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September 2026 upcoming IPO list: सितंबर 2026 में आईपीओ बाजार बेहद व्यस्त रहने वाला है. 7 सितंबर से 11 मेनबोर्ड आईपीओ खुलने वाले हैं. निवेश से पहले आरएचपी, वैल्यूएशन, कर्ज, प्रमोटर रिकॉर्ड, आईपीओ फंड का इस्तेमाल और ओएफएस जैसे पहलुओं की जांच जरूरी है.
आईपीओ का मौसम लौट आया है और इस बार निवेशकों के सामने विकल्पों की कमी नहीं रहने वाली. अगस्त में मेनबोर्ड और एसएमई मिलाकर बड़ी संख्या में आईपीओ आए, वहीं सितंबर की शुरुआत भी काफी हलचल भरी है. अपस्टॉक्स की 4 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक 7 से 11 सितंबर के बीच 11 मेनबोर्ड आईपीओ सब्सक्रिप्शन के लिए खुलने वाले हैं, जिनसे कुल करीब 7,055 करोड़ रुपये जुटाने की योजना है.
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन सा आईपीओ खुल रहा है. असली सवाल यह है कि इनमें से किसमें आपका पैसा जाना चाहिए. बाजार में एक साथ इतने इश्यू आने पर निवेशक अक्सर इस सोच के साथ कई आईपीओ में आवेदन कर देते हैं कि कहीं न कहीं अलॉटमेंट मिल जाएगा. लेकिन यही रणनीति कई बार पूंजी को ऐसे कारोबार में फंसा सकती है, जिसकी जानकारी निवेशक ने ठीक से जांची ही नहीं होती.
सितंबर के इस आईपीओ कैलेंडर की सबसे दिलचस्प तारीख 9 सितंबर है. इस दिन 6 मेनबोर्ड आईपीओ खुलने की जानकारी है. इनमें मणिपाल पेमेंट एंड आइडेंटिटी सॉल्यूशंस, एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी, रेंटोमोजो, एलसीसी प्रोजेक्ट्स, करमतारा इंजीनियरिंग और स्टीमहाउस इंडिया शामिल हैं.
रेंटोमोजो करीब 1,256 करोड़ रुपये के इश्यू के साथ इस समूह में सबसे बड़ा है. इसके बाद कनौहर इलेक्ट्रिकल्स का करीब 1,056 करोड़ रुपये और करमतारा इंजीनियरिंग का करीब 875 करोड़ रुपये का इश्यू है.
आम निवेशक के लिए इसका सीधा मतलब है कि एक ही सप्ताह में कई आईपीओ के लिए पैसा ब्लॉक हो सकता है. इसलिए सिर्फ ज्यादा आवेदन करने के बजाय उपलब्ध पूंजी को चुनिंदा इश्यू में लगाना ज्यादा अहम हो जाता है.
किसी आईपीओ में पैसा लगाने से पहले कंपनी का रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस यानी आरएचपी सबसे अहम दस्तावेजों में से एक है. इसमें कंपनी के कारोबार, वित्तीय प्रदर्शन, जोखिम, प्रमोटर्स और आईपीओ से जुटाए जाने वाले पैसे के इस्तेमाल जैसी जानकारी मिलती है.
निवेशक को सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि कंपनी का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है या उसका नाम बाजार में चर्चित है. बिक्री, मुनाफा, कैश फ्लो और कर्ज की स्थिति भी देखनी चाहिए. किसी कंपनी की बिक्री बढ़ रही हो लेकिन नकदी लगातार कमजोर हो रही हो, तो तस्वीर उतनी मजबूत नहीं हो सकती जितनी पहली नजर में दिखाई देती है.
यही वह हिस्सा है जहां आम निवेशक अक्सर जल्दबाजी कर जाता है. आईपीओ का प्रॉस्पेक्टस लंबा होता है, लेकिन निवेश का पैसा आपका है, इसलिए कम से कम कंपनी के कारोबार, जोखिम और वित्तीय आंकड़ों वाला हिस्सा जरूर पढ़ना चाहिए.
किसी इश्यू को समझने का एक और महत्वपूर्ण तरीका यह देखना है कि कंपनी शेयर बाजार से पैसा क्यों जुटा रही है.
अगर नया पैसा कारोबार बढ़ाने, नई परियोजना शुरू करने, क्षमता बढ़ाने या दूसरे उत्पादों में विस्तार के लिए इस्तेमाल होना है, तो यह एक सकारात्मक संकेत हो सकता है. लेकिन अगर इश्यू में ऑफर फॉर सेल यानी ओएफएस का हिस्सा बड़ा है, तो निवेशक को यह समझना चाहिए कि पुराने शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी बेचकर पैसा निकाल रहे हैं.
इसका मतलब यह नहीं कि ओएफएस वाला आईपीओ खराब है. लेकिन निवेशक को यह जरूर समझना चाहिए कि उसके पैसे का कितना हिस्सा कंपनी के कारोबार में जाएगा और कितना पैसा बेचने वाले शेयरधारकों को मिलेगा.
आईपीओ में सबसे बड़ा जाल सिर्फ कमजोर कंपनी नहीं, बल्कि महंगी वैल्यूएशन भी हो सकती है. कारोबार अच्छा होने के बावजूद अगर शेयर की कीमत कंपनी की कमाई और सेक्टर की दूसरी कंपनियों की तुलना में बहुत ज्यादा है, तो भविष्य का रिटर्न दबाव में आ सकता है.
इसलिए निवेशक को पीई यानी प्राइस टू अर्निंग, डेट टू इक्विटी, प्रॉफिट मार्जिन, ईपीएस और आरओई जैसे आंकड़ों की तुलना कंपनी की पीयर्स यानी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों से करनी चाहिए.
यह तुलना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि एक ही सेक्टर की दो कंपनियों में कारोबार का आकार अलग हो सकता है, लेकिन निवेश के लिए सवाल यह होता है कि बाजार जिस कीमत पर कंपनी को खरीदने का मौका दे रहा है, वह कीमत उसके प्रदर्शन के मुकाबले कितनी उचित है.
आईपीओ के समय ग्रे मार्केट प्रीमियम यानी जीएमपी निवेशकों के बीच खूब चर्चा में रहता है. लेकिन इसे निवेश का पक्का संकेत मानना सही नहीं है.
जीएमपी तेजी से बदल सकता है और यह कंपनी के लंबे समय के कारोबार की गारंटी नहीं देता. किसी शेयर का लिस्टिंग पर अच्छा प्रदर्शन करना और अगले कई साल तक अच्छा निवेश बने रहना दो अलग-अलग बातें हैं.
इसलिए अगर किसी आईपीओ का जीएमपी बहुत मजबूत दिख रहा है, तब भी आरएचपी, वैल्यूएशन, कर्ज और कंपनी की कमाई की जांच जरूरी है. यही अंतर शॉर्ट टर्म लिस्टिंग गेन और लॉन्ग टर्म निवेश के बीच है.
सितंबर 2026 में फिलहाल घोषित कैलेंडर के मुताबिक मेनबोर्ड सेगमेंट में ये प्रमुख आईपीओ सामने हैं. अपस्टॉक्स के मुताबिक 7 से 11 सितंबर के बीच 11 मेनबोर्ड इश्यू आने वाले हैं. नीचे उन्हीं में शामिल कंपनियों की लिस्ट दी जा रही है.
मेनबोर्ड आईपीओ की अगली बड़ी कतार में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई का नाम भी है. मौजूदा आईपीओ कैलेंडर में इसका 21 से 23 सितंबर का शेड्यूल दिखाया जा रहा है, हालांकि अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर इसकी तारीख को लेकर स्थिति पूरी तरह एक जैसी नहीं है. इसलिए निवेशकों को अंतिम तारीख और इश्यू डिटेल के लिए आधिकारिक घोषणा देखनी चाहिए. यानी सितंबर का आईपीओ बाजार सिर्फ अगले हफ्ते तक सीमित नहीं रहने वाला. इसके बाद भी बड़े इश्यू सामने आ सकते हैं.
इतने सारे आईपीओ देखकर हर इश्यू में आवेदन करना जरूरी नहीं है. बेहतर तरीका यह है कि पहले अपनी निवेश राशि तय करें और फिर कंपनियों को कारोबार, वित्तीय स्थिति, वैल्यूएशन और इश्यू के उद्देश्य के आधार पर छांटें. सबसे पहले आरएचपी पढ़ें. फिर देखें कि कंपनी पैसा किस काम के लिए जुटा रही है. इसके बाद कर्ज, कैश फ्लो और मुनाफे की स्थिति को समझें. अंत में उसी सेक्टर की दूसरी कंपनियों से वैल्यूएशन की तुलना करें.
सबसे अहम बात यह है कि आईपीओ को सिर्फ लिस्टिंग वाले दिन के संभावित मुनाफे से न देखें. कंपनी अगर लंबे समय तक अच्छा कारोबार नहीं कर पाती है तो शुरुआती लिस्टिंग गेन भी निवेश की पूरी कहानी नहीं बनता. सितंबर में आईपीओ की यह भीड़ निवेशकों के लिए मौका जरूर है, लेकिन असली फायदा उसी को मिलेगा जो भीड़ देखकर नहीं, आंकड़े देखकर आवेदन करेगा.
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