बिजनेस
Low investment manufacturing business in village: गांव से बिजनेस शुरू करने वालों के लिए मसाला, पेपर बैग, अगरबत्ती, मोमबत्ती, पेपर प्लेट-कप और पशु आहार जैसे छह मैन्युफैक्चरिंग विकल्प सामने आते हैं. एंटरप्रेन्योर इंडिया के अनुसार शुरुआत छोटे स्तर से, स्थानीय मांग की जांच के बाद करना बेहतर है.
क्या गांव में रहकर भी ऐसा बिजनेस शुरू किया जा सकता है जिसमें ग्राहक तलाशने के लिए बड़े शहर का रुख न करना पड़े? ऐसे 6 मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस हैं, जिन्हें छोटे स्तर और सीमित जगह से शुरू करने का विकल्प बताया गया है. खास बात यह है कि इन बिजनेस से जुड़े कई प्रोडक्ट रोजमर्रा की जरूरत वाले हैं. यानी संभावित ग्राहक आपके गांव, आसपास के कस्बों और स्थानीय दुकानों में ही मिल सकते हैं. हालांकि किसी भी बिजनेस के लिए कमाई की गारंटी नहीं दी गई है और वास्तविक लागत जगह, मशीन, कच्चे माल और उत्पादन के स्तर पर निर्भर कर सकती है.
यह जानकारी एंटरप्रेन्योर इंडिया के बिजनेस आइडियाज सेक्शन में प्रकाशित लेख पर आधारित है, जिसके लेखक के तौर पर ओलिवा का नाम दिया गया है. रिपोर्ट में गांव से शुरू किए जा सकने वाले 6 मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस का जिक्र है और साथ ही यह सलाह दी गई है कि पहली बार बिजनेस शुरू करने वाला व्यक्ति सीधे बड़े स्तर पर निवेश करने के बजाय छोटे स्तर से शुरुआत करे.
यह एंगल नौकरी तलाश रहे लोगों के लिए खास तौर पर अहम है, क्योंकि यहां केवल सामान खरीदकर बेचने के बजाय खुद उत्पाद तैयार करके स्थानीय बाजार में सप्लाई करने का मॉडल सामने आता है. लेकिन मशीन खरीदने से पहले स्थानीय मांग, कच्चे माल की कीमत और बिक्री की संभावना जांचना जरूरी है.
मसाले ऐसा प्रोडक्ट हैं जिनका इस्तेमाल लगभग हर घर में होता है. रिपोर्ट के अनुसार हल्दी, धनिया, लाल मिर्च और दूसरे रोज इस्तेमाल होने वाले मसालों को साफ करके पीसा और पैक किया जा सकता है.
शुरूआत में एक या दो प्रोडक्ट से काम शुरू करने और आसपास की किराना दुकानों तथा घरों में बिक्री करने का सुझाव दिया गया है. अगर स्वाद और क्वालिटी अच्छी रहती है तो आगे अपने नाम से पैकिंग करके आसपास के बाजार में सप्लाई बढ़ाई जा सकती है.
इस बिजनेस का सबसे बड़ा स्थानीय फायदा यह हो सकता है कि ग्राहक दूर तलाशने की जरुरत न पड़े. पहले से मौजूद किराना नेटवर्क शुरुआती बिक्री का आधार बन सकता है. हालांकि खाद्य उत्पाद होने के कारण लागू नियमों और जरूरी मंजूरी की जानकारी पहले लेना जरूरी होगा.
दूसरा विकल्प पेपर बैग का है. रिपोर्ट के मुताबिक गांव या छोटे शहर में इसकी यूनिट लगाकर कपड़ों की दुकानों, मिठाई की दुकानों, किराना स्टोर और दूसरे कारोबारियों को बैग सप्लाई किए जा सकते हैं.
इसमें सामान्य पेपर बैग से शुरुआत करके आगे दुकानदार के नाम या लोगो वाले कस्टमाइज्ड बैग्स बनाए जा सकते हैं. यानी यहां आम ग्राहक के बजाय दुकानदार और छोटे कारोबारी सीधे बिजनेस ग्राहक बन सकते हैं.
इस मॉडल में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मशीन लगाने से पहले आसपास की दुकानों से संभावित ऑर्डर की जानकारी लेना ज्यादा समझदारी होगी. अगर स्थानीय कारोबारी नियमित खरीद करते हैं, तभी उत्पादन बढ़ाने का फैसला करना बेहतर रहेगा.
अगरबत्ती का इस्तेमाल घरों और धार्मिक स्थानों पर लंबे समय से होता रहा है. रिपोर्ट इसे छोटे स्तर पर शुरू किए जा सकने वाले विकल्प के रूप में रखती है.
इस कारोबार में केवल उत्पादन करना ही काफी नहीं है. कच्चे माल की क्वालिटी, खुशबू और पैकिंग पर भी ध्यान देना होगा. स्थानीय दुकानों से आगे आसपास के बाजारों में थोक सप्लाई का रास्ता बनाया जाए तो बिक्री का दायरा बढ़ाया जा सकता है.
यानी गांव से शुरुआत करने वाला कारोबारी धीरे-धीरे स्थानीय दुकानों से दूसरे बाजारों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकता है. लेकिन शुरुआत में उत्पादन क्षमता उतनी ही रखना बेहतर होगा जितनी बिक्री का भरोसा हो.
मोमबत्ती को लेकर आम धारणा अक्सर बिजली कटने से जुड़ी रहती है, लेकिन रिपोर्ट इसके दूसरे इस्तेमालों की ओर भी ध्यान दिलाती है. सजावट, पूजा, जन्मदिन और दूसरे मौकों पर अलग-अलग तरह की मोमबत्तियों की मांग हो सकती है.
गांव में छोटा सेटअप लगाकर सामान्य मोमबत्ती से शुरुआत की जा सकती है. इसके बाद अलग आकार, डिजाइन और खुशबू वाली मोमबत्तियां बनाकर प्रोडक्ट में बदलाव किया जा सकता है. अच्छी पैकिंग और अलग डिजाइन बाजार में पहचान बनाने में मदद कर सकते हैं.
यहां कमाई का रास्ता केवल ज्यादा मात्रा में सामान बनाने से नहीं, बल्कि प्रोडक्ट को अलग तरीके से पेश करने से भी जुड़ सकता है. खास मौकों के लिए डिजाइन वाली मोमबत्तियां अलग ग्राहक वर्ग तक पहुंच बना सकती हैं.
शादी, छोटे कार्यक्रम, चाय की दुकानें और खाने-पीने के कारोबार में डिस्पोजेबल टेबलवेयर की जरूरत होती है. इसी मांग से पेपर प्लेट और कप बनाने का बिजनेस जुड़ा हुआ है.
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि उत्पादन शुरू करने से पहले कच्चे माल की कीमत, मशीन की लागत और आसपास के दुकानदारों की मांग की जांच करनी चाहिए. अगर नियमित ऑर्डर मिलते हैं तो उत्पादन बढ़ाकर आसपास के कस्बों तक सप्लाई की जा सकती है.
इसलिए यहां सबसे पहले मशीन खरीदना नहीं, बल्कि संभावित खरीदार तलाशना ज्यादा अहम कदम हो सकता है. स्थानीय दुकानदारों से पहले ही बातचीत करने पर यह पता चल सकता है कि वास्तव में कितनी मांग मौजूद है.
छठा विकल्प पशु आहार बनाने और पैक करने का है. रिपोर्ट के अनुसार गांवों में पशुपालन आम है और पशुओं के लिए संतुलित आहार की जरूरत रहती है. इस वजह से कुछ ग्रामीण इलाकों में स्थानीय बाजार बनने की संभावना हो सकती है.
लेकिन यह बिजनेस बाकी विकल्पों से थोड़ा अलग है. इसमें कच्चे माल की सही जानकारी और क्वालिटी बेहद अहम है, क्योंकि खराब या गलत मिश्रण से पशुओं को नुकसान हो सकता है. इसलिए तकनीकी जानकारी, स्थानीय नियम और उत्पाद की क्वालिटी से जुड़ी शर्तों को पहले समझना जरूरी है.
रिपोर्ट में छह विकल्पों के संभावित मुख्य ग्राहकों और शुरुआती फोकस को अलग-अलग बताया गया है. मसाले के ग्राहक घर और किराना दुकानें हो सकते हैं, जबकि पेपर बैग के लिए दुकानें और छोटे बिजनेस संभावित ग्राहक हैं. अगरबत्ती के लिए किराना और पूजा की दुकानें, मोमबत्ती के लिए घर और गिफ्ट स्टोर, पेपर प्लेट और कप के लिए दुकानदार तथा कार्यक्रम और पशु आहार के लिए पशुपालक तथा डेयरी प्रमुख ग्राहक हो सकते हैं.
यही इस पूरी रिपोर्ट का सबसे काम का एंगल है. हर बिजनेस की शुरुआत केवल यह देखकर नहीं होनी चाहिए कि उसे बनाना आसान है या नहीं. असली सवाल यह होना चाहिए कि आपके इलाके में उसे खरीदने वाला कौन है और वह कितनी बार खरीद सकता है.
एंटरप्रेन्योर इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार सबसे पहले यह देखना चाहिए कि आसपास कौन सा उत्पाद ज्यादा बिकता है. स्थानीय दुकानदारों से यह पूछा जा सकता है कि वे सामान कहां से खरीदते हैं, कितनी मात्रा में लेते हैं और मौजूदा सप्लायर से उन्हें क्या परेशानी है.
इसके बाद कच्चे माल और उत्पादन की लागत निकालकर यह देखना जरूरी है कि बाजार की कीमत पर सामान बेचने के बाद वास्तव में कितना पैसा बच सकता है. इस जांच के बाद ही मशीन खरीदना बेहतर रहेगा.
यानी इस मॉडल में असली रिस्क मशीन खरीदने का नहीं, बल्कि बिना बाजार समझे मशीन खरीद लेने का है. अगर उत्पादन तैयार है लेकिन ऑर्डर नहीं हैं, तो पैसा मशीन, कच्चे माल और स्टॉक में फंस सकता है.
रिपोर्ट में मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस को धीरे-धीरे बढ़ाने की रणनीति पर जोर दिया गया है. पहले सीमित मात्रा में सामान बनाकर कुछ दुकानों में बेचने, ग्राहकों की प्रतिक्रिया देखने और दोबारा मिलने वाले ऑर्डर पर नजर रखने की सलाह दी गई है.
अगर दुकानदार नियमित ऑर्डर देने लगते हैं तो उत्पादन बढ़ाया जा सकता है. इसके बाद पैकिंग बेहतर करके अपना ब्रांड बनाया जा सकता है और गांव से आगे कस्बों तथा दूसरे बाजारों तक सप्लाई शुरू की जा सकती है.
सबसे बड़ी गलती बिना बाजार जांचे मशीन और कच्चे माल पर ज्यादा पैसा लगाना हो सकती है. इसके अलावा सस्ता माल खरीदने के चक्कर में घटिया कच्चा माल इस्तेमाल करना, उत्पादन लागत का सही हिसाब नहीं रखना और समय पर सामान नहीं पहुंचाना भी कारोबार को नुकसान पहुंचा सकता है. खास तौर पर खाद्य उत्पाद और पशु आहार जैसे कारोबार में लागू नियमों और जरूरी मंजूरी की जानकारी पहले लेना बेहद जरूरी है.
आखिरी बात यह है कि गांव से मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस शुरू करने के लिए छह विकल्प सामने हैं, लेकिन इनमें से किसी को भी पक्की कमाई का जरिया नहीं माना जा सकता. एंटरप्रेन्योर इंडिया की रिपोर्ट भी इस बात पर जोर देती है कि सफलता स्थानीय मांग, उत्पादन लागत और उत्पाद की क्वालिटी पर निर्भर करेगी. इसलिए सबसे सुरक्षित तरीका यही दिखता है कि पहले बाजार को परखा जाए, कम मात्रा में उत्पादन किया जाए और बिक्री का भरोसा बनने के बाद ही बड़ा निवेश किया जाए.
अपनी राय और अपने इलाके की खबर देने के लिए जुड़ें हमारे गूगल, फेसबुक, x, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सऐप कम्युनिटी से.