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Gold or silver which is better investment: सोने और चांदी दोनों ने निवेशकों को मजबूत रिटर्न दिया है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि चांदी की तेजी ज्यादा आक्रामक रही है. दूसरी तरफ सोना संकट के समय सुरक्षा देता है. अगले 12 महीनों में फैसला रिटर्न के साथ जोखिम, मांग और सप्लाई पर निर्भर करेगा.
अगर आपके पास अभी ₹1 लाख हैं और सवाल है कि इसे सोने में लगाएं या चांदी में, तो सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि आज कौन सा धातु महंगा है. असली सवाल यह है कि पिछले कुछ सालों में किसने कितना रिटर्न दिया और आगे उसकी मांग किस वजह से बढ़ सकती है.
ताजा आंकड़े इस मुकाबले को दिलचस्प बना रहे हैं. चांदी ने हाल के समय में सोने को काफी पीछे छोड़ा है, लेकिन इसके साथ कीमतों में उतार-चढ़ाव भी ज्यादा रहा है. सोना अपेक्षाकृत स्थिर और संकट के समय मजबूत रहने वाला एसेट रहा है. इसलिए अगले 12 महीने के लिए ज्यादा रिटर्न की संभावना और जोखिम, दोनों को साथ देखना होगा.
सबसे पहले पिछले एक साल का हिसाब देखिए. 30 जून 2026 तक के आंकड़ों में घरेलू सोने की कीमत के बेंचमार्क ने करीब 47.23 फीसदी रिटर्न दिया. वहीं घरेलू चांदी के बेंचमार्क ने इसी अवधि में करीब 112.94 फीसदी रिटर्न दिया. यह आंकड़ा Nippon India के फंड परफॉर्मेंस डेटा में दर्ज घरेलू गोल्ड और सिल्वर बेंचमार्क से लिया गया है.
यानी अगर केवल पिछले एक साल को आधार मानें तो ₹1 लाख का निवेश सोने के बेंचमार्क में लगभग ₹1.47 लाख और चांदी के बेंचमार्क में करीब ₹2.13 लाख के बराबर होता. यह केवल पिछला प्रदर्शन है, भविष्य के रिटर्न की गारंटी नहीं.
यहां एक जरूरी सावधानी है. ये आंकड़े निवेश के वास्तविक खर्च, टैक्स, खरीद-बिक्री के अंतर या ज्वेलरी मेकिंग चार्ज को शामिल नहीं करते. इसलिए अगर कोई व्यक्ति आभूषण खरीदकर यह रिटर्न हासिल करने की उम्मीद कर रहा है, तो वास्तविक रिटर्न इससे अलग हो सकता है.
तीन साल के आंकड़े देखने पर भी चांदी का प्रदर्शन मजबूत दिखाई देता है. 30 जून 2026 तक घरेलू सोने के बेंचमार्क का तीन साल का सालाना कंपाउंडेड रिटर्न करीब 34.53 फीसदी रहा. घरेलू चांदी के बेंचमार्क का तीन साल का सालाना कंपाउंडेड रिटर्न करीब 48.78 फीसदी रहा.
इस हिसाब से अगर तीन साल पहले ₹1 लाख लगाया गया होता और यही CAGR लागू होता, तो गणितीय तौर पर सोने में रकम करीब ₹2.45 लाख और चांदी में करीब ₹3.28 लाख के आसपास पहुंचती.
लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है. CAGR का मतलब यह नहीं है कि हर साल इतना ही रिटर्न मिला. बीच में कीमतों में तेज गिरावट और तेजी दोनों आ सकती हैं. चांदी का स्वभाव सोने की तुलना में ज्यादा उतार-चढ़ाव वाला है.
पांच साल की तस्वीर इस तुलना को ज्यादा संतुलित बनाती है. Invesco Asset Management India के मई 2026 के आंकड़ों के मुताबिक 31 मई 2021 से 29 मई 2026 तक MCX गोल्ड ने करीब 26.1 फीसदी CAGR और MCX सिल्वर ने करीब 29.8 फीसदी CAGR दिया. इसी अवधि में सोने की सालाना अस्थिरता 16.6 फीसदी रही, जबकि चांदी की अस्थिरता 35 फीसदी थी.
यानी पांच साल में चांदी का रिटर्न सोने से थोड़ा ज्यादा रहा, लेकिन उसे पाने के लिए निवेशक को करीब दोगुनी कीमत अस्थिरता झेलनी पड़ी. यही इस पूरे मुकाबले का सबसे अहम डेटा है. चांदी ज्यादा रिटर्न दे सकती है, लेकिन उस रिटर्न का रास्ता ज्यादा झटकों वाला हो सकता है.
अगर ₹1 लाख पांच साल के इसी CAGR से बढ़ता, तो सोने में यह करीब ₹3.21 लाख और चांदी में करीब ₹3.92 लाख होता. यह केवल ऐतिहासिक CAGR पर आधारित गणितीय उदाहरण है, भविष्य का अनुमान नहीं.

नोट: ₹1 लाख का आंकड़ा केवल ऐतिहासिक CAGR पर आधारित गणितीय उदाहरण है, भविष्य के रिटर्न का अनुमान नहीं.
सोने को सिर्फ रिटर्न के चश्मे से देखना सही नहीं होगा. World Gold Council के मुताबिक भारत में घरेलू सोने की कीमत 2026 की पहली तिमाही में सालाना आधार पर 81 फीसदी ऊपर रही और तिमाही औसत ₹1,51,108 प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा. निवेश मांग भी तेजी से बढ़ी और बार तथा कॉइन की मांग पहली तिमाही में 34 फीसदी बढ़कर 62 टन हो गई.
World Gold Council यह भी बताता है कि सोना वित्तीय और भू-राजनीतिक तनाव के दौरान पोर्टफोलियो को सहारा देने वाला एसेट रहा है. रुपये की कमजोरी भी भारत में सोने के रिटर्न को बढ़ा सकती है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत डॉलर में तय होती है.
इसका मतलब है कि सोने की कहानी सिर्फ महंगाई या ज्वेलरी की मांग तक सीमित नहीं है. केंद्रीय बैंक की खरीद, भू-राजनीतिक तनाव, डॉलर और रुपये की चाल तथा निवेश मांग भी इसकी कीमत को प्रभावित करते हैं.
चांदी की खासियत यह है कि यह सिर्फ निवेश की धातु नहीं है. इसका बड़ा हिस्सा उद्योगों में इस्तेमाल होता है. Silver Institute के मुताबिक 2025 में चांदी की औद्योगिक मांग करीब 657.4 मिलियन औंस रही. 2026 में औद्योगिक फैब्रिकेशन करीब 650 मिलियन औंस रहने का अनुमान है.
चांदी की मांग को सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े तकनीकी इस्तेमाल का सहारा मिल रहा है. Silver Institute के मुताबिक डेटा सेंटर और AI से जुड़े टेक्नोलॉजी सेक्टर आने वाले वर्षों में चांदी की औद्योगिक खपत को सपोर्ट कर सकते हैं.
यानी चांदी की कीमत पर सिर्फ निवेशकों की खरीदारी का असर नहीं पड़ता. दुनिया जितनी तेजी से इलेक्ट्रिफिकेशन और डिजिटल टेक्नोलॉजी की तरफ बढ़ेगी, चांदी की इंडस्ट्रियल डिमांड का महत्व भी उतना ही बढ़ सकता है.
Silver Institute के 2026 आउटलुक के मुताबिक चांदी का बाजार लगातार छठे साल डेफिसिट में रहने की उम्मीद है. 2026 में कुल सप्लाई करीब 1.05 अरब औंस रहने का अनुमान है, जबकि बाजार में करीब 67 मिलियन औंस का अनुमानित घाटा रह सकता है. यही चांदी की तेजी का एक बड़ा आधार है. अगर किसी धातु की मांग मजबूत रहे और सप्लाई उतनी तेजी से न बढ़ पाए, तो कीमत पर ऊपर की तरफ दबाव बन सकता है.
लेकिन यहां भी तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है. Silver Institute ने 2026 में औद्योगिक मांग में करीब 2 फीसदी गिरावट का अनुमान लगाया है, मुख्य रूप से सोलर सेक्टर में प्रति यूनिट चांदी का इस्तेमाल घटने और कुछ जगह सिल्वर की जगह दूसरे मटेरियल के इस्तेमाल की वजह से. यानी चांदी के लिए इंडस्ट्रियल डिमांड मजबूत आधार है, लेकिन कीमत बढ़ने के साथ कंपनियां चांदी की खपत घटाने की कोशिश भी कर रही हैं.
गोल्ड-सिल्वर रेशियो बताता है कि एक औंस सोना खरीदने के लिए कितनी औंस चांदी चाहिए. 7 अगस्त 2026 को Reuters के मुताबिक स्पॉट गोल्ड करीब $4,336.02 प्रति औंस और सिल्वर करीब $63.29 प्रति औंस था. इन कीमतों से गोल्ड-सिल्वर रेशियो करीब 68.5 निकलता है. इस अनुपात को निवेशक यह समझने के लिए इस्तेमाल करते हैं कि दोनों धातुओं के बीच सापेक्ष कीमत कैसी है. लेकिन सिर्फ एक रेशियो देखकर खरीदारी का फैसला करना ठीक नहीं है. बाजार का ट्रेंड, मांग, ब्याज दरें और सप्लाई भी साथ देखनी होती है.
अब सबसे अहम सवाल पर आते हैं. अगर आज आपके पास ₹1 लाख हैं तो अगले 12 महीने में सोना ज्यादा देगा या चांदी? इसका ईमानदार जवाब है कि कोई भी संस्था या आंकड़ा अगले 12 महीने का निश्चित रिटर्न नहीं बता सकता. लेकिन मौजूदा आंकड़ों से दो अलग तस्वीरें बनती हैं. चांदी के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क है उसकी तेज हालिया रफ्तार, इंडस्ट्रियल इस्तेमाल और लगातार सप्लाई डेफिसिट. दूसरी तरफ सोने के पक्ष में सुरक्षित निवेश की भूमिका, केंद्रीय बैंक और निवेश मांग तथा वैश्विक अनिश्चितता का सहारा है.
7 अगस्त 2026 को Reuters के मुताबिक सोना एक सप्ताह में 7 फीसदी से ज्यादा चढ़कर सात सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंच गया था, जबकि चांदी भी करीब 3 फीसदी बढ़कर $63.29 प्रति औंस पर पहुंची. इसका एक और मतलब है. दोनों धातुएं पहले ही काफी तेज दौड़ चुकी हैं. इसलिए अगले 12 महीनों में पिछला रिटर्न हूबहू दोहर जाएगा, यह मानकर ₹1 लाख लगाना जोखिम भरा होगा.
अगर आपका पहला लक्ष्य पूंजी को अपेक्षाकृत स्थिर रखना और आर्थिक या भू-राजनीतिक संकट से बचाव करना है, तो सोना ज्यादा स्वाभाविक विकल्प है. अगर आप ज्यादा उतार-चढ़ाव सह सकते हैं और औद्योगिक मांग तथा सप्लाई डेफिसिट की कहानी पर दांव लगाना चाहते हैं, तो चांदी में ज्यादा अपसाइड की संभावना हो सकती है. लेकिन इसके साथ तेज गिरावट का जोखिम भी ज्यादा है.
पिछले पांच साल का डेटा भी यही बताता है. MCX सिल्वर ने 29.8 फीसदी CAGR दिया, लेकिन उसकी सालाना अस्थिरता 35 फीसदी थी. गोल्ड ने 26.1 फीसदी CAGR दिया और अस्थिरता 16.6 फीसदी रही. इसलिए सिर्फ यह सवाल कि सोना या चांदी, अधूरा है. सही सवाल है कि आपका पैसा कितना जोखिम सह सकता है.
सोने और चांदी की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं कि फिजिकल निवेशक को उतना ही रिटर्न मिलेगा. खरीदते समय GST, डीलर का प्रीमियम, खरीद-बिक्री का अंतर और ज्वेलरी में मेकिंग चार्ज रिटर्न को कम कर सकते हैं. यही वजह है कि सिर्फ कीमत देखकर दोनों की तुलना करना अधूरा हिसाब है. निवेश के लिए बार, कॉइन या ETF जैसे विकल्पों में लागत और लिक्विडिटी को अलग से देखना जरूरी है. और सबसे महत्वपूर्ण बात, पिछले एक साल में चांदी ने जिस रफ्तार से रिटर्न दिया है, वही उसका सबसे बड़ा आकर्षण और सबसे बड़ा जोखिम दोनों है. तेज भागने वाला एसेट उतनी ही तेजी से करेक्शन भी दे सकता है.
अगर सिर्फ पिछले 1 और 3 साल के आंकड़ों को देखें तो चांदी साफ तौर पर सोने से आगे रही है. पांच साल के MCX आंकड़ों में भी चांदी आगे है, लेकिन अंतर उतना बड़ा नहीं है और अस्थिरता करीब दोगुनी है. इसलिए अगले 12 महीने में ज्यादा रिटर्न की संभावना के लिहाज से चांदी फिलहाल ज्यादा आक्रामक दांव दिखाई देती है, जबकि सोना अपेक्षाकृत संतुलित और सुरक्षा-केंद्रित विकल्प बना हुआ है. इसे निश्चित भविष्यवाणी नहीं, बल्कि मौजूदा कीमत, ऐतिहासिक प्रदर्शन, मांग और सप्लाई के आंकड़ों पर आधारित आकलन समझना चाहिए.
अगर ₹1 लाख आपके लिए जरूरी बचत है, तो सिर्फ पिछले रिटर्न देखकर पूरी रकम किसी एक धातु में लगाना समझदारी नहीं होगी. सोना स्थिरता देता है, चांदी ज्यादा संभावित रिटर्न के साथ ज्यादा जोखिम लेकर आती है.
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