिल्वर का बेस केस करीब ₹3.4-3.5 लाख किलो और बुल केस ₹4.8-5 लाख किलो तक रखा गया है. इससे पता चलता है कि अगले 10 साल के अनुमान में अनसर्टेनिटी कितनी ज्यादा है.

2036 तक सोने के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या होगा?

सोने के लिए सबसे बड़ा जोखिम यह नहीं है कि इसकी मांग अचानक खत्म हो जाएगी. असली जोखिम है कि अगर वैश्विक ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहीं, डॉलर मजबूत हुआ और जियोपॉलिटिकल टेंशंस कम हुईं तो सेफ-हेवन डिमांड कमजोर हो सकती है.

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक सेंट्रल-बैंक परचेजेज में बड़ी गिरावट सोने के लिए हेडविंड बन सकती है. वहीं दूसरी ओर जियोपॉलिटिकल रिस्क और अकॉमोडेटिव मॉनेटरी पॉलिसी इसकी कीमत को सपोर्ट कर सकती है.  इसलिए अगले दशक में सोने की चाल के लिए तीन चीजें खास रहेंगी: सेंट्रल-बैंक बाइंग, अमेरिकी ब्याज दरें और ग्लोबल जियोपॉलिटिकल रिस्क.

2036 तक चांदी के लिए सबसे बड़ा मौका और जोखिम

चांदी के लिए सबसे बड़ा ऑपरच्युनिटी इंडस्ट्रियल डिमांड हो सकती है. सोलर, ईवी, इलेक्ट्रॉनिक्स और एआई-रिलेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी टेक्नोलॉजीज के विस्तार से सिल्वर कंजम्प्शन बढ़ने की संभावना बनी हुई है. लेकिन यही इसकी कमजोरी भी है. सोने की तुलना में चांदी इकोनॉमिक साइकिल से ज्यादा जुड़ी है. अगर ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग कमजोर होती है तो सिल्वर पर दबाव सोने से ज्यादा पड़ सकता है. यानी अगले 10 साल में चांदी का संभावित रिवॉर्ड बड़ा हो सकता है, लेकिन वोलैटिलिटी भी ज्यादा रहने की संभावना है.

79 साल का सराफा सबक क्या कहता है?

1947 में ₹88.62 का सोना आज डेढ़ लाख रुपये के पार पहुंच चुका है. करीब ₹107 किलो वाली चांदी भी लाखों रुपये किलो के बाजार में आ गई है. लेकिन इस इतिहास को देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अगले 79 साल या अगले 10 साल में भी बिल्कुल उसी अनुपात में कीमत बढ़ेगी. पिछले 79 साल में रुपये की परचेजिंग पावर बदली, भारत की अर्थव्यवस्था बदली, सोने का वैश्विक बाजार बदला और चांदी की इंडस्ट्रियल यूटिलिटी भी बदल गई. यही वजह है कि 2036 के लिए सबसे समझदार तरीका एक सिंगल टार्गेट पर भरोसा करना नहीं, बल्कि अलग-अलग सीनारियोज को देखना है.

निवेशक के लिए 2026 का मतलब

देव कहते हैं अगर कोई व्यक्ति आज सोना या चांदी खरीद रहा है तो 1947 की कीमत देखकर यह सोचना कि “इतना बढ़ा है तो आगे भी जरूर उतना ही बढ़ेगा” सही रणनीति नहीं होगी. सोना आम तौर पर पोर्टफोलियो में स्टेबिलिटी और डाइवर्सिफिकेशन के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जबकि चांदी में इंडस्ट्रियल डिमांड के कारण ग्रोथ पोटेंशियल के साथ ज्यादा वोलैटिलिटी भी आती है. आभूषण को इन्वेस्टमेंट समझने की गलती भी नहीं करनी चाहिए. ज्वेलरी में मेकिंग चार्जेज और टैक्सेज होते हैं, जबकि बुलियन या अन्य इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट्स की लागत अलग होती है. सबसे अहम बात यह है कि 79 साल का इतिहास भविष्य की गारंटी नहीं है.

यह जरूर बताता है कि समय के साथ सराफा बाजार ने भारतीय परिवारों की संपत्ति में बड़ी भूमिका निभाई है. अगले 10 साल में भी सोने और चांदी की कहानी खत्म होती नहीं दिखती, लेकिन इसकी अगली चैप्टर की रफ्तार ब्याज दर, डॉलर, सेंट्रल-बैंक बाइंग, जियोपॉलिटिक्स और इंडस्ट्रियल डिमांड तय करेगी.

डिस्क्लेमर: 2036 के ₹2.47 लाख, ₹3.27 लाख, ₹3.93 लाख सोना और ₹4.07 लाख, ₹5.40 लाख, ₹6.48 लाख चांदी के आंकड़े सिर्फ सीनारियो कैल्कुलेशंस हैं. ये किसी संस्था या बाजार विशेषज्ञ के निश्चित प्राइस टार्गेट्स नहीं हैं. वास्तविक कीमत इससे काफी कम या ज्यादा हो सकती है.

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