Advertisement

1,500 करोड़ से शुरू होगा बड़ा विमान प्रोजेक्ट, भारत में बनेंगे रूसी विमान तो बदल जाएगी रीजनल कनेक्टिविटी

Regional aircraft manufacturing in India: रूस के आईएल-114-300 विमानों को भारत में लाने और आगे चलकर यहीं बनाने की ओमकाम एविएशंस की योजना क्षेत्रीय उड़ान के लिए बड़ा बदलाव ला सकती है. 50 विमानों की प्रस्तावित योजना से छोटे शहरों की सीधी कनेक्टिविटी, रोजगार और विमान निर्माण क्षमता को बढ़ावा मिल सकता है

1,500 करोड़ से शुरू होगा बड़ा विमान प्रोजेक्ट, भारत में बनेंगे रूसी विमान तो बदल जाएगी रीजनल कनेक्टिविटी

भारत में बनेंगे 50 रूसी विमान; नौकरी से लेकर सीधी फ्लाइट तक क्या बदलेगा (फोटो सोशल मीडिया)

Add DNA as a Preferred Source

Russia India aircraft manufacturing project benefit: छोटे शहर से मुंबई जाने के लिए पहले बड़े एयरपोर्ट तक पहुंचना पड़ता है. कई यात्रियों के लिए असली परेशानी टिकट से ज्यादा यह अतिरिक्त सफर और समय होता है. अब 50 रूसी आईएल-114-300 विमानों को भारत में लाने और आगे यहीं बनाने की ओमकाम एविएशंस की योजना इसी समस्या को निशाना बनाती दिख रही है.

कंपनी की योजना सिर्फ विमान खरीदने तक सीमित नहीं है. रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन यानी यूएसी के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए भविष्य में इन विमानों का 100 प्रतिशत निर्माण भारत में करने की बात कही गई है. अगर यह योजना जमीन पर उतरती है, तो इसका असर हवाई टिकट से लेकर छोटे शहरों में रोजगार और एयरपोर्ट के विकास तक दिखाई दे सकता है.

ओमकाम एविएशंस ने 50 विमानों के लिए एलओआई पर हस्ताक्षर की बात कही

नई दिल्ली में भारत मंडपम में आयोजित इनोप्रोम इंडिया ट्रेड फेयर के दौरान ओमकाम एविएशंस ने इस परियोजना से जुड़ी अपनी योजना सामने रखी. कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर पीयूष कुमार अग्रवाल के मुताबिक, रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन के साथ 50 आईएल-114-300 विमानों की खरीद के लिए एलओआई यानी लेटर ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर किए गए हैं.

कंपनी के मुताबिक शुरुआत छह विमानों के बैच से होगी. इसके लिए भारत में असेंबली लाइन लगाने की योजना है. इसके बाद टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की दिशा में आगे बढ़ते हुए देश में विमान के निर्माण का दायरा बढ़ाने की परिकल्पना है.

कंपनी का कहना है कि शुरुआती छह विमानों और उनके सपोर्ट सिस्टम के लिए करीब 1,500 करोड़ रुपये के निवेश की जरुरत होगी. इसके बाद भारत में पूर्ण निर्माण की क्षमता विकसित करने के लिए निवेश को बड़े स्तर पर ले जाने की योजना है. कंपनी के अनुसार रूस के एसबेरबैंक ने भी सैद्धांतिक रूप से इस परियोजना के लिए वित्तीय सहयोग देने की प्रतिबद्धता जताई है.

मोदी और पुतिन की मौजूदगी ने बढ़ाया परियोजना का महत्व

इस पहल को उस समय और ज्यादा ध्यान मिला जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ओमकाम एविएशंस के बूथ पर पहुंचे. वहां दोनों नेताओं को आईएल-114-300 विमान से जुड़ी परियोजना पर चर्चा करते हुए देखा गया.

कंपनी के लिए यह महज एक प्रदर्शनी में विमान दिखाने का मामला नहीं है. इसके पीछे भारत और रूस के बीच विमानन, तकनीक और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाने की बड़ी संभावना जुड़ी हुई है.

ओमकाम एविएशंस के को-फाउंडर एवं डायरेक्टर गोविंद गुप्ता ने भी विमान निर्माण और मेंटेनेंस सुविधाओं को भारत में विकसित करने की योजना के रणनीतिक महत्व पर जोर दिया है. कंपनी इसे मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के विजन से जोड़कर देख रही है.

असल फायदा विमान से ज्यादा छोटे शहरों को हो सकता है

आईएल-114-300 में 68 यात्रियों तक बैठने की क्षमता है. रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार यह दो इंजन वाला टर्बोप्रॉप विमान है और इसकी अधिकतम यात्री क्षमता 68 है. कंपनी के मुताबिक इसकी क्रूज स्पीड करीब 450 किलोमीटर प्रति घंटा और अधिकतम यात्रियों के साथ रेंज करीब 1,400 किलोमीटर है. इसका टेकऑफ रन 750 मीटर और लैंडिंग रोल 550 मीटर बताया गया है.  

यही विशेषता इसे बड़े विमानों से अलग बनाती है. ऐसे विमान छोटे और अपेक्षाकृत कम सुविधाओं वाले एयरपोर्ट से क्षेत्रीय रूट पर उड़ान भरने के लिए ज्यादा उपयोगी हो सकते हैं. हालांकि किसी खास शहर के बीच उड़ान तभी शुरू होगी जब एयरलाइन को उस रूट पर पर्याप्त यात्री मांग, एयरपोर्ट सुविधा और आर्थिक व्यवहार्यता दिखाई दे.

ओमकाम एविएशंस के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर आदित्य अग्रवाल ने इसी संभावना को मेरठ से मुंबई जैसे उदाहरण के जरिए समझाया है. भविष्य में यदि ऐसे सीधे रूट आर्थिक रूप से व्यवहार्य होते हैं, तो यात्री को पहले दिल्ली जैसे बड़े एयरपोर्ट तक सड़क या रेल से जाने और वहां से कनेक्टिंग फ्लाइट लेने की जरूरत कम हो सकती है. यानी इस योजना का सबसे बड़ा असर सिर्फ विमानन उद्योग पर नहीं, बल्कि यात्री के समय पर हो सकता है.

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि छोटे शहरों के लिए मांग पहले से मौजूद है

भारत में क्षेत्रीय हवाई संपर्क बढ़ाने के लिए सरकार पहले से उड़ान योजना पर काम कर रही है. नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अनुसार 15 जुलाई 2026 तक उड़ान के तहत 679 रूट 95 एयरपोर्ट, हेलीपोर्ट और वाटर एयरोड्रोम से जोड़े जा चुके थे. इस योजना के तहत 3.58 लाख से ज्यादा उड़ानें संचालित हुईं और 1.68 करोड़ से अधिक यात्रियों को सेवा मिली.  

यही वजह है कि छोटे विमानों की जरूरत को सिर्फ एक कंपनी की कारोबारी योजना के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता. सरकार ने 2026 में मॉडिफाइड उड़ान को 10 साल के लिए मंजूरी दी है, जिसके लिए 28,840 करोड़ रुपये का कुल प्रावधान किया गया है. इसमें 100 एयरपोर्ट विकसित करने और क्षेत्रीय एयरलाइन ऑपरेटरों के लिए 10,043 करोड़ रुपये के वायबिलिटी गैप फंडिंग का प्रस्ताव भी शामिल है. इससे साफ है कि भारत में क्षेत्रीय विमानन के लिए एयरपोर्ट, विमान और एयरलाइन ऑपरेशन तीनों स्तर पर इकोसिस्टम तैयार करने की कोशिश चल रही है.

यात्री की जेब पर क्या असर पड़ेगा?

50 विमानों की योजना सुनकर सबसे पहला सवाल यही है कि क्या इससे हवाई सफर सस्ता होगा. इसका जवाब अभी सीधे हां में नहीं दिया जा सकता. विमान की क्षमता छोटी होने से छोटे रूट पर ऑपरेशन संभव हो सकता है, लेकिन टिकट की कीमत सिर्फ विमान की सीट क्षमता से तय नहीं होती. ईंधन, एयरपोर्ट शुल्क, मेंटेनेंस, पायलट और क्रू की लागत, रूट पर यात्रियों की संख्या और सरकारी सपोर्ट जैसे कई फैक्टर किराया तय करते हैं.

हालांकि छोटे शहर से बड़े शहर तक सीधे उड़ान उपलब्ध होने पर यात्री के कुल सफर का खर्च कम हो सकता है. उदाहरण के लिए, अगर किसी यात्री को पहले सड़क या रेल से दूसरे शहर के एयरपोर्ट तक पहुंचना पड़ता है, फिर कनेक्टिंग फ्लाइट लेनी पड़ती है, तो टिकट के अलावा होटल, लोकल ट्रांसपोर्ट और अतिरिक्त समय का खर्च भी जुड़ जाता है. इसलिए क्षेत्रीय विमानन का फायदा सिर्फ कम हवाई किराये के रूप में नहीं, बल्कि पूरे सफर की लागत और समय बचने के रूप में देखना ज्यादा सही होगा.

भारत में विमान बने तो असली बदलाव यहां हो सकता है

ओमकाम एविएशंस की योजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 50 विमानों की संख्या नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर है. अगर प्रस्तावित योजना के मुताबिक भारत में धीरे-धीरे पूर्ण निर्माण क्षमता विकसित होती है, तो इसका असर विमान खरीद से आगे जाएगा.

विमान निर्माण के साथ कंपोनेंट सप्लाई, मेंटेनेंस, रिपेयर, इंजीनियरिंग, एवियोनिक्स, प्रशिक्षण और दूसरे सपोर्ट कारोबार के लिए भी अवसर बन सकते हैं. इससे एयरोस्पेस सेक्टर में कुशल रोजगार की मांग बढ़ सकती है. भारत सरकार भी क्षेत्रीय विमानन को घरेलू एयरोस्पेस क्षमता से जोड़ने की कोशिश कर रही है. मॉडिफाइड उड़ान में स्वदेशी विमान और हेलीकॉप्टरों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने का प्रावधान रखा गया है.  

यही वजह है कि अगर ओमकाम की प्रस्तावित योजना आगे बढ़ती है, तो इसका मूल्यांकन सिर्फ 50 विमानों की खरीद के हिसाब से करना कम होगा. असली सवाल यह होगा कि भारत में कितनी निर्माण क्षमता, कितना स्थानीय उत्पादन और कितना तकनीकी कौशल विकसित होता है.

विदेशों में निर्यात का प्लान कितना बड़ा दांव है

ओमकाम एविएशंस की योजना में भारत में निर्मित विमानों को दूसरे देशों में निर्यात करने की संभावना भी शामिल है. यह हिस्सा सफल हुआ तो भारत केवल क्षेत्रीय विमान का खरीदार नहीं रहेगा, बल्कि इसके निर्माण और संभावित निर्यात की भूमिका में आ सकता है.

लेकिन यहां कई चुनौतियां भी हैं. विमानन उद्योग में किसी विमान की बिक्री केवल कीमत पर निर्भर नहीं करती. सुरक्षा प्रमाणन, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता, इंजन और दूसरे महत्वपूर्ण सिस्टम की सप्लाई, मेंटेनेंस नेटवर्क तथा अलग-अलग देशों के नियामकीय नियम अहम भूमिका निभाते हैं.

इसके अलावा रूस से जुड़ी मौजूदा भू-राजनीतिक और सप्लाई-चेन चुनौतियां भी इस तरह की परियोजना के लिए महत्वपूर्ण जोखिम हो सकती हैं. इसलिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ भारत में सप्लाई चेन और मेंटेनेंस नेटवर्क का मजबूत होना परियोजना की सफलता के लिए बेहद जरुरी होगा.

छोटे शहरों के लिए यह सिर्फ फ्लाइट नहीं, कारोबार का नया रास्ता हो सकता है

क्षेत्रीय विमानन का फायदा केवल यात्रियों को नहीं मिलता. किसी छोटे शहर में नियमित उड़ान आने से पर्यटन, होटल, स्थानीय कारोबार, मेडिकल ट्रैवल और बिजनेस विजिट बढ़ सकते हैं. सरकार के आंकड़ों के मुताबिक उड़ान ने पहले ही पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं और आपातकालीन कनेक्टिविटी में भूमिका निभाई है. 

अगर छोटे शहरों के बीच सीधे रूट बढ़ते हैं, तो इसका एक कम चर्चा वाला फायदा यह होगा कि कारोबारियों को हर बार दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े एयरपोर्ट के जरिए यात्रा करने की जरूरत कम हो सकती है. इससे क्षेत्रीय कारोबारी नेटवर्क मजबूत हो सकता है. यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण छिपा हुआ पहलू है. विमान निर्माण भारत में होना बड़ी खबर है, लेकिन उससे भी बड़ा बदलाव तब होगा जब छोटे शहरों के बीच पर्याप्त सीधे रूट आर्थिक रूप से टिकाऊ बनेंगे.

आगे क्या देखना होगा?

अभी इस परियोजना को लेकर सबसे अहम चरण आगे का होगा. छह विमानों के शुरुआती बैच, भारत में असेंबली लाइन की स्थापना, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, वित्तीय व्यवस्था और नियामकीय मंजूरियां इसके अगले बड़े पड़ाव होंगे. इसके बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि किन भारतीय शहरों को पहले रूट मिलते हैं, इन रूट पर कितनी यात्री मांग रहती है और एयरलाइन ऑपरेशन कितने टिकाऊ साबित होते हैं.

भारत में क्षेत्रीय विमानन का बाजार तेजी से विकसित हो रहा है. ऐसे में 50 आईएल-114-300 विमानों की प्रस्तावित योजना अगर अपनी घोषित दिशा में आगे बढ़ती है, तो इसका असर सिर्फ एविएशन सेक्टर तक सीमित नहीं रहेगा. छोटे शहरों के यात्रियों के लिए यात्रा का समय घट सकता है, नए रोजगार बन सकते हैं और भारत की विमान निर्माण क्षमता को एक नया मौका मिल सकता है.

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि 50 विमान भारत आएंगे या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या ये विमान भारत के छोटे शहरों को एक-दूसरे से सीधे जोड़ने वाला ऐसा नेटवर्क बना पाएंगे, जिसमें आम यात्री को कनेक्टिंग फ्लाइट के बजाय अपने शहर से ही उड़ान मिल सके.

अपनी राय और अपने इलाके की खबर देने के लिए जुड़ें हमारे गूगल, फेसबुक, x,   इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सऐप कम्युनिटी से.

 

Read More
Advertisement
Advertisement
Advertisement