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पिता की मार से घर से भागे, ₹18 में होटल में मांजे जूठे बर्तन, डोसा किंग बनकर यूं खड़ी कर दी 300Cr की 'सागर रत्ना'

आज हम आपको सागर रत्ना के मालिक जयराम बनन की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने पिता की मार से बचने के लिए घर छोड़ दिया और फिर एक होटल में काम करते हुए उनके दिमाग में ऐसा आइडिया आया जिसने उन्हें 300 करोड़ की फूड चेन कंपनी का मालिक बना दिया...

Jaya Pandey | May 08, 2026, 01:56 PM IST

1.सागर रत्ना के मालिक जयराम बनन की सफलता की कहानी

सागर रत्ना के मालिक जयराम बनन की सफलता की कहानी
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फर्श से अर्श तक पहुंचने की कई कहानियां आपने सुनी होंगी, लेकिन आज हम आपको जो कहानी बताने जा रहे हैं वह आपको भावुक कर देगी. ये कहानी है सागर रत्ना के मालिक जयराम बनन की, जिन्होंने पिता की मार से बचने के लिए घर छोड़ दिया और फिर एक होटल में काम करते हुए उनके दिमाग में ऐसा आइडिया आया जिसने उन्हें 300 करोड़ की फूड चेन कंपनी का मालिक बना दिया. 
(Image Credit: Social Media)

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2.18 रुपये में शुरू किया होटल में बर्तन धोने का काम

18 रुपये में शुरू किया होटल में बर्तन धोने का काम
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कर्नाटक के उडुपी इलाके के रहने वाले जयराम बनन के पिता ड्राइवर थे. परिवार की आर्थिक स्थिति बिलकुल भी ठीक नहीं थी. एक दिन स्कूल में अच्छे नंबर न ला पाने की वजह से पिता ने उन्हें इतना मारा कि उन्होंने घर छोड़ने का मन बना लिया. साल 1967 में 13 साल की उम्र में वह ट्रेन से मुंबई भाग गए. उनकी जेब में उस वक्त एक भी रुपया नहीं था और न ही कोई ऐसा आसरा था, जहां वह पनाह ले सकें. वह मुंबई पहुंचें और एक होटल में मेज साफ करने और जूठे बर्तन धोने का काम करने लगे. इसके लिए उन्हें 18 रुपये की पगार मिलती थी. 
(Image Credit: Social Media)

3.12 साल तक दिल्ली में कैंटीन चलाकर की रेस्टोरेंट के लिए बचत

12 साल तक दिल्ली में कैंटीन चलाकर की रेस्टोरेंट के लिए बचत
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धीरे-धीरे ईमानदारी की वजह से लोग उन्हें पसंद करने लगे. एक समय ऐसा आया कि वे वेटर से होटल के मैनेजर बन गए और उनकी सैलरी भी अच्छी हो गई. उस वक्त मुंबई में साउथ इंडियन खाने की लोकप्रियता बढ़ रही थी. जयराम ने महसूस किया कि उत्तर भारत में भी अच्छे दक्षिण भारतीय खाने की बहुत मांग हो सकती है. उनके बड़े भाई उस समय दिल्ली के एक उडुपी रेस्टोरेंट में काम करते थे. जयराम भी 1974 में दिल्ली आ गए. यहां उन्हें सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड की कैंटीन चलाने का ठेका मिला. उन्होंने करीब 12 साल तक कैंटीन चलाई और हर छोटी-बड़ी बचत को जोड़ते रहे, क्योंकि उनका सपना अपना खुद का रेस्टोरेंट खोलना था.
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4.सागर नाम से शुरू किया पहला रेस्टोरेंट

सागर नाम से शुरू किया पहला रेस्टोरेंट
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आखिरकार 1986 में जयराम बनन ने दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी में सागर नाम से अपना पहला रेस्टोरेंट शुरू किया. उस समय वे हर हफ्ते लगभग 3,250 रुपये किराया देते थे. रेस्टोरेंट छोटा था और उसमें सिर्फ 40 सीटें थीं, लेकिन उनके इडली, डोसा और सांभर का स्वाद लोगों को इतना पसंद आया कि पहले ही दिन उन्हें मुनाफा हुआ. धीरे-धीरे सागर दिल्ली के लोगों के बीच लोकप्रिय हो गया.
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5.यूं बने उत्तर भारत के डोसा किंग

यूं बने उत्तर भारत के डोसा किंग
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उस दौर में दिल्ली में दक्षिण भारतीय खाने के लिए वुडलैंड और दासप्रकाश जैसे बड़े नाम मशहूर थे. कुछ समय बाद जयराम को लोधी मार्केट स्थित वुडलैंड रेस्टोरेंट संभालने का मौका मिला. उन्होंने इसका नाम बदलकर सागर रत्ना रखा. यहीं से सागर रत्ना रेस्टोरेंट चेन की असली शुरुआत हुई. उनके डोसे और सांभर इतने प्रसिद्ध हुए कि लोग कई किलोमीटर दूर से खाने आते थे और लंबी कतारें लग जाती थीं. इसी लोकप्रियता के कारण जयराम बनन को उत्तर भारत का डोसा किंग कहा जाने लगा.
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6.विदेशों में भी है सागर रत्ना के आउटलेट्स

विदेशों में भी है सागर रत्ना के आउटलेट्स
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आज जयराम बनन के ब्रांड सागर रत्ना और स्वागत के भारत सहित सिंगापुर, कनाडा और थाईलैंड जैसे देशों में 100 से अधिक आउटलेट हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उनके फूड बिजनेस की अनुमानित नेटवर्थ 300 करोड़ रुपये से ज्यादा है. एक समय 18 रुपये में बर्तन धोने वाला यह लड़का आज भारतीय रेस्टोरेंट इंडस्ट्री के सबसे प्रेरणादायक उद्यमियों में गिना जाता है. उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर इंसान के अंदर मेहनत करने और बड़ा सपना देखने का साहस हो तो कठिन हालात भी उसे रोक नहीं सकते.
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