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Why Nifty is falling despite FPI buying: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की खरीदारी के बावजूद निफ्टी लगातार पांचवें सत्र गिरा है. 18 अगस्त को बाजार की दिशा के लिए 24,200 का सपोर्ट, करीब 89 डॉलर का ब्रेंट क्रूड, 95.60 रुपये का डॉलर भाव और एफपीआई फ्लो अहम रहेंगे. निवेशकों के सामने सावधानी बड़ी चुनौती होगी
18 अगस्त यानी आज मंगलवार को शेयर बाजार में सिर्फ यह देखना काफी नहीं होगा कि निफ्टी हरे निशान में खुलता है या लाल निशान में. असली सवाल यह है कि विदेशी निवेशक खरीदारी कर रहे हैं, फिर भी बाजार की गिरावट क्यों नहीं रुक रही? 17 अगस्त का कारोबार इसका जवाब तलाशने के लिए कई संकेत छोड़ गया है. निफ्टी 50 लगातार पांचवें कारोबारी सत्र गिरकर 24,287.65 पर बंद हुआ, जबकि सेंसेक्स 77,728.16 पर रहा. दोनों प्रमुख सूचकांकों में सोमवार को गिरावट रही.
दूसरी तरफ अगस्त में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी एफपीआई की खरीदारी बाजार के लिए एक अलग तस्वीर दिखा रही है. यही विरोधाभास 18 अगस्त के कारोबार को खास बनाता है.
अगस्त के पहले पखवाड़े में एफपीआई की ओर से भारतीय इक्विटी में करीब 16,621 करोड़ रुपये का नेट निवेश किए जाने की तस्वीर सामने आई है. ऐसे में सामान्य तौर पर उम्मीद की जाती है कि विदेशी पूंजी का यह प्रवाह बाजार को सहारा देगा. लेकिन निफ्टी का लगातार पांच सत्रों तक गिरना बताता है कि इस समय सिर्फ एफपीआई फ्लो बाजार की दिशा तय नहीं कर रहा है.
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण वैश्विक जोखिम और घरेलू बाजार के सामने मौजूद मैक्रो प्रेशर है. मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने क्रूड ऑयल को ऊंचे स्तर पर रखा है. साथ ही रुपये की कमजोरी ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई है. रॉयटर्स के मुताबिक 17 अगस्त को ब्रेंट क्रूड करीब 89 डॉलर प्रति बैरल रहा और रुपया 95.6025 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जो करीब दो हफ्ते का कमजोर स्तर है.यानी विदेशी पैसा बाजार में आ रहा है, लेकिन महंगा तेल, कमजोर रुपया और जियोपॉलिटिकल अनसर्टेन्टी उस सकारात्मक असर को काफी हद तक काट रहे हैं.निवेशक के लिए इसका सीधा मतलब है कि केवल एफपीआई खरीदारी देखकर बाजार में तेजी की उम्मीद करना जोखिम भरा हो सकता है.
17 अगस्त कल दिन सोमवार को निफ्टी 24,287.65 पर बंद हुआ. ऐसे में 24,200 के आसपास का स्तर 18 अगस्त के कारोबार में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है. बाजार के तकनीकी संकेतों में 24,300 से 24,400 का क्षेत्र भी अहम माना जा रहा है. जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ मार्केट स्ट्रैटेजिस्ट आनंद जेम्स के मुताबिक निफ्टी में निकट अवधि में कुछ और उतार-चढ़ाव और गिरावट संभव है, जबकि आगे चलकर 24,850 से 25,100 की तरफ बढ़ने की संभावना बन सकती है. इसका अर्थ यह नहीं है कि 18 अगस्त को बाजार निश्चित रूप से ऊपर या नीचे जाएगा. बल्कि निवेशकों के लिए असली संकेत यह होगा कि निफ्टी महत्वपूर्ण सपोर्ट के आसपास किस तरह व्यवहार करता है.
अगर 24,200 के आसपास खरीदारी आती है और इंडेक्स वापस ऊपर टिकता है तो बाजार में राहत की उम्मीद बढ़ सकती है. इसके उलट इस स्तर के नीचे लगातार कमजोरी आती है तो 24,000 और उसके नीचे के स्तरों पर दबाव बढ़ने की आशंका बन सकती है. यही वजह है कि 18 अगस्त को शुरुआती तेजी को देखकर तुरंत खरीदारी करने के बजाय बाजार के टिकाव को देखना ज्यादा समझदारी भरा हो सकता है.
इस समय बाजार के लिए सबसे बड़ा बाहरी खतरा क्रूड ऑयल है. ब्रेंट क्रूड 17 अगस्त को करीब 89 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. मिडिल ईस्ट तनाव के कारण तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है. भारत की अर्थव्यवस्था के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 फीसदी आयात करता है.
महंगा क्रूड भारत के इंपोर्ट बिल को बढ़ा सकता है. इसका असर रुपये पर पड़ सकता है और कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है.इसका असर हर सेक्टर पर एक जैसा नहीं होगा. एविएशन, पेंट्स, टायर्स, केमिकल्स और कुछ लॉजिस्टिक्स कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आ सकता है. वहीं ऑयल एंड गैस के अलग-अलग कारोबार में प्रभाव अलग हो सकता है.निवेशक के लिए इसका मतलब है कि 18 अगस्त को केवल इंडेक्स नहीं, बल्कि क्रूड-सेंसिटिव स्टॉक्स पर भी नजर रखनी होगी.
17 अगस्त को भारतीय रुपया 95.6025 प्रति डॉलर पर बंद हुआ. रॉयटर्स के मुताबिक ऊंचे तेल दाम और इंपोर्टर्स की डॉलर मांग के कारण रुपये पर दबाव रहा, हालांकि आरबीआई के संभावित हस्तक्षेप ने गिरावट को सीमित किया.
यहां एक दिलचस्प बात है. रुपये पर दबाव है, लेकिन आरबीआई के पास विदेशी मुद्रा का मजबूत कुशन मौजूद है. आरबीआई की एफएक्स स्वैप फैसिलिटी से करीब 57 अरब डॉलर का इनफ्लो आया और भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व 700 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच गया.
इसका अर्थ यह है कि रुपये की कमजोरी को सीधे किसी बड़े करेंसी क्राइसिस के रूप में देखना सही नहीं होगा. आरबीआई के पास वोलैटिलिटी को नियंत्रित करने की क्षमता है.
लेकिन शेयर बाजार के लिए समस्या यह है कि अगर क्रूड लगातार महंगा रहता है और रुपया कमजोर बना रहता है तो महंगाई, कॉरपोरेट मार्जिन और विदेशी निवेशकों के रिटर्न कैलकुलेशन पर असर पड़ सकता है. यानी 18 अगस्त को डॉलर-रुपये का मूवमेंट बाजार के लिए निफ्टी के साथ देखने वाला प्रमुख संकेत होगा.
अगले कुछ दिनों में सेंट्रल बैंक्स से जुड़े संकेत भी बाजार का मूड बदल सकते हैं. आरबीआई की अगस्त पॉलिसी मीटिंग के मिनट्स 19 अगस्त को आने हैं. रॉयटर्स के मुताबिक बाजार में इन मिनट्स के जरिए आगे की इंटरेस्ट-रेट दिशा के संकेत तलाशे जा रहे हैं. उधर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की जुलाई बैठक के मिनट्स भी 19 अगस्त को आने हैं. इसलिए 18 अगस्त को ग्लोबल इन्वेस्टर्स पोजिशनिंग कर सकते हैं.
अगर अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर नरम संकेत मिलते हैं तो डॉलर और यूएस यील्ड्स पर दबाव आ सकता है, जिससे इमर्जिंग मार्केट्स को राहत मिल सकती है. लेकिन हॉकिश संकेत आए तो डॉलर मजबूत होने और विदेशी पूंजी पर दबाव बढ़ने का जोखिम रहेगा.भारत के निवेशक के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एफपीआई फ्लो और रुपये की दिशा दोनों ग्लोबल इंटरेस्ट-रेट एक्सपेक्टेशंस से प्रभावित होते हैं.
आज की सबसे बड़ी चुनौती दिशा की नहीं बल्कि वोलैटिलिटी की होगी.एक तरफ एफपीआई की खरीदारी बाजार को सहारा दे रही है. दूसरी तरफ क्रूड करीब 89 डॉलर पर है, रुपया 95.60 के आसपास है और मिडिल ईस्ट तनाव बना हुआ है. इसके साथ निफ्टी लगातार पांच सत्र गिर चुका है.इसलिए बाजार में ऐसी स्थिति बन सकती है जहां सुबह कमजोरी दिखे और बाद में रिकवरी आ जाए, या शुरुआती तेजी बाद में बिकवाली में बदल जाए.ऐसे माहौल में छोटे निवेशक के लिए सबसे बड़ा जोखिम गलत समय पर पूरा पैसा लगाना हो सकता है.
अगर निफ्टी सपोर्ट के पास टिकता है तो स्टैगर्ड बाइंग यानी थोड़ा-थोड़ा करके निवेश करना ज्यादा संतुलित तरीका हो सकता है. वहीं सपोर्ट टूटने पर जल्दबाजी में एवरेजिंग करने के बजाय अगले संकेत का इंतजार करना बेहतर हो सकता है.
बाजार में कमाई का मौका पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन यह ब्रॉड-बेस्ड आसान कमाई वाला माहौल भी नहीं दिख रहा.17 अगस्त के कारोबार में जहां निफ्टी और सेंसेक्स कमजोर रहे, वहीं स्मॉल-कैप और मिड-कैप इंडिसेज में मामूली बढ़त देखने को मिली. इसका संकेत यह हो सकता है कि बाजार में पूरी तरह रिस्क-ऑफ स्थिति नहीं है और कुछ हिस्सों में स्टॉक-स्पेसिफिक बाइंग जारी है.
अगर हेडलाइन इंडेक्स कमजोर रहते हुए भी मिड-कैप और स्मॉल-कैप में चुनिंदा स्टॉक्स में खरीदारी जारी रहती है तो बाजार के भीतर सेक्टर और स्टॉक रोटेशन की कहानी बन सकती है. इसलिए निवेशक को केवल निफ्टी की लाल या हरी कैंडल देखकर फैसला नहीं करना चाहिए. बाजार के अंदर पैसा कहां जा रहा है, यह भी देखना होगा.
देवकृष्ण पांडेय का आज के लिए कोई सत्यापित सार्वजनिक बयान उपलब्ध नहीं मिला है, इसलिए उनके नाम से कोई डायरेक्ट कोट देना उचित नहीं होगा. हालांकि इस बाजार की मौजूदा स्थिति में उनकी विशेषज्ञ टिप्पणी लेते समय सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होंगे कि क्या 24,200 का सपोर्ट बाजार को संभाल सकता है, एफपीआई की 16,621 करोड़ रुपये की खरीदारी किस हद तक भरोसा दिखाती है, और क्या 89 डॉलर के आसपास क्रूड तथा 95.60 के आसपास रुपया बाजार के लिए ज्यादा बड़ा जोखिम बन चुके हैं. इन सवालों के जवाब से निवेशक को यह समझने में मदद मिलेगी कि मौजूदा गिरावट सिर्फ शॉर्ट-टर्म करेक्शन है या मार्केट सेंटिमेंट में बड़ा बदलाव शुरू हो रहा है.
पहला संकेत निफ्टी का 24,200 के आसपास व्यवहार होगा. यह स्तर बचता है तो रिकवरी की संभावना बनी रह सकती है.
दूसरा संकेत ब्रेंट क्रूड है. 89 डॉलर के आसपास तेल का टिके रहना भारत जैसे इंपोर्टर के लिए चिंता का विषय बना रहेगा.
तीसरा संकेत डॉलर-रुपया है. 95.60 के आसपास रुपया कमजोर रहने पर फॉरेन इन्वेस्टर रिटर्न्स और इंपोर्टेड इन्फ्लेशन दोनों पर असर की चिंता रहेगी.
चौथा संकेत एफपीआई और ब्रॉडर मार्केट फ्लो है. अगर विदेशी खरीदारी के बावजूद इंडेक्स दबाव में रहता है तो यह बताता है कि बाजार में पैसा चुनिंदा हिस्सों में जा रहा है, न कि पूरी तरह ब्रॉड मार्केट रैली में.
आज बाजार को लेकर सबसे सही रणनीति शायद न तो डरकर पूरी तरह बाहर निकलने की है और न ही हर गिरावट को खरीदारी का मौका मानने की. 24,200 के आसपास निफ्टी की प्रतिक्रिया, क्रूड की चाल, रुपये की स्थिति और ग्लोबल रेट एक्सपेक्टेशंस चारों को साथ देखकर फैसला करना ज्यादा जरूरी होगा. एफपीआई का 16,621 करोड़ रुपये का निवेश सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन अकेले इससे बाजार की दिशा तय नहीं होती. मौजूदा समय में तेल और मुद्रा बाजार उस विदेशी पैसे की ताकत को चुनौती दे रहे हैं.
यही 18 अगस्त की असली कहानी है. बाजार में सवाल यह नहीं है कि पैसा आ रहा है या जा रहा है. सवाल यह है कि जो पैसा आ रहा है, क्या वह क्रूड, रुपया और जियोपॉलिटिकल रिस्क के सामने निफ्टी को ऊपर ले जाने के लिए पर्याप्त है.
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