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डॉलर क्यों है दुनिया की सबसे ताकतवर करेंसी? जानिए इसके पीछे की पूरी कहानी

यूरोप हो या एशिया, अफ्रीका हो या मिडिल ईस्ट हर जगह डॉलर की जरूरत महसूस होती है. इन सबके बीच यह सवाल उठता है कि आखिर डॉलर ही क्यों इतनी अहम भूमिका निभाता है? क्या यह सिर्फ अमेरिका की ताकत का असर है या इसके पीछे कोई बड़ी व्यवस्था है? 

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डॉलर क्यों है दुनिया की सबसे ताकतवर करेंसी? जानिए इसके पीछे की पूरी कहानी

(सांकेतिक तस्वीर)

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अगर किसी करेंसी ने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना ली है, तो वह है अमेरिकी डॉलर. यूरोप हो या एशिया, अफ्रीका हो या मिडिल ईस्ट हर जगह डॉलर की जरूरत महसूस होती है. विदेशी व्यापार, निवेश और तेल की खरीद जैसे बड़े सौदे आज भी इसी करेंसी में होते हैं. हालांकि, इन सबके बीच यह सवाल उठता है कि आखिर डॉलर ही क्यों इतनी अहम भूमिका निभाता है? क्या यह सिर्फ अमेरिका की ताकत का असर है या इसके पीछे कोई बड़ी व्यवस्था है? 

कैसे शुरू हुआ डॉलर का दबदबा

दरअसल यह कहानी शुरू होती है, दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब ज्यादातर देश आर्थिक संकट से जूझ रहे थे. इस दौरान अमेरिका मजबूत स्थिति में था. उसी दौर में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को स्थिर करने के लिए एक व्यवस्था बनाई गई, जिसमें डॉलर को केंद्र में रखा गया. धीरे-धीरे दुनिया के देशों ने डॉलर को अपनाना शुरू किया. इससे डॉलर सिर्फ अमेरिका की नहीं, बल्कि वैश्विक लेन-देन की पहचान बन गया. समय के साथ व्यापार और कर्ज का बड़ा हिस्सा इसी मुद्रा में होने लगा. एक लंबे वक्त तक डॉलर को सोने से जोड़ा गया था. जिसके कारण उसकी विश्वसनीयता और बढ़ी. हालांकि, बाद में यह व्यवस्था बदली, लेकिन तब तक डॉलर दुनिया की आदत बन चुका था. दुनीया के तमाम देश अपने केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर रखने लगे. इसकी वजह साफ थी, संकट के समय डॉलर सबसे आसानी से इस्तेमाल होने वाली करेंसी साबित होती है. यही कारण है कि आज भी इसे सुरक्षित मुद्रा माना जाता है. 

फेडरल रिजर्व के फैसले क्यों होते हैं अहम

डॉलर की दिशा तय करने में अमेरिका का केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व, बड़ी भूमिका निभाता है. ब्याज दरों में उसका एक छोटा सा बदलाव भी ग्लोबल बाजारों को प्रभावित करता है. जब अमेरिका में ब्याज बढ़ती है, तो निवेशक वहां पैसा लगाना ज्यादा सुरक्षित समझते हैं. इससे डॉलर मजबूत होता है और उभरते देशों की मुद्राओं पर दबाव आता है. यही वजह है कि फेड के फैसलों पर पूरी दुनिया की नजर रहती है. 

तेल और डॉलर का गहरा कनेक्शन

दरअसल डॉलर की मजबूती की एक अहम वजह तेल का व्यापार है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल ज्यादातर डॉलर में खरीदा-बेचा जाता है. इसका मतलब है कि चाहे कोई भी देश हो, उसे तेल खरीदने के लिए डॉलर की जरूरत पड़ेगी. इस सिस्टम ने डॉलर की मांग को लगातार बनाए रखा है और इसे कमजोर होने से बचाया है. 

वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी अब भी सबसे ज्यादा

विदेशी मुद्रा बाजार में बड़े बैंक, निवेश फंड और संस्थागत खिलाड़ी हर दिन भारी रकम का लेन-देन करते हैं. इनकी रणनीति और फैसले कई बार किसी करेंसी की वैल्यू को तेजी से बदल देते हैं. हालांकि बाजार में उतार-चढ़ाव आता रहता है, लेकिन डॉलर अक्सर सबसे मजबूत स्थिति में बना रहता है, क्योंकि उस पर भरोसा ज्यादा है. हालांकि, हाल के वर्षों में कई देश डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की बात कर रहे हैं.  लोकल करेंसी में व्यापार और वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम पर जोर दिया जा रहा है. इसके बावजूद हकीकत यह है कि फिलहाल डॉलर का कोई मजबूत विकल्प मौजूद नहीं है. वैश्विक व्यापार और निवेश में उसकी हिस्सेदारी अब भी सबसे ज्यादा है. 


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भरोसा ही असली ताकत

विशेषज्ञ मानते हैं कि डॉलर की असली ताकत अमेरिका की अर्थव्यवस्था से ज्यादा उस भरोसे में है, जो दशकों में बना है. साफ नियम, स्थिर सिस्टम और बड़े बाजार ने डॉलर को ऐसी स्थिति में पहुंचाया है, जहां उसे हटाना आसान नहीं है. यही वजह है कि आज भी ग्लोबल इकोनॉमी में डॉलर की भूमिका सबसे अहम बनी हुई है.

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