बिजनेस
Why gold prices are still rising: सोने की रिटेल मांग 6 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है, फिर भी इसकी कीमतें लगातार नए रिकॉर्ड बना रही हैं. आम खरीदार भले ही आभूषणों से दूरी बना रहे हों, लेकिन केंद्रीय बैंकों की भारी खरीदारी और वैश्विक तनाव के कारण कीमतें नीचे नहीं गिर रही हैं.
सोना खरीदने का मन बना रहे आम परिवारों के लिए बाजार का गणित समझ से बाहर होता जा रहा है. अगर आप सोच रहे हैं कि जब दुकानों पर ग्राहक कम हैं और लोग जेवर नहीं खरीद रहे, तो सोने के भाव नीचे क्यों नहीं आ रहे, तो आप अकेले नहीं हैं. भारत में आम लोगों के लिए सोना सिर्फ एक गहना नहीं बल्कि गाढ़े वक्त की बचत होता है. द इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्रट के अनुसार इस समय देश में सोने की खुदरा मांग 6 साल के सबसे निचले स्तर पर आ चुकी है, और इसके बावजूद सर्राफा बाजार में नरमी का कोई नामोनिशान नहीं है.
मार्केट एक्सपर्ट देवकृष्ण पांडेय कहते हैं कि सामान्य आर्थिक नियम कहता है कि जब किसी चीज की मांग घटती है, तो उसके दाम भी नीचे आते हैं. लेकिन सोने के मामले में यह गणित पूरी तरह उल्टा पड़ता दिख रहा है. आभूषणों की दुकानों में पसरा सन्नाटा कीमतों को कम नहीं कर पा रहा है, जिससे शादी-ब्याह के लिए खरीदारी करने वाले परिवार सबसे ज्यादा परेशान हैं. तो चलिए एक्सपर्ट से जानें कि क्यों आर्थिक नियम के विपरीत सोना चल रहा है.
एंजलवन की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की दूसरी तिमाही में भारत में सोने की कुल मांग मात्रा के लिहाज से 6% घटकर 131.4 टन रह गई. इसके बावजूद सोने की ऊंची कीमतों के कारण बाजार का कुल मूल्य 50% बढ़कर रिकॉर्ड ₹1.98 लाख करोड़ पर पहुंच गया. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) का कहना है कि इस समय आभूषणों की खरीदारी में नरमी जरूर दिख रही है, लेकिन निवेश के लिए सोने की मांग मजबूत बनी हुई है. यानी लोग भारी गहने खरीदने से बच रहे हैं, जबकि गोल्ड निवेश उत्पादों में पैसा लगाना जारी रखे हुए हैं. लगातार बढ़ती कीमतों ने उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता को प्रभावित किया है, इसलिए कई परिवार कम वजन के गहने या सीमित खरीदारी का विकल्प चुन रहे हैं. हालांकि WGC का अनुमान है कि साल की दूसरी छमाही में त्योहारों और शादी के सीजन की शुरुआत के साथ सोने की मांग को फिर से सहारा मिल सकता है और बाजार में खरीदारी का माहौल बेहतर होने की उम्मीद है.
जब आम जनता ने बनाई दूरी तो कौन बढ़ा रहा है कीमतें?
देव कहते हैं कि भारत और चीन जैसे देशों में आम तौर पर सोने की खपत का सबसे बड़ा हिस्सा आभूषणों की बिक्री से आता है. लेकिन जब से कीमतें आसमान छूने लगी हैं, मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग ने खरीदारी या तो टाल दी है या फिर पुराने गहनों को बदलकर काम चला रहे हैं. इसके बावजूद कीमतों के लगातार ऊंचे बने रहने की असली वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में छिपा हुआ एक बड़ा बदलाव है.
आज सोने की बाजार दरें आम जनता की दुकानों से की जाने वाली खरीदारी से तय नहीं हो रही हैं. दुनिया भर के केंद्रीय बैंक, खासकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बैंक, बड़े पैमाने पर अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोना जोड़ रहे हैं. जब आम ग्राहक एक-एक ग्राम के लिए बजट देख रहा है, तब ये बड़े संस्थान टन के हिसाब से सोना खरीदकर अपने भंडार में जमा कर रहे हैं.
दुनिया भर में जारी राजनीतिक तनाव, युद्ध के हालात और विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर मंडराता संकट भी सोने को मजबूती दे रहा है. जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितता का माहौल बनता है, तो बड़े संस्थागत निवेशक और सरकारें कागजी मुद्रा या शेयर बाजार के बजाय सोने को सबसे सुरक्षित ठिकाना मानती हैं.
इसके अलावा, दुनिया के बड़े आर्थिक केंद्रों में ब्याज दरों को लेकर जारी उथल-पुथल ने भी बड़े निवेशकों का ध्यान सोने की तरफ खींचा है. लोग आभूषण नहीं, बल्कि गोल्ड ईटीएफ और बुलियन के रूप में सोने में पैसा लगा रहे हैं. यही कारण है कि रिटेल काउंटर भले ही शांत दिख रहे हों, लेकिन वित्तीय बाजारों में सोने की डिजिटल और संस्थागत मांग में कोई कमी नहीं आई है.
1. 'ओल्ड फॉर न्यू' ट्रेड (पुराना सोना देकर नया लेने का ट्रेंड)- जब नए सोने के दाम बहुत बढ़ जाते हैं, तो लोग नया सोना खरीदने के बजाय घर में रखा पुराना सोना देकर उसे रीसायकल करवाकर नए गहने बनवाते हैं. इससे बाजार में नए सोने की 'रिटेल डिमांड' कागजों पर तो कम दिखती है, लेकिन ज्वेलर्स का काम चलता रहता है. आम आदमी के लिए यह महंगाई से निपटने का सबसे व्यावहारिक तरीका बन गया है.
2. डिजिटल गोल्ड और Sovereign Gold Bond (SGB) की तरफ शिफ्ट- लोग अब भौतिक सोने (सिक्के, गहने) में मेकिंग चार्ज और सुरक्षा की चिंता के कारण पैसा लगाने से बच रहे हैं. युवा पीढ़ी डिजिटल गोल्ड, गोल्ड ETF और म्यूचुअल फंड में छोटे-छोटे SIP के जरिए निवेश कर रही है. इस वजह से दुकानों पर जाकर आभूषण खरीदने वालों की भीड़ कम दिखती है, लेकिन कुल निवेश मांग में कमी नहीं आई है-बस तरीका बदल गया है.
3. शादियों के बजट में बदलाव और 'लाइटवेट' ज्वैलरी का बढ़ता क्रेज- महंगे सोने के कारण भारतीय शादियों का पूरा गणित बदल गया है. पहले जहाँ भारी-भरकम सोने के सेट खरीदे जाते थे, अब लोग 14-कैरेट या 18-कैरेट की लाइटवेट और मिनिमलिस्टिक ज्वैलरी को प्राथमिकता दे रहे हैं. लोग अपनी परंपराओं को छोड़े बिना अपने बजट को संभाल रहे हैं, जिससे ज्वेलरी इंडस्ट्री का पूरा डिजाइन और सेलिंग मॉडल बदल रहा है.
4. डी-डॉलरलाइजेशन (De-Dollarization) और दुनिया का सोने पर बढ़ता भरोसा-
वैश्विक स्तर पर कई देश अमरीकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं. इसलिए रूस, चीन, भारत और मध्य पूर्व के देश डॉलर के विकल्प के रूप में अपने सरकारी खजाने में सोना भर रहे हैं. यह एक बड़ा भू-राजनीतिक (Geopolitical) खेल है, जो दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर सोना खरीदने वाले आम व्यक्ति की जेब को सीधा प्रभावित कर रहा है.
5. अनौपचारिक बाजार और रीसाइक्लिंग का असर- जब कीमतें बहुत अधिक होती हैं, तो लोग अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए घर में रखा सोना बेचकर कैश निकालते हैं या फिर 'गोल्ड लोन' लेते हैं. सोने की उच्च दरों ने इसे केवल एक संपत्ति नहीं, बल्कि संकट के समय तुरंत कैश दिलाने वाला सबसे मजबूत 'इमरजेंसी फंड' बना दिया है.
अगर आप आने वाले दिनों में किसी शादी या आयोजन के लिए सोना खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो केवल मांग में कमी देखकर कीमतें घटने का इंतजार करना घाटे का सौदा हो सकता है. मौजूदा रुझान साफ इशारा करते हैं कि जब तक वैश्विक परिस्थितियां पूरी तरह सामान्य नहीं होतीं और केंद्रीय बैंकों की आक्रामक खरीदारी नहीं रुकती, तब तक सोने के भाव में किसी बड़ी गिरावट की उम्मीद कम ही है.
आम परिवारों को अब अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है. भारी-भरकम पारंपरिक गहनों की जगह हल्के वजन के आभूषणों का चलन तेजी से बढ़ रहा है. साथ ही, केवल निवेश के नजरिए से देखने वालों के लिए भौतिक सोना खरीदने के बजाय डिजिटल या वित्तीय विकल्पों पर विचार करना ज्यादा व्यावहारिक साबित हो रहा है.
अपनी राय और अपने इलाके की खबर देने के लिए जुड़ें हमारे गूगल, फेसबुक, x, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सऐप कम्युनिटी से.