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BRICS vs. G7: Who holds the upper hand globally?: दिल्ली में हो रहे ब्रिक्स सम्मेलन के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 11 देशों का ब्रिक्स अब जी-7 को आर्थिक और रणनीतिक ताकत में टक्कर दे रहा है. आबादी, अर्थव्यवस्था, तेल, सोना, विदेशी मुद्रा और सैन्य खर्च के आंकड़े तस्वीर साफ करते हैं.
नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन हो रहा है. ऐसे समय में दुनिया की दो बड़ी ताकतों ब्रिक्स और जी-7 की तुलना सिर्फ देशों की संख्या से करना बड़ी गलती होगी. ब्रिक्स में 11 देश हैं, जबकि जी-7 में अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और ब्रिटेन शामिल हैं. आईएमएफ भी इन्हीं सात बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं को मेजर एडवांस्ड इकनॉमीज यानी जी-7 समूह के रूप में वर्गीकृत करता है.
ब्रिक्स में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया शामिल हैं. भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक यह समूह दुनिया की करीब 49.5 फीसदी आबादी, करीब 40 फीसदी वैश्विक जीडीपी और करीब 26 फीसदी वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है. यानी संख्या और बाजार के आकार में ब्रिक्स की ताकत बहुत बड़ी है. लेकिन असली कहानी यहां से शुरू होती है.
ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत उसकी आबादी है. करीब आधी दुनिया की आबादी इस समूह के देशों में रहती है. इसके मुकाबले आईएमएफ के अप्रैल 2026 वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक के अनुसार जी-7 की आबादी करीब 78.85 करोड़ है.
लेकिन सिर्फ ज्यादा लोग होना ज्यादा अमीरी का मतलब नहीं है. यहीं जी-7 की असली बढ़त सामने आती है. अमेरिका, जर्मनी, जापान, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली और कनाडा की औसत प्रति व्यक्ति आय ब्रिक्स के अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है. इसलिए ब्रिक्स के पास बड़ा बाजार है, जबकि जी-7 के पास ज्यादा क्रय शक्ति वाला बाजार है.
ब्रिक्स देशों की बड़ी आबादी भारत के लिए निर्यात, दवाइयों, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, कृषि उत्पाद और डिजिटल सेवाओं के बड़े बाजार का रास्ता खोल सकती है. वहीं जी-7 के साथ व्यापार भारत को ज्यादा भुगतान क्षमता वाले ग्राहकों और उन्नत तकनीक से जोड़ता है. यानी भारत के लिए किसी एक खेमे को चुनना आसान नहीं है.
ब्रिक्स के करीब 40 फीसदी वैश्विक जीडीपी वाले आंकड़े को समझते समय यह जानना जरूरी है कि यह तुलना पीपीपी यानी खरीद शक्ति समानता जैसे आधार पर इस्तेमाल किए गए आंकड़ों से जुड़ी है. ब्रिक्स के आधिकारिक आंकड़ों में 2023 के लिए पीपीपी आधार पर समूह की हिस्सेदारी करीब 39 फीसदी बताई गई थी.
इसका मतलब यह नहीं है कि ब्रिक्स देशों की बाजार विनिमय दर पर बनी कुल अर्थव्यवस्था भी जी-7 से बड़ी हो गई है. बाजार विनिमय दर से तुलना करने पर अमेरिका अकेला ही बेहद बड़ा आर्थिक केंद्र है.
यही इस मुकाबले का सबसे अहम छुपा हुआ पहलू है. ब्रिक्स का वजन मुख्य तौर पर आबादी, उत्पादन, प्राकृतिक संसाधनों और पीपीपी आधारित आर्थिक आकार में है. जी-7 की ताकत ऊंची प्रति व्यक्ति आय, वित्तीय संस्थानों, तकनीक, पूंजी बाजार और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में गहरी पकड़ से आती है.
ब्रिक्स देशों का वैश्विक व्यापार में हिस्सा करीब एक चौथाई से ज्यादा है. ब्रिक्स के आधिकारिक आंकड़ों में 26 फीसदी वैश्विक गुड्स ट्रेड और करीब 5.7 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात प्रवाह का उल्लेख किया गया है. इसमें चीन सबसे बड़ा औद्योगिक और निर्यात केंद्र है. भारत के लिए भी ब्रिक्स बाजार महत्वपूर्ण हैं, खासकर ऊर्जा, दवा, कृषि, इंजीनियरिंग सामान और सेवाओं के लिहाज से. लेकिन यहां भी एक बड़ा अंतर है. जी-7 के देश दुनिया के सबसे बड़े विकसित उपभोक्ता बाजारों और वित्तीय केंद्रों में हैं. अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली और कनाडा की कंपनियां वैश्विक टेक्नोलॉजी, बैंकिंग, ऑटोमोबाइल, फार्मा और लग्जरी बाजार में बहुत मजबूत हैं.
अगर ताकत को तेल और ऊर्जा के नजरिए से देखें तो ब्रिक्स की तस्वीर और भी मजबूत दिखाई देती है. ब्रिक्स के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक समूह के देशों का वैश्विक तेल उत्पादन में हिस्सा करीब 43.6 फीसदी रहा है. गैस उत्पादन में भी इसकी हिस्सेदारी करीब 36 फीसदी बताई गई है.
एक दूसरे आधिकारिक ब्रिक्स स्रोत में समूह को दुनिया के तेल उत्पादन का करीब 44 फीसदी और वैश्विक तेल भंडार का करीब 44 फीसदी हिस्सा रखने वाला बताया गया है. यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मौजुदा समय में तेल की कीमत सीधे पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, हवाई किराये, ट्रांसपोर्ट और महंगाई पर असर डालती है.
भारत के लिए यह दोधारी तलवार है. रूस और पश्चिम एशिया के साथ ऊर्जा संबंध भारत को विकल्प देते हैं, लेकिन अगर भू-राजनीतिक तनाव से सप्लाई प्रभावित होती है तो भारत जैसे बड़े तेल आयातक पर कीमतों का दबाव भी बढ़ सकता है. हाल में पश्चिम एशिया के तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार गया है.
सोने के मामले में तस्वीर काफी दिलचस्प है. अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा आधिकारिक स्वर्ण भंडार है. 2024 के उपलब्ध वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल आंकड़ों के आधार पर अमेरिका के पास करीब 8,133 टन, जर्मनी के पास करीब 3,352 टन, इटली के पास करीब 2,452 टन और फ्रांस के पास करीब 2,437 टन सोना था. कनाडा के पास आधिकारिक स्वर्ण भंडार नहीं है. इन आंकड़ों को जोड़ें तो सिर्फ जी-7 के पास 17,500 टन से ज्यादा आधिकारिक सोना बैठता है. यानी इस मोर्चे पर जी-7 अभी भी बेहद मजबूत है.
लेकिन ब्रिक्स को कम आंकना भी गलती होगी. अप्रैल 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिक्स प्लस देशों के केंद्रीय बैंकों के पास 6,000 टन से ज्यादा सोना था. रूस के पास करीब 2,336 टन, चीन के पास करीब 2,298 टन और भारत के पास करीब 880 टन सोना बताया गया.
यानी सोने की मौजुदा तिजोरी में जी-7 आगे है, लेकिन ब्रिक्स देशों की सोना खरीदने की रफ्तार और रिजर्व डायवर्सिफिकेशन की रणनीति पर दुनिया की नजर बनी हुई है.
विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में चीन ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत है. अगस्त 2026 में चीन का फॉरेक्स रिजर्व 3.438 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया. यह दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है.
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी 28 अगस्त 2026 को 740.80 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. इसमें विदेशी मुद्रा संपत्ति 600.67 अरब डॉलर और सोने का भंडार 116.41 अरब डॉलर था.
जी-7 में जापान और अमेरिका भी बड़े रिजर्व रखने वाले देश हैं. लेकिन यहां चीन की स्थिति अलग दिखाई देती है. अकेले चीन का फॉरेक्स रिजर्व कई जी-7 देशों के संयुक्त रिजर्व से भी बड़ा है.
इसका सीधा मतलब यह है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और मुद्रा बाजार में ब्रिक्स के कुछ सदस्य बहुत बड़ी वित्तीय क्षमता रखते हैं. हालांकि फॉरेक्स रिजर्व का बड़ा होना अपने आप में डॉलर को हटाने के बराबर नहीं है.
सैन्य ताकत को केवल सैनिकों की संख्या से नहीं मापा जा सकता. रक्षा बजट, परमाणु क्षमता, मिसाइल, नौसेना, वायुसेना, तकनीक और वैश्विक सैन्य पहुंच भी मायने रखती है. सआईपीआरआई के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया का सैन्य खर्च 2.887 ट्रिलियन डॉलर रहा. अमेरिका ने अकेले 954 अरब डॉलर खर्च किए. चीन का खर्च अनुमानित 336 अरब डॉलर और रूस का 190 अरब डॉलर रहा. भारत 92.1 अरब डॉलर के साथ दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश रहा. सऊदी अरब ने 83.2 अरब डॉलर खर्च किए.
जी-7 के सात देशों का 2025 का कुल सैन्य खर्च करीब 1.37 ट्रिलियन डॉलर रहा. जर्मनी का खर्च 114 अरब डॉलर, ब्रिटेन का 89 अरब डॉलर, फ्रांस का 68 अरब डॉलर, जापान का 62.2 अरब डॉलर, इटली का 48.1 अरब डॉलर और कनाडा का 37.5 अरब डॉलर रहा.
इसलिए सैन्य खर्च में जी-7 अभी भी बेहद शक्तिशाली है. लेकिन ब्रिक्स में चीन, रूस और भारत जैसे बड़े सैन्य शक्तियों के साथ सऊदी अरब, ईरान और दूसरे रणनीतिक देश भी हैं. इसे एक संयुक्त सेना समझना गलत होगा, क्योंकि ब्रिक्स नाटो जैसा सैन्य गठबंधन नहीं है.
यहीं भारत की सबसे खास स्थिति सामने आती है. भारत ब्रिक्स का अहम सदस्य है, लेकिन वह जी-7 देशों के साथ भी गहरे आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते रखता है. भारत क्वाड का सदस्य है और अमेरिका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ भी सहयोग करता है.
दूसरी तरफ भारत ब्रिक्स में चीन और रूस के साथ बैठता है. नई दिल्ली में हो रहे सम्मेलन में रूस के व्लादिमीर पुतिन, चीन के शी जिनपिंग और ईरान के मसूद पेजेशकियन समेत ब्रिक्स नेताओं की मौजूदगी है. मौजुदा पश्चिम एशिया तनाव ने इस सम्मेलन को और संवेदनशील बना दिया है.
भारत की रणनीति किसी एक धड़े के साथ पूरी तरह खड़े होने के बजाय अपने हित के हिसाब से दोनों तरफ जगह बनाए रखने की है. ऊर्जा के लिए रूस और पश्चिम एशिया जरूरी हैं. व्यापार और तकनीक के लिए अमेरिका, यूरोप और जापान अहम हैं. चीन के साथ सीमा और व्यापार दोनों का सवाल है. यही वजह है कि भारत के लिए ब्रिक्स बनाम जी-7 का सवाल वास्तव में ब्रिक्स और जी-7 में से किसी एक को चुनने का सवाल नहीं है.
ब्रिक्स और जी-7 की यह खींचतान केवल राष्ट्राध्यक्षों की बैठक नहीं है. इसका असर पेट्रोल-डीजल से लेकर सोने की कीमत, रुपये की चाल, मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स की कीमत, नौकरी के अवसर, निर्यात, ब्याज दर और महंगाई तक पहुंच सकता है.
अगर ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और भुगतान बढ़ता है तो डॉलर पर निर्भरता कुछ क्षेत्रों में कम हो सकती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर अचानक खत्म हो जाएगा. डॉलर अभी भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण मुद्राओं में है.
दूसरी तरफ अगर पश्चिम एशिया का तनाव तेल सप्लाई को प्रभावित करता है तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है. इसका दबाव रुपये और महंगाई दोनों पर पड़ सकता है. ऐसे में ब्रिक्स की ऊर्जा ताकत भारत के लिए अवसर भी है और जोखिम भी.
आंकड़ों को एक लाइन में समझें तो आबादी, तेल उत्पादन, प्राकृतिक संसाधन और पीपीपी आधारित आर्थिक वजन में ब्रिक्स बहुत बड़ा हो चुका है. विदेशी मुद्रा भंडार में चीन की ताकत और सोने की लगातार बढ़ती खरीद भी इसे महत्वपूर्ण बनाती है.
लेकिन उच्च प्रति व्यक्ति आय, पूंजी बाजार, वैश्विक वित्त, तकनीक और सैन्य खर्च में जी-7 की बढ़त अभी बहुत बड़ी है. अमेरिका की आर्थिक और सैन्य ताकत अकेले ही पूरे मुकाबले को अलग स्तर पर ले जाती है.
इसलिए ब्रिक्स ने जी-7 को पछाड़ दिया है, ऐसा कहना अभी सही नहीं होगा. ज्यादा सटीक बात यह है कि दुनिया अब एक ऐसे दौर में पहुंच रही है जहां सिर्फ एक समूह के पास पूरी आर्थिक और रणनीतिक ताकत नहीं है.
भारत के लिए सबसे बड़ा फायदा यही है. अगर नई दिल्ली अपने हित के हिसाब से ब्रिक्स, जी-7 देशों, क्वाड और दूसरे बहुपक्षीय मंचों के साथ संतुलन बनाए रखती है तो बदलती वैश्विक व्यवस्था में उसके पास विकल्प ज्यादा रहेंगे. और यही इस पूरे मुकाबले का सबसे महत्वपूर्ण सबक है.
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