बिजनेस
How to Start an Eco-friendly Food Box, Cup, and Plate Startup: कृषि अपशिष्ट और बायोमास से इको फ्रेंडली पैकेजिंग और डिस्पोजेबल कटलरी बनाने का बिजनेस कम पूंजी में शुरू किया जा सकता है. 50 हजार से 1.5 लाख रुपये तक के निवेश में काम शुरू कर लोकल ग्राहकों को सप्लाई की जा सकती है.
Manufacturing business started with just ₹50,000: जिस पराली और गन्ने के बचे हिस्से को अक्सर किसान के लिए परेशानी माना जाता है, वही किसी छोटे कारोबारी के लिए कमाई का कच्चा माल बन सकता है. बायोमास से प्लेट, दोने और फूड बॉक्स बनाने का कारोबार ग्रामीण और सेमी अर्बन इलाकों में शुरू किया जा सकता है.
इस बिजनेस की खास बात यह है कि इसमें महंगे कच्चे माल पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय कृषि अवशेषों का इस्तेमाल किया जाता है. गन्ने का बगैस, धान की पराली और नारियल के रेशे जैसे मटेरियल से इको फ्रेंडली प्रोडक्ट तैयार किए जा सकते हैं.
सिंगल यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल पर नियम सख्त होने के बाद प्लेट, कप, चम्मच, फोर्क और ट्रे जैसे कई प्लास्टिक कटलरी आइटम पर प्रतिबंध लागू है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार 1 जुलाई 2022 से कई सिंगल यूज प्लास्टिक आइटम प्रतिबंधित किए गए, जिनमें प्लेट, कप, ग्लास, फोर्क, चम्मच, चाकू और ट्रे भी शामिल हैं.
यही बदलाव इस बिजनेस के लिए सबसे बड़ा कारोबारी मौका बनाता है. जहां पहले ढाबे, कैटरिंग कारोबारी और फूड सर्विस कंपनियां प्लास्टिक प्रोडक्ट पर निर्भर थीं, वहां अब दूसरे विकल्पों की जरूरत बढ़ती है.
फिक्की की सस्टेनेबल पैकेजिंग से जुड़ी रिपोर्ट्स भी पैकेजिंग में प्लास्टिक के इस्तेमाल और उसके बाद होने वाले वेस्ट से जुड़ी चुनौतियों को रेखांकित करती हैं. रिपोर्ट में पैकेजिंग को ज्यादा रिसाइकिलेबल और सस्टेनेबल बनाने की जरूरत पर जोर दिया गया है.
इस कारोबार को शुरू करने के लिए करीब 50,000 रुपये से 1.5 लाख रुपये तक की जरूरत होगी. छोटी मैनुअल या सेमी ऑटोमैटिक मोल्डिंग मशीन से शुरुआत की जा सकती है.
बेसिक सेटअप में मोल्डिंग डाई और हाइड्रोलिक प्रेस मशीन प्रमुख हिस्सा होंगे. शुरुआत में बहुत ज्यादा प्रोडक्ट बनाने के बजाय प्लेट, दोने या फूड बॉक्स में से एक या दो प्रोडक्ट पर फोकस करना ज्यादा सही रहेगा. इसका फायदा यह होगा कि कारोबारी पहले लोकल मार्केट में मांग को समझ सकेगा और उसके बाद मशीनरी तथा उत्पादन क्षमता बढ़ा सकता है.
इस बिजनेस में सबसे दिलचस्प पहलू कच्चा माल है. गन्ने का बगैस, धान की पराली और नारियल के रेशे जैसे कृषि अवशेष कई इलाकों में आसानी से मिल सकते हैं. ग्रामीण या सेमी अर्बन क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति के लिए यह लागत को नियंत्रित करने का मौका देता है.
लेकिन यहां एक छिपी हुई चुनौती भी है. सिर्फ सस्ता कच्चा माल मिलना काफी नहीं है. उसकी क्वालिटी, नमी, स्टोरेज और लगातार सप्लाई भी जरूरी होगी. इसलिए मशीन खरीदने से पहले आसपास के किसानों, शुगर मिल, एग्रो प्रोसेसिंग यूनिट या स्थानीय सप्लायर से कच्चे माल की उपलब्धता तय करना ज्यादा समझदारी होगी. यही इस बिजनेस का वह हिस्सा है जिसे नया कारोबारी अक्सर नजरअंदाज कर देता है.
तैयार प्रोडक्ट बेचने के लिए बहुत बड़ा नेटवर्क शुरुआत में जरूरी नहीं है. लोकल टिफिन सेंटर, कैटरर्स, ढाबे, चाय की दुकानें, फूड स्टॉल और छोटे रेस्टोरेंट शुरुआती ग्राहक बन सकते हैं. इसके बाद कारोबारी बड़े कैटरिंग कारोबार, फूड डिलीवरी से जुड़े बिजनेस और पर्यावरण के प्रति जागरूक अर्बन ई कॉमर्स ब्रांड्स को सप्लाई कर सकता है.
दिए गए बिजनेस मॉडल के अनुसार इस कारोबार में 30 फीसदी से 50 फीसदी तक मार्जिन मिल सकता है. हालांकि वास्तविक मार्जिन उत्पादन लागत, कच्चे माल की कीमत, बिजली, मजदूरी, पैकेजिंग, ट्रांसपोर्ट और ऑर्डर की मात्रा पर निर्भर करेगा.
नए उद्यमी के लिए मशीन खरीदने से पहले ट्रेनिंग लेना उपयोगी रहेगा. खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की पीएमएफएमई योजना में माइक्रो फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स के लिए कैपेसिटी बिल्डिंग और ट्रेनिंग का प्रावधान है. मंत्रालय की वेबसाइट पर योजना के तहत ट्रेनिंग, अपग्रेडेशन, कॉमन इंफ्रास्ट्रक्चर और मार्केटिंग से जुड़े सपोर्ट का उल्लेख है.
हालांकि यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है. पीएमएफएमई मुख्य रूप से माइक्रो फूड प्रोसेसिंग एंटरप्राइजेज के लिए है, इसलिए इस डिस्पोजेबल कटलरी बिजनेस के लिए किसी भी सरकारी लाभ को अपने आप मिलने वाला मानकर निवेश नहीं करना चाहिए. पात्रता और लागू योजना की जानकारी संबंधित विभाग से जांचना जरूरी होगा.
सबसे पहले अपने इलाके में यह पता करें कि बगैस, धान की पराली या नारियल के रेशे में से कौन सा कच्चा माल लगातार और कम कीमत पर मिल सकता है. इसके बाद मोल्डिंग डाई और हाइड्रोलिक प्रेस मशीन की कीमत और क्षमता की तुलना करें.
शुरुआत में लोकल ग्राहकों को छोटे ऑर्डर देकर प्रोडक्ट की मजबूती, क्वालिटी और इस्तेमाल का फीडबैक लिया जा सकता है. जब नियमित ऑर्डर आने लगें, तभी उत्पादन बढ़ाना बेहतर होगा.
इस बिजनेस में सिर्फ मशीन लगाकर प्रोडक्ट बनाना कमाई की गारंटी नहीं है. असली कमाई तब बनेगी जब कारोबारी सस्ता कच्चा माल, लगातार उत्पादन और पक्के खरीदारों का नेटवर्क एक साथ तैयार कर पाएगा.
इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कृषि कचरे को कमर्शियल प्रोडक्ट में बदला जाता है. यानी एक तरफ किसानों और एग्रो प्रोसेसिंग से निकलने वाले अवशेषों के लिए उपयोग पैदा होता है, वहीं दूसरी तरफ प्लास्टिक के विकल्प के रूप में बाजार में बेचने लायक प्रोडक्ट तैयार होता है.
कम पूंजी से शुरू होने की वजह से यह कारोबार उन लोगों के लिए दिलचस्प हो सकता है जो बड़ा कारखाना लगाने के बजाय छोटे स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग शुरू करना चाहते हैं. लेकिन मशीन खरीदने से पहले लोकल डिमांड और कच्चे माल की उपलब्धता की जांच करना सबसे जरूरी कदम रहेगा.
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