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How 50 crore company was built from farming: मां को गहने बेचने की नौबत से शुरू हुई अंश पाटीदार की कहानी 9 लाख रुपये के कर्ज तक पहुंची, लेकिन हार मानने के बजाय उन्होंने खेती की समस्या को कारोबार में बदला. ड्रोन और जैविक खेती के सहारे आज उनकी कंपनी 50 करोड़ रुपये की है.
मां को गहने बेचने की नौबत से शुरू हुई अंश पाटीदार की कहानी 9 लाख रुपये के कर्ज तक पहुंची, लेकिन हार मानने के बजाय उन्होंने खेती की समस्या को कारोबार में बदला. ड्रोन और जैविक खेती के सहारे आज उनकी कंपनी 50 करोड़ रुपये की है.
कई युवाओं के लिए 10वीं या 12वीं के बाद करियर का मतलब अच्छी नौकरी और सुरक्षित भविष्य होता है. लेकिन अंश पाटीदार ने महज 15 साल की उम्र में उस रास्ते से हटकर खेती में कारोबार का मौका तलाशना शुरू कर दिया.
मध्य प्रदेश के किसान परिवार से आने वाले अंश ने 10वीं में 91 प्रतिशत अंक हासिल किए थे. उनका सपना ऑटोमोबाइल इंजीनियर बनने का था. इसी दौरान परिवार को खेती में भारी नुकसान का सामना करना पड़ा और पढ़ाई का खर्च जुटाना मुश्किल होने लगा.
अंश की मां उन्हें आगे पढ़ाने के लिए अपने गहने बेचने तक को तैयार थीं. यही स्थिति अंश के लिए बड़ा मोड़ बनी. उन्होंने पढ़ाई के साथ खुद कुछ करने का फैसला किया और खेती से जुड़े कारोबार की तरफ कदम बढ़ाया. अंश ने 10वीं कक्षा में ही अवशेष मुक्त खेती को लेकर काम करने का लक्ष्य बना लिया था.
अंश ने किसानों की एक ऐसी समस्या देखी, जो आज भी खेती की लागत से जुड़ी बड़ी चुनौतियों में शामिल है. किसानों को कृषि दवाइयां कई बार बिचौलियों के जरिए महंगी कीमत पर मिलती थीं.
उन्होंने इसी गैप को कारोबार का मौका बनाया. वर्ष 2019 में उन्होंने एबीसी एग्रोकेम की शुरुआत की और निर्माताओं से सीधे कृषि दवाइयां लेकर किसानों तक पहुंचाने का प्रयास किया. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक इस कारोबार ने करीब डेढ़ साल में 40 लाख रुपये का टर्नओवर हासिल किया.
यानी अंश का पहला सबक यही था कि खेती में सिर्फ फसल उगाने से ही कमाई नहीं होती. किसान की लागत कम करने वाली सर्विस भी अपने आप में बड़ा कारोबार बन सकती है.
पहली कामयाबी के बाद अंश ने टेक्नोलॉजी के जरिए किसानों को अलग-अलग दुकानों पर कृषि दवाइयों और खाद की कीमतों की जानकारी देने के लिए नया वेंचर शुरू किया. लेकिन यह प्रयोग उम्मीद के मुताबिक नहीं चला.
इस दौरान उन पर करीब 9 लाख रुपये का कर्ज आ गया. इतनी कम उम्र में इतना बड़ा आर्थिक बोझ किसी भी युवा को तोड़ सकता था. लेकिन अंश ने इसे अपनी कारोबारी यात्रा का अंत नहीं माना.
उन्होंने रिटेलरों से एडवांस पेमेंट लेने और भविष्य में डिस्काउंट के साथ ऑर्गेनिक कृषि उत्पाद देने का मॉडल अपनाया और कर्ज चुकाने की कोशिश की. उपलब्ध स्रोतों में इस कर्ज को 9.5 लाख रुपये भी बताया गया है.
यही इस कहानी का सबसे बड़ा छिपा हुआ एंगल है. 50 करोड़ रुपये की कंपनी की कहानी सिर्फ सफलता की कहानी नहीं है. इसके बीच एक असफल कारोबार, भारी कर्ज और दोबारा खड़े होने का दौर भी है.
वर्ष 2022 में अंश ने एग्रीवा ऑर्गेनिक्स इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत की. उनका फोकस जैविक और अवशेष मुक्त कृषि उत्पादों के जरिए किसानों की लागत घटाने और फसल की सेहत सुधारने पर रहा.
इसके बाद कंपनी ने ड्रोन टेक्नोलॉजी को कृषि दवाइयों के छिड़काव से जोड़ा. परंपरागत तरीके से खेत में दवा का छिड़काव करने में पानी, समय और मजदूरी तीनों लगते हैं. ड्रोन के इस्तेमाल ने इसी प्रक्रिया को ज्यादा तेज और लक्षित बनाने की कोशिश की.
कंपनी की ओर से किसानों को मुफ्त ड्रोन स्प्रे सर्विस भी दी गई. आपके दिए आंकड़ों के मुताबिक अंश की कंपनी ने 10,000 किसानों के साथ सहयोग किया है और मध्य प्रदेश के नौ जिलों में 21 सदस्यों की टीम के जरिए कृषि क्षेत्र में काम किया है. उपलब्ध अन्य रिपोर्टों में कंपनी द्वारा 5,000 किसानों को 20,000 से ज्यादा एकड़ में मुफ्त ड्रोन स्प्रे देने का उल्लेख भी मिलता है.
अंश पाटीदार की कंपनी की वैल्यूएशन 50 करोड़ रुपये बताई गई है. यह आंकड़ा उनकी कारोबारी सफलता को दिखाता है, लेकिन इस कहानी का असर सिर्फ कंपनी के मूल्य तक सीमित नहीं है.
खेती में किसान की कमाई सिर्फ बाजार में फसल के भाव से तय नहीं होती. बीज, खाद, कृषि दवा, पानी, मजदूरी और छिड़काव जैसी लागत घटे तो किसान की वास्तविक बचत बढ़ सकती है. इसी जगह ड्रोन आधारित छिड़काव और जैविक कृषि उत्पादों का मॉडल महत्व रखता है.
अंश की योजना आने वाले एक से दो वर्षों में 50,000 एकड़ तक की फसलों में विस्तार करने की है. अगर यह विस्तार सफल रहता है तो ड्रोन आधारित कृषि सर्विस छोटे और मध्यम किसानों के लिए भी ज्यादा उपयोगी मॉडल बन सकती है.
अंश की कहानी को केवल 50 करोड़ रुपये की कंपनी बनाने वाली सफलता के तौर पर देखना अधूरा होगा. इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि उन्होंने समस्या को पहले किसान की नजर से देखा और बाद में उसे कारोबार में बदला.
महंगी कृषि दवाइयों की समस्या से पहला कारोबार निकला. कारोबार की असफलता से कर्ज का सबक मिला. फिर जैविक उत्पाद और ड्रोन टेक्नोलॉजी को जोड़कर नया मॉडल तैयार किया गया.
यही वजह है कि अंश पाटीदार की कहानी उन युवाओं के लिए खास है जो नौकरी के अलावा कारोबार की सम्भावना तलाश रहे हैं. खेती का मतलब अब केवल जमीन पर फसल उगाना नहीं रह गया है. कृषि टेक्नोलॉजी, ड्रोन, जैविक उत्पाद और सर्विस मॉडल आने वाले समय में ग्रामीण कारोबार के नए रास्ते खोल सकते हैं.
इस कहानी का सबसे जरूरी संदेश यह नहीं है कि कम उम्र में 50 करोड़ रुपये की कंपनी बनाई जा सकती है. असली सीख यह है कि कारोबार में पहली कोशिश फेल होने के बाद भी दूसरी शुरुआत की जा सकती है.
अंश ने पहले किसानों की समस्या समझी, फिर कारोबार बनाया, असफलता झेली, कर्ज चुकाया और उसके बाद नए मॉडल के साथ वापस आए. यही सफर उनकी सफलता को अलग बनाता है.
किसानों के लिए इसका मतलब है कि टेक्नोलॉजी अगर सही तरीके से इस्तेमाल हो तो खेती की लागत और संसाधनों की बर्बादी को कम करने में मदद कर सकती है. वहीं युवाओं के लिए यह संकेत है कि गांव और खेती केवल रोजगार पाने की जगह नहीं, बल्कि नई टेक्नोलॉजी आधारित कंपनियां बनाने की जमीन भी बन सकते हैं.
अंश पाटीदार की कहानी का निष्कर्ष यही है कि जिस समस्या ने उनके परिवार को आर्थिक संकट में डाला, उसी कृषि क्षेत्र में उन्होंने समाधान तलाशा और उसे कारोबार में बदल दिया. यही उनकी कहानी का सबसे उपयोगी और चौंकाने वाला पहलू है.
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