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80 रुपये का कर्ज तो किसी ने तांगा चला जुटाए पैसे: जानिए इन 7 लोकल ब्रांड्स के करोड़ों के टर्नओवर वाली कंपनी बनने की कहानी

How small town entrepreneurs built crorepati business:छोटे शहरों के 7 आम लोगों ने अपनी सूझबूझ से बिजनेस शुरू किया और आज करोड़ों का टर्नओवर खड़ा कर दिया है. यह कहानी साबित करती है कि बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए बड़े महानगरों में होना जरूरी नहीं है.

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80 रुपये का कर्ज तो किसी ने तांगा चला जुटाए पैसे: जानिए इन 7 लोकल ब्रांड्स के करोड़ों के टर्नओवर वाली कंपनी बनने की कहानी

इन 7 बिजनेस ने लोकल बाजार से ग्लोबल मार्केट तक पहुंच कैसे बनाई? (फोटो एआई)

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क्या आपके पास भी कोई ऐसा बिजनेस आइडिया है जिसे आप सिर्फ इसलिए शुरू नहीं कर पा रहे क्योंकि आप किसी छोटे शहर या कस्बे में रहते हैं? अगर हां, तो आपको अपनी सोच बदलने की जरूरत है. आज के दौर में सफलता का रास्ता दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों से होकर ही नहीं गुजरता. भारत के बदलते आर्थिक परिदृश्य में असली क्रांति उन छोटे शहरों से आ रही है, जिन्हें कभी मुख्यधारा के बिजनेस नक्शे पर जगह भी नहीं मिलती थी.

आज हम उन 7 चुनिंदा और प्रेरणादायक बिजनेस कहानियों की बात कर रहे हैं, जिन्होंने बहुत ही सीमित संसाधनों के साथ एक छोटे से दायरे से अपनी शुरुआत की थी. आज ये कंपनियां न सिर्फ करोड़ों रुपये का टर्नओवर संभाल रही हैं, बल्कि देश-विदेश में अपनी एक मजबूत पहचान बना चुकी हैं. यह इस बात का सीधा सबूत है कि अगर आपके विजन में दम है, तो आपका भूगोल आपकी सफलता का रास्ता नहीं रोक सकता.

घड़ी डिटर्जेंट: कानपुर की गलियों से निकलकर देश के हर घर तक पहुंचने की जिद

सर्फ और व्हील जैसे बड़े विदेशी और स्थापित ब्रांड्स के बीच अपनी जगह बनाना किसी के लिए भी एक सुदूर सपने जैसा था. लेकिन कानपुर के दो भाइयों, मुरली बाबू और विमल ज्ञानचंदानी ने इस चुनौती को स्वीकार किया. उन्होंने महसूस किया कि आम मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार को एक ऐसे वाशिंग पाउडर की जरूरत है जो किफायती भी हो और कपड़ों की सफाई भी बेहतरीन करे.

उन्होंने बेहद कम पूंजी के साथ एक छोटी सी यूनिट लगाई और 'पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें' का नारा दिया. यह सिर्फ एक विज्ञापन की लाइन नहीं थी, बल्कि आम जनता के साथ सीधा संवाद था. उन्होंने बड़े शहरों के बजाय ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों के बाजारों को अपना निशाना बनाया. आज घड़ी डिटर्जेंट भारत के सबसे बड़े घरेलू ब्रांड्स में से एक है, जिसका सालाना टर्नओवर हजारों करोड़ में है. इसने साबित किया कि जमीन से जुड़ी समझ ही सबसे बड़ी बिजनेस स्ट्रेटेजी होती है.

बालाजी वेफर्स: राजकोट की एक छोटी कैंटीन से मल्टी-करोड़ साम्राज्य तक का सफर

स्नैक्स और नमकीन के बाजार पर हमेशा से बड़े कॉरपोरेट घरानों का कब्जा माना जाता रहा है. लेकिन गुजरात के राजकोट में वीरानी भाइयों ने इस धारणा को पूरी तरह से बदल दिया. उनके सफर की शुरुआत एक सिनेमा हॉल की छोटी सी कैंटीन से हुई थी, जहां वे चिप्स और सैंडविच बेचा करते थे.

उन्होंने देखा कि लोग फ्रेश और क्रिस्पी चिप्स को काफी पसंद कर रहे हैं. इसके बाद उन्होंने खुद की एक छोटी सी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने का फैसला किया. बालाजी वेफर्स ने हमेशा स्वाद की शुद्धता और क्षेत्रीय पसंद को प्राथमिकता दी. उन्होंने अपनी पैकेजिंग और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को इतना मजबूत किया कि आज पेप्सिको जैसी बड़ी कंपनियों को भी वे कड़ी टक्कर दे रहे हैं. पश्चिमी भारत के लगभग हर कोने में आज बालाजी का सिक्का चलता है.

रिलैक्सो फुटवियर: दिल्ली के बाहरी इलाके से देश के पैरों की चप्पल बनने तक

जूतों और चप्पलों के बाजार में रिलैक्सो आज एक ऐसा नाम है जिसे किसी परिचय की जरूरत नहीं है. दो भाइयों, रमेश कुमार दुआ और मुकुंद लाल दुआ ने इसकी शुरुआत बेहद छोटे स्तर पर की थी. उन्होंने महसूस किया कि भारत के आम नागरिक को रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए बेहद टिकाऊ और सस्ती हवाई चप्पलों की सख्त जरूरत है.

उन्होंने फैंसी डिजाइनों के पीछे भागने के बजाय फुटवियर की मजबूती और आराम पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया. स्पार्क्स, फ्लाइट और बहामास जैसे ब्रांड्स के साथ रिलैक्सो ने हर उम्र के ग्राहकों को अपनी ओर खींचा. आज यह कंपनी रोजाना लाखों जोड़ी फुटवियर बनाती है और इसका टर्नओवर करोड़ों में है. यह इस बात का उदाहरण है कि बेसिक जरूरतों को सही ढंग से पूरा करना ही सबसे बड़ा बिजनेस है.

मसाला किंग एमडीएच: सियालकोट से दिल्ली के शरणार्थी कैंप का संघर्ष

महाशय धरमपाल गुलाटी की कहानी विभाजन के दर्द, असीम संघर्ष और कभी न हार मानने वाले जज्बे की दास्तान है. पाकिस्तान के सियालकोट में उनका मसालों का अच्छा खासा कारोबार था, लेकिन विभाजन के बाद उन्हें सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ा. जब वह दिल्ली आए, तो उनके पास बहुत कम पैसे थे. उन्होंने शुरुआत में गुजारे के लिए तांगा भी चलाया.

लेकिन जल्द ही उन्होंने अपने पुराने पुश्तैनी काम 'मसालों के बिजनेस' में वापस लौटने का फैसला किया. उन्होंने करोल बाग में एक छोटी सी दुकान खोली और शुद्ध पिसे हुए मसालों को बेचना शुरू किया, जिस पर लोगों का भरोसा तुरंत जम गया. विज्ञापन की दुनिया में अपने ही ब्रांड का चेहरा बनकर उन्होंने जो विश्वसनीयता बनाई, उसकी मिसाल आज भी दी जाती है. एमडीएच आज दुनिया भर के रसोइयों की पहली पसंद बन चुका है.

पारस डेयरी: बुलंदशहर के एक छोटे से गांव से श्वेत क्रांति की नई इबारत

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले वेद राम ने पारस डेयरी की शुरुआत केवल एक छोटे से दूध कलेक्शन सेंटर से की थी. ग्रामीण भारत में डेयरी बिजनेस हमेशा से असंगठित रहा है, लेकिन वेद राम ने इसे एक व्यवस्थित रूप देने की सोची. उन्होंने सीधे किसानों से संपर्क किया और उन्हें दूध की सही कीमत देना सुनिश्चित किया.

धीरे-धीरे उन्होंने दूध की प्रोसेसिंग और पैकेजिंग पर ध्यान देना शुरू किया. पारस ब्रांड ने घी, छाछ, पनीर और अन्य डेयरी प्रोडक्ट्स के मामले में बाजार में अपनी शुद्धता के कारण एक मजबूत पकड़ बना ली. आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर के बाजारों में पारस डेयरी का एक बहुत बड़ा नाम है और इनका टर्नओवर अरबों रुपये में है.

निरमा: एक पिता का संघर्ष और घर के पीछे बने पाउडर का कमाल

गुजरात के अहमदाबाद के पास एक छोटे से गांव के रहने वाले करसनभाई पटेल की कहानी हर उस व्यक्ति को हिम्मत देती है जो नौकरी के साथ कुछ नया करने की हिम्मत जुटा रहा है. करसनभाई एक सरकारी नौकरी में थे, लेकिन उनका मन कुछ अपना करने का था. उन्होंने अपने घर के पिछले हिस्से में तीन पहिया साइकिल पर घूम-घूम कर वाशिंग पाउडर बेचना शुरू किया.

उस समय बाजार में मिलने वाले डिटर्जेंट पाउडर बहुत महंगे थे. करसनभाई ने महज 3 रुपये प्रति किलो की कीमत पर निरमा पाउडर बेचना शुरू किया, जो उस दौर के बड़े ब्रांड्स से लगभग एक तिहाई कम कीमत थी. इस कम कीमत और बेहतरीन क्वालिटी ने भारतीय गृहणियों का दिल जीत लिया. देखते ही देखते निरमा एक राष्ट्रीय सनसनी बन गया. आज निरमा ग्रुप का बिजनेस डिटर्जेंट से लेकर सीमेंट और शिक्षा के क्षेत्र तक फैल चुका है.

लिज्जत पापड़: 80 रुपये के कर्ज और महिलाओं के आत्मसम्मान की अनोखी मिसाल

यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि सामूहिक महिला सशक्तिकरण की सबसे बड़ी मिसाल है. मुंबई के एक छोटे से इलाके से शुरू हुई इस यात्रा की नींव केवल 7 महिलाओं ने मिलकर रखी थी. उनके पास बिजनेस की कोई बड़ी डिग्री नहीं थी, बस पापड़ बनाने का हुनर था. शुरुआत करने के लिए उन्होंने केवल 80 रुपये का कर्ज लिया था.

इस बिजनेस का सबसे मजबूत पहलू यह था कि इन्होंने कभी भी क्वालिटी से समझौता नहीं किया. जैसे-जैसे मांग बढ़ी, उन्होंने अपने साथ और भी महिलाओं को जोड़ा. आज श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ से देश भर की हजारों महिलाएं जुड़ी हुई हैं और वह आत्मनिर्भर बन चुकी हैं. यह बिजनेस आज करोड़ों का टर्नओवर कर रहा है. यह कहानी हमें सिखाती है कि सोशल बिजनेस मॉडल भी दुनिया में सबसे सफल और टिकाऊ हो सकता है.

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