बिजनेस
How to Strat tin recycling: यश गुप्ता ने 2020 में मेटल रीसाइक्लिंग के काम से शुरुआत की और बाद में टिन रिफाइनिंग पर फोकस किया. रिकाया ग्रीनटेक स्क्रैप से 99.9 फीसदी शुद्ध टिन तैयार करने की प्रोसेस पर काम कर रही है. इसका लक्ष्य भारत की आयात निर्भरता घटाना और क्रिटिकल मिनरल रीसाइक्लिंग को बढ़ाना है.
यश गुप्ता की कहानी किसी सामान्य स्टार्टअप आइडिया से शुरू नहीं हुई. एक्सचेंज स्टूडेंट के तौर पर अमेरिका और ब्रिटेन में स्क्रैप यार्ड और रिफाइनिंग फैसिलिटीज देखने के दौरान उनकी दिलचस्पी मेटल रीसाइक्लिंग और रिफाइनिंग में बढ़ी.
भारत लौटने के बाद 2020 में उन्होंने रिकाया एंटरप्राइजेज की शुरुआत की. शुरुआती दौर में कंपनी कॉपर और पीवीसी को केबल स्क्रैप से रीसाइकिल करती थी. पहले साल कंपनी टिन इंगॉट के ट्रेडिंग और इम्पोर्ट के कारोबार में भी रही.
यहीं यश को एक बड़ा बिजनेस गैप दिखाई दिया. भारत में टिन की मांग तो है, लेकिन हाई प्योरिटी टिन बनाने की घरेलू क्षमता काफी सीमित थी. फोर्ब्स इंडिया के मुताबिक, भारत में इस्तेमाल होने वाला ज्यादातर टिन आयात से आता है, खास तौर पर मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों से.
यश गुप्ता ने सिर्फ टिन इम्पोर्ट करने के बजाय यह सोचने का फैसला किया कि भारत में मौजूद स्क्रैप से ही टिन क्यों न निकाला जाए. फोर्ब्स इंडिया के अनुसार, उन्होंने मेटलर्जिस्ट और केमिकल रिफाइनर्स की टीम के साथ मिलकर स्क्रैप से टिन रिफाइन करने की तकनीक पर काम शुरू किया. लक्ष्य था 99.9 फीसदी शुद्ध टिन तैयार करना. कंपनी ने इसके लिए हाइड्रोमेटलर्जिकल और पायरोमेटलर्जिकल रिफाइनिंग को मिलाकर एक प्रोपराइटरी ग्रीन प्रोसेस विकसित की.
यहां बिजनेस का असली दांव समझना जरूरी है. अगर किसी देश को कोई जरूरी धातु बाहर से खरीदनी पड़ती है तो उसकी सप्लाई, कीमत और ग्लोबल हालात का असर घरेलू इंडस्ट्री पर पड़ता है. लेकिन उसी धातु को देश के भीतर मौजूद स्क्रैप से वापस हासिल किया जाए तो सप्लाई चेन का एक हिस्सा देश के अंदर ही बनाया जा सकता है.
टिन की अहमियत सिर्फ एक मेटल के तौर पर नहीं है. यश गुप्ता ने हिंदुस्तान टाइम्स के एक लेख में लिखा है कि भारत अपनी सालाना टिन जरूरत का करीब 95 फीसदी आयात करता है और यह जरूरत लगभग 35,000 मीट्रिक टन बताई गई है. उन्होंने इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों से सप्लाई का भी जिक्र किया है.
फोर्ब्स इंडिया भी बताता है कि भारत रिफाइंड टिन का दुनिया का छठा सबसे बड़ा कंज्यूमर है और अपनी बढ़ती जरूरत पूरी करने के लिए लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है.
यानी कहानी सिर्फ एक स्टार्टअप की नहीं है. इसके पीछे भारत की मैन्युफैक्चरिंग जरूरत और ग्लोबल सप्लाई चेन का बड़ा सवाल जुड़ा है.
टिन का इस्तेमाल सुनने में जितना छोटा और साधारण लगता है, इसका इंडस्ट्रियल रोल उतना ही बड़ा है. फोर्ब्स इंडिया के मुताबिक हाई प्योरिटी टिन इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल, डिफेंस इक्विपमेंट और एडवांस्ड सोल्डरिंग एप्लीकेशंस में अहम इनपुट है.
इसका सीधा मतलब आम आदमी से भी जुड़ता है. भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिक व्हीकल और एडवांस्ड इंडस्ट्री का विस्तार होगा तो ऐसे मटीरियल की मांग भी बढ़ेगी.
अगर इन मटीरियल्स की सप्लाई के लिए भारत लगातार दूसरे देशों पर निर्भर रहता है, तो ग्लोबल कीमतों, ट्रेड पॉलिसी और सप्लाई में रुकावट का असर घरेलू मैन्युफैक्चरिंग तक पहुंच सकता है.
रिकाया ग्रीनटेक का सबसे खास पहलू यही है कि कंपनी टिन को पारंपरिक तरीके से सिर्फ अयस्क और कॉन्सन्ट्रेट से हासिल करने के बजाय सेकेंडरी रिसोर्स यानी स्क्रैप से रिकवर करने पर काम कर रही है.
फोर्ब्स इंडिया के अनुसार, कंपनी की प्रोपराइटरी ग्रीन टेक्नोलॉजी स्क्रैप से 99.9 फीसदी शुद्धता वाले टिन इंगॉट तैयार करने के लिए विकसित की गई है. रिपोर्ट के मुताबिक इस स्तर की प्योरिटी हासिल करना पारंपरिक रूप से टिन अयस्क और कॉन्सन्ट्रेट की प्रोसेसिंग से जुड़ा रहा है.
यही इस बिजनेस का छिपा हुआ एंगल है. यहां कच्चा माल सिर्फ जमीन के नीचे मौजूद खनिज नहीं है. इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट और इंडस्ट्रियल स्क्रैप भी एक तरह की अर्बन माइन बन सकते हैं.
यश ने इस काम की शुरुआत अपनी सेविंग्स से की. इसके बाद कंपनी ने बैंकों और दूसरे फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस से फंड जुटाया और हिमाचल प्रदेश के बद्दी में प्लांट स्थापित किया. इसके बाद कंपनी ने अपने टिन इंगॉट के लिए खरीदार तलाशने शुरू किए.
युवा उद्यमियों के लिए यह हिस्सा खासा अहम है. हर मैन्युफैक्चरिंग स्टार्टअप को शुरुआत से ही बहुत बड़ी फंडिंग मिले, ऐसा जरूरी नहीं है. लेकिन डीप टेक और इंडस्ट्रियल बिजनेस में सिर्फ आइडिया काफी नहीं होता. टेक्नोलॉजी, प्लांट, क्वालिटी और खरीदारों का भरोसा बनाने के लिए लगातार पूंजी और मेहनत दोनों चाहिए.
रिकाया ग्रीनटेक की कहानी सिर्फ टिन तक सीमित रहने वाली नहीं दिखती. फोर्ब्स इंडिया के मुताबिक कंपनी स्क्रैप से कॉपर और सिल्वर जैसे दूसरे मेटल्स निकालने की दिशा में भी काम कर रही है.
इसका मतलब यह है कि यश गुप्ता एक अकेले टिन बिजनेस के बजाय क्लीन टेक मेटल्स प्लेटफॉर्म तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं.
यही मॉडल आगे चलकर ज्यादा अहम हो सकता है. क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट बढ़ने के साथ उसमें मौजूद कीमती और क्रिटिकल मेटल्स को वापस हासिल करना केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि यह मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई सिक्योरिटी का भी सवाल बन जाएगा.
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, ईवी और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को तेजी से बढ़ाना चाहता है. लेकिन किसी भी बड़ी मैन्युफैक्चरिंग इकोनॉमी की ताकत सिर्फ तैयार प्रोडक्ट बनाने की क्षमता से नहीं आती. उसके पीछे जरूरी मटीरियल की सप्लाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है.
हिंदुस्तान टाइम्स में यश गुप्ता ने भी इसी बात पर जोर दिया है कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग आत्मनिर्भरता सिर्फ असेंबली लाइन तक सीमित नहीं हो सकती. जिन मटीरियल्स की जरूरत इन इंडस्ट्रीज को है, उनकी रीसाइक्लिंग और रिफाइनिंग क्षमता भी देश में विकसित करनी होगी.
यही वजह है कि स्क्रैप से टिन निकालने का यह प्रयोग देखने में भले ही एक छोटे इंडस्ट्रियल सेक्टर की कहानी लगे, लेकिन इसका असर इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर ईवी और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग तक जा सकता है.
यश गुप्ता की कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि आने वाले समय में कचरा सिर्फ कचरा नहीं रहेगा. इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट और इंडस्ट्रियल स्क्रैप में मौजूद मेटल्स की कीमत बढ़ने के साथ उन्हें रिकवर करने वाली टेक्नोलॉजी भी अहम होती जाएगी.
भारत अगर अपने इस्तेमाल किए हुए मटीरियल से ही ज्यादा से ज्यादा क्रिटिकल मेटल वापस निकाल सके, तो एक तरफ आयात पर निर्भरता घट सकती है और दूसरी तरफ रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री, टेक्नोलॉजी और रोजगार के नए मौके बन सकते हैं.
रिकाया ग्रीनटेक इसी बड़े बदलाव की एक मिसाल है. 27 साल के यश गुप्ता ने जिस समस्या को देखा, उसमें उन्होंने सिर्फ पर्यावरण की परेशानी नहीं देखी. उन्होंने उसमें भारत की मैन्युफैक्चरिंग और मेटल सिक्योरिटी से जुड़ा बिजनेस अवसर भी खोज लिया. फोर्ब्स इंडिया ने उन्हें 2026 की 30 अंडर 30 सूची में क्लीन एनर्जी और क्लाइमेट चेंज कैटेगरी में शामिल किया है.
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