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Health insurance hidden clauses checklist for covid: देश में कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच बीमा कंपनियों के कुछ छिपे हुए नियम लोगों के लिए मुसीबत बन सकते हैं. कंपनियों के 5 'हिडन क्लॉज' ऐसे हैं जिससे लोगों को इलाज का आधा खर्च खुद उठाना पड़ सकता है.
कोविड क्लेम के हिडन क्लॉज हो गए उजागर.
होम आइसोलेशन का खर्च नहीं मिलेगा.
रूम रेंट लिमिट से कटेगा क्लेम.
सैनिटाइजर-मास्क नॉन-पेयबल लिस्ट में शामिल.
को-पेमेंट की शर्त से जेब खाली हो सकती है.
अगर आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी है और आप यह सोचकर बेफिक्र बैठे हैं कि कोरोना होने पर जेब से एक भी रुपया नहीं लगेगा, तो आप बहुत बड़े धोखे में हैं. देश के कुछ हिस्सों में कोविड-19 के मामले एक बार फिर चुपके से रफ्तार पकड़ रहे हैं. हालांकि राहत की बात यह है कि अस्पतालों पर अभी पहले जैसा दबाव नहीं है, लेकिन इंश्योरेंस सेक्टर से जो खबरें छनकर आ रही हैं, वह किसी भी आम परिवार का बजट बिगाड़ सकती हैं. सच बात तो यह है कि बीमा कंपनियों की पॉलिसी बुकलेट में कुछ ऐसे 'सीक्रेट रूल' और छिपे हुए क्लॉज होते हैं, जिनकी तरफ एजेंट कभी आपका ध्यान नहीं ले जाते. आइए सीधे बात करते हैं उन 5 हिडन क्लॉज की, जो मेडिकल इमरजेंसी के वक्त आपको कंगाल बना सकते हैं.
कोविड की इस नई लहर में ज्यादातर मरीजों को हल्के लक्षण होने पर डॉक्टर घर पर ही रहकर इलाज (होम आइसोलेशन) की सलाह दे रहे हैं. यहीं पर बीमा कंपनियों का सबसे बड़ा सीक्रेट रूल काम करता है. स्टैवेल हेल्थ के सह-संस्थापक अरुण राममूर्ति के अनुसार, अधिकांश पॉलिसियां केवल तभी क्लेम देती हैं जब मरीज कम से कम 24 घंटे अस्पताल में भर्ती रहा हो. अगर आप घर पर रहकर ठीक हो रहे हैं, तो डॉक्टर की ऑनलाइन कंसल्टेशन फीस, होम नर्सिंग और महंगी दवाओं का पूरा खर्च आपकी जेब से जाएगा, जब तक कि आपकी पॉलिसी में 'ओपीडी' या विशिष्ट 'होम केयर' का अलग से राइडर शामिल न हो.
अस्पताल में भर्ती होने के बाद जब बिल बनता है, तो उसमें एक बड़ा हिस्सा 'कंज्यूमेबल्स' यानी डिस्पोजेबल चीजों का होता है. कोविड के इलाज में इस्तेमाल होने वाले पीपीई किट, एन-95 मास्क, सैनिटाइजर, ग्लव्स, पल्स ऑक्सीमीटर और यहां तक कि मरीजों को दिए जाने वाले न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स भी बीमा कंपनियों की 'नॉन-पेयबल' लिस्ट में आते हैं. क्लेम पास करते समय कंपनियां इन सभी चीजों का पैसा कुल बिल में से काट लेती हैं, जो कि हजारों रुपये में बैठता है. यह वह अदृश्य खर्च है जो कैशलेस इलाज के बाद भी आपको अस्पताल के काउंटर पर खुद चुकाना पड़ता है.
यह हेल्थ इंश्योरेंस का सबसे खतरनाक और छिपा हुआ क्लॉज है. अगर आपकी पॉलिसी में रूम रेंट (कमरे के किराए) की कोई सीमा तय है (जैसे कुल बीमा राशि का 1% या ₹5,000 प्रतिदिन) और आप कोविड के समय जल्दबाजी में उससे महंगे कमरे में भर्ती हो जाते हैं, तो सिर्फ कमरे का अंतर ही आपकी जेब से नहीं जाता. बीमा कंपनियां 'अनुपातिक कटौती' (Proportionate Deduction) का नियम लागू करती हैं. इसके तहत डॉक्टर की फीस, आईसीयू का खर्च, ऑपरेशन और दवाओं के बिल में से भी उसी अनुपात में कटौती कर दी जाती है. नतीजा यह होता है कि 5 लाख का बिल होने पर भी कंपनी केवल 3 लाख ही पास करती है.
कई लोग प्रीमियम कम करने के चक्कर में या पुरानी पॉलिसी के नियमों को न जानने के कारण 'को-पेमेंट' क्लॉज का शिकार हो जाते हैं. इस क्लॉज का सीधा मतलब यह है कि इलाज के कुल जायज बिल का एक निश्चित हिस्सा (जैसे 10% या 20%) पॉलिसीधारक को खुद अपनी जेब से देना होगा, चाहे अस्पताल नेटवर्क में हो या बाहर. कोविड जैसी संक्रामक बीमारी में जब पूरा परिवार इसकी चपेट में आ जाता है, तो यह 20% की रकम भी मिडिल क्लास परिवार की पूरी जमा-पूंजी साफ करने के लिए काफी होती है.
नौकरीपेशा लोग अक्सर अपने नियोक्ता (कंपनी) द्वारा दिए गए ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस के भरोसे बैठे रहते हैं. इस इंश्योरेंस का सबसे बड़ा हिडन रिस्क यह है कि यह केवल आपकी नौकरी रहने तक ही वैध है. अगर देश में आर्थिक मंदी या किसी अन्य कारण से नौकरी पर आंच आती है, तो कवर उसी दिन खत्म हो जाता है. इसके अलावा, ग्रुप पॉलिसियों में अक्सर पूरे परिवार के लिए एक 'फ्लोटर' अमाउंट होता है, जो कोविड जैसी महामारी में, जहां एक साथ कई सदस्य बीमार पड़ सकते हैं, बेहद कम साबित होता है.
IRDAI के नियमों के मुताबिक, किसी भी सामान्य हेल्थ इंश्योरेंस में 'कंज्यूमेबल्स' (मास्क, पीपीई किट, ग्लव्स) को नॉन-पेयबल लिस्ट (List I) में रखा गया है. नियामक ने कंपनियों को छूट दी है कि वे इन खर्चों को क्लेम से बाहर रख सकती हैं, जब तक कि ग्राहक ने अलग से 'Riders' या 'Add-on Cover' न लिया हो.
कोरोना महामारी की पिछली लहरों के दौरान GIC के आंकड़ों से यह सामने आया था कि कुल कोविड दावों (Claims) में से लगभग 20% से 25% तक का खर्च नॉन-मेडिकल आइटम्स, रूम रेंट कैपिंग और अन्य हिडन चार्जेस के कारण पॉलिसीधारकों को अपनी जेब से भरना पड़ा था.
बीमारी कभी बताकर नहीं आती, इसलिए आज ही अपनी पॉलिसी के दस्तावेजों को निकालकर उनके 'नियम और शर्तें' वाले कॉलम को ध्यान से पढ़ें. केवल यह देखना काफी नहीं है कि कोविड कवर है या नहीं; यह देखिए कि रूम रेंट की सीमा क्या है और क्या उसमें कोई को-पेमेंट की शर्त जुड़ी है. अगर आपकी बीमा राशि आज के मेडिकल खर्चों के हिसाब से कम है, तो तुरंत एक 'सुपर टॉप-अप' प्लान लेकर खुद को सुरक्षित करें, ताकि ऐन वक्त पर अस्पताल के काउंटर पर आपको अपनी जेब न देखनी पड़े.
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