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क्या जेब में कैश रखना अब गुजरे जमाने की बात है? RBI के आंकड़ों ने उड़ाई ATM मशीन बनाने वालों की नींद!

देश में एक समय पर एटीएम मशीनों से पैसे निकालने वालों की लंबी कतार लगी रहती थी, लेकिन अब क्यूआर कोड स्कैन करने का रुझान कई गुणा बढ़ चुका है. इसके चलते एटीएम मशीनों की संख्या लगातार कम की जा रही है.

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क्या जेब में कैश रखना अब गुजरे जमाने की बात है? RBI के आंकड़ों ने उड़ाई ATM मशीन बनाने वालों की नींद!

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  • एटीएम से कैश निकालने वालों में आई 11 प्रतिशत की गिरावट
  • Gdp में कैशलेस पेमेंट 22 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 35 प्रतिशत तक पहुंचा
  • क्या भविष्य में ATM पूरी तरह बंद हो जाएंगे?
  • देश में यूपीआई क्यूआर कोड की संख्या 79.26 करोड़ के पार पहुंची

कभी जेब में कड़कड़ाते नोट रखना शान की बात मानी जाती थी, लेकिन आज हमारी जेब से पर्स गायब हो चुका है और उसकी जगह ले ली है सिर्फ एक स्मार्टफोन ने, अगर आप भी चाय की टपरी से लेकर किराने की दुकान तक हर जगह 'क्यूआर कोड स्कैन' करते हैं, तो जान लीजिए कि आप अकेले नहीं हैं. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ताजा रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि आम भारतीयों के पैसों को खर्च करने का अंदाज कितनी तेजी से बदल चुका है. अब नौबत यह आ गई है कि लोग एटीएम से पैसे निकालने की जगह आगे बढ़कर क्यूआर कोड स्कैन कर रहे हैं.

RBI के आंकड़ों में बड़ा खुलासा

RBI की नई रिपोर्ट के अनुसार, देश में डिजिटल पेमेंट की रफ्तार इतनी तेज है कि ATM से कैश निकालने वाले लोगों की संख्या में सालाना 11 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई है. बैंक अब अपनी ब्रांच के बाहर ऑफ-साइट ATM मशीन लगाने से कतरा रहे हैं. देश में बाहर लगे ATM की संख्या करीब 6.8 प्रतिशत घटकर लगभग 73,426 रह गई है. वहीं, छोटे कस्बों में काम आने वाले माइक्रो ATM भी 8.4 प्रतिशत कम होकर करीब 13.4 लाख ही बचे हैं. वहीं दूसरी ओर, देशभर में UPI QR कोड की संख्या 16.9 प्रतिशत 79.26 करोड़ के पार पहुंच गई है. यानी बैंक भी समझ चुके हैं कि लोग अब लाइन में लगकर कैश निकालने के बजाय फोन स्क्रीन पर दो टैप करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं.

आपके पर्स पर क्या है इसका असर

स्मार्टफोन और डिजिटल वॉलेट ने आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी को पूरी तरह बदलकर रख दिया है 1 रुपये की टॉफी हो या 10 रुपये की चाय, छुट्टे पैसे मांगने की चिकचिक खत्म हो गई है. इसके साथ ही क्रेडिट कार्ड से होने वाले कुल खर्च का 63 प्रतिशत हिस्सा अब ऑनलाइन खरीदारी में जा रहा है. दुकानों पर डेबिट कार्ड स्वाइप करने का चलन भी 12.3 प्रतिशत घट चुका है. 

क्या भविष्य में ATM पूरी तरह बंद हो जाएंगे?

यहां एक गहरी और व्यावहारिक बात समझना जरूरी है जो आमतौर पर विज्ञापनों में नजर नहीं आती. डिजिटल ट्रांजैक्शन बढ़ने से कैशलेस इकोनॉमी को तो बढ़ावा मिल रहा है और जीडीपी में कैशलेस पेमेंट का दायरा 22 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 35 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, लेकिन बैंक अब एक नई रणनीति पर काम कर रहे हैं. बैंकों ने ऑफ-साइट ATM यानी सड़क या बाजारों में लगे मशीन को बंद करके शाखाओं के अंदर कैश रीसाइकलर मशीनों पर ध्यान केंद्रित किया है. यानी जहां सिर्फ पैसे निकाले ही नहीं, बल्कि जमा भी किए जा सकें. इसका सीधा अर्थ यह है कि बैंक अब ATM का खर्च कम कर रहे हैं और आने वाले समय में अगर आपको इमरजेंसी कैश की जरूरत पड़ी, तो आपको अपने नजदीकी बाजार की जगह सीधे बैंक की मुख्य ब्रांच का रुख करना पड़ सकता है.

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