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60 हजार लोन लेके शुरू किया सफर! आज सालाना ₹3.5 लाख का टर्नओवर, जानिए ‘लखपति दीदी' की कामयाबी का मंत्र

Success Story: सरगुजा की 'लखपति दीदी' कमला मंडल ने मात्र 60 हजार का लोन लेकर डेयरी फार्मिंग का बिजनेस शुरू किया और अब सालाना ₹1.5 लाख की नेट बचत कर रही हैं.इतना ही नहीं अब वह खुद, महिलाओं को भी स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रही है.

ऋतु सिंह | May 17, 2026, 03:03 PM IST

1.महिलाएं खुद के काम पर दे रही जोर

महिलाएं खुद के काम पर दे रही जोर
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गांव में रहने वाली महिलाओं के लिए अक्सर कमाई के मौके सीमित माने जाते हैं. घर, खेत और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अपना बिजनेस शुरू करना आसान नहीं होता. लेकिन छत्तीसगढ़ की एक महिला ने दिखा दिया कि अगर सही योजना और हिम्मत हो, तो छोटी शुरुआत भी बड़ी सफलता में बदल सकती है.

सिर्फ ₹60 हजार के लोन से शुरू हुआ एक छोटा काम आज लाखों के कारोबार में बदल चुका है. खास बात यह है कि इस सफलता ने सिर्फ एक परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं बदली, बल्कि आसपास की महिलाओं के सोचने का तरीका भी बदल दिया है. अब गांवों में महिलाएं नौकरी के इंतजार से ज्यादा खुद का काम शुरू करने पर ध्यान देने लगी हैं. (फोटो एआई)
 

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2.छोटे लोन से शुरू हुआ बड़ा बदलाव

छोटे लोन से शुरू हुआ बड़ा बदलाव
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सरगुजा जिले के एक गांव में रहने वाली कमला मंडल ने कभी नहीं सोचा था कि पशुपालन उनका जीवन बदल देगा. शुरुआत में परिवार की आमदनी सीमित थी और खर्च संभालना मुश्किल हो रहा था. इसी दौरान उन्होंने स्वयं सहायता समूह से जुड़ने का फैसला किया.

समूह के जरिए उन्हें ₹60 हजार का लोन मिला. इस पैसे से उन्होंने डेयरी का छोटा काम शुरू किया. शुरुआत में कम गायों के साथ दूध बेचने का काम शुरू हुआ, लेकिन धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी.

ग्रामीण इलाकों में अक्सर लोग सोचते हैं कि बड़ा बिजनेस शुरू करने के लिए लाखों रुपये चाहिए, लेकिन कमला की कहानी इस सोच को पूरी तरह बदल देती है.(फोटो एआई)
 

3.डेयरी के साथ खेती और मछली पालन से बढ़ाई कमाई

डेयरी के साथ खेती और मछली पालन से बढ़ाई कमाई
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कमला ने सिर्फ एक कमाई के स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग काम जोड़ने की रणनीति अपनाई. डेयरी के साथ उन्होंने खेती और मछली पालन भी शुरू किया.

यही वह छिपा हुआ फॉर्मूला है जिसे आज कई ग्रामीण उद्यमी अपना रहे हैं. अगर किसी एक काम में नुकसान हो, तो दूसरा सहारा बन जाता है. इससे आय स्थिर रहती है और जोखिम कम होता है. विशेषज्ञ भी मानते हैं कि गांवों में मल्टीपल इनकम मॉडल तेजी से सफल हो रहा है, क्योंकि इससे परिवार की आर्थिक सुरक्षा बढ़ती है.(फोटो एआई)
 

4.आज लाखों का कारोबार, लेकिन असली सफलता कहीं और है

आज लाखों का कारोबार, लेकिन असली सफलता कहीं और है
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आज कमला मंडल सालाना करीब ₹3.5 लाख का कारोबार कर रही हैं. खर्च निकालने के बाद भी उनके पास अच्छी बचत हो रही है. लेकिन उनकी सफलता सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं है.

असल बदलाव आत्मविश्वास का है. पहले जहां गांव की महिलाएं सिर्फ घर तक सीमित रहती थीं, वहीं अब कई महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर अपना काम शुरू करने की जानकारी ले रही हैं.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में यह बदलाव बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे परिवारों की आर्थिक निर्भरता कम हो रही है और महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता बढ़ रही है.(फोटो एआई)
 

5.सरकारी योजनाएं कैसे बदल रही हैं गांव की तस्वीर

सरकारी योजनाएं कैसे बदल रही हैं गांव की तस्वीर
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पिछले कुछ वर्षों में स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी योजनाओं ने गांवों में बड़ा असर दिखाया है. पहले बैंक लोन लेना ग्रामीण महिलाओं के लिए मुश्किल माना जाता था, लेकिन अब समूह मॉडल ने यह रास्ता आसान कर दिया है.

कम ब्याज, सामूहिक समर्थन और ट्रेनिंग की वजह से महिलाएं अब छोटे बिजनेस को लेकर ज्यादा आत्मविश्वासी हो रही हैं. यही कारण है कि डेयरी, मशरूम खेती, मछली पालन और फूड प्रोसेसिंग जैसे छोटे व्यवसाय गांवों में तेजी से बढ़ रहे हैं. यह बदलाव सिर्फ कमाई का नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की सोच बदलने का संकेत भी माना जा रहा है.(फोटो एआई)

6.क्यों खास है यह कहानी

क्यों खास है यह कहानी
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कमला मंडल की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि इसमें बड़ी पूंजी, बड़ा शहर या ऊंची पढ़ाई नहीं थी. यहां सिर्फ सही मौके का इस्तेमाल और लगातार मेहनत थी.

आज जब महंगाई और नौकरी का दबाव बढ़ रहा है, तब ऐसे मॉडल गांवों के लिए नई उम्मीद बन रहे हैं. खासकर महिलाओं के लिए यह संदेश साफ है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रही.

एक छोटा लोन, सही योजना और लगातार मेहनत गांव की जिंदगी को भी पूरी तरह बदल सकती है.(फोटो एआई)
 

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