बिजनेस
विक्रम 1 मिशन की सफलता के बाद स्काईरूट एयरोस्पेस के को-फाउंडर और CEO पवन कुमार चंदना की काफी चर्चा हो रही है. आज हम आपको बताएंगे कि हैदराबाद के एक साधारण स्टूडेंट से भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर का बड़ा चेहरा बनने तक का उनका सफर कैसा रहा है.
भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर में शनिवार को उस वक्त ऐतिहासिक पल आया, जब स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च होकर अपनी कक्षा में पहुंच गया. यह उपलब्धि इसलिए खास है क्योंकि पहली बार किसी भारतीय प्राइवेट कंपनी के विकसित ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल ने सफलतापूर्वक उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया. इस मिशन ने यह साबित कर दिया कि अब भारत का प्राइवेट स्पेस इंडस्ट्री भी ग्लोबल लेवल पर एलन मस्क की स्पेसएक्स जैसी कंपनियों को कड़ी टक्कर देने के लिए तैयार है.
इस सफलता के पीछे जिन लोगों की सबसे बड़ी भूमिका रही, उनमें स्काईरूट एयरोस्पेस के को-फाउंडर और CEO पवन कुमार चंदना का नाम सबसे आगे है. आज हम आपको बताएंगे कि हैदराबाद के एक साधारण स्टूडेंट से भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर का बड़ा चेहरा बनने तक का उनका सफर कैसा रहा है.
कुछ साल पहले तक पवन कुमार चंदना ISRO में काम करने वाले एक इंजीनियर थे. स्पेस साइंस की दुनिया से बाहर बहुत कम लोग ही उन्हें जानते थे. लेकिन आज उनकी पहचान भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर के सबसे सफल उद्यमियों में होती है. विक्रम-1 मिशन की सफलता ने उन्हें देश के उन चुनिंदा लोगों की लिस्ट में शामिल कर दिया है, जिन्होंने भारत के अंतरिक्ष इतिहास में नया अध्याय जोड़ने में अहम भूमिका निभाई है.
पवन कुमार चंदना का जन्म और पालन-पोषण हैदराबाद की एक मिडिल क्लास फैमिली में हुआ. उनके परिवार में हमेशा पढ़ाई-लिखाई को महत्व दिया जाता था. हालांकि, वह बचपन से ही पढ़ाई में होनहार स्टूडेंट नहीं रहे. साइंस और मैथ्स में उनकी दिलचस्पी नहीं थी और उन्हें कई सब्जेक्ट में पढ़ाई में दिक्कत होती थी. लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. लगातार मेहनत और परिवार के प्रोत्साहन ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी. धीरे-धीरे साइंस और मैथ्स जैसे विषय उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गए और आगे चलकर यही विषय उनके करियर की मजबूत नींव साबित हुए.
यह भी पढ़ें- अंतरिक्ष में मिला अदृश्य रास्ता! ब्रह्मांड के 'लाइटहाउस' ने खोला करोड़ों साल पुराना राज
स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने आईआईटी में एडमिशन पाने का लक्ष्य साधा. कड़ी मेहनत के दम पर उन्होंने पहले ही अटेम्प्ट में IIT-JEE परीक्षा पास कर ली. इसके बाद साल 2007 में उनका एडमिशन आईआईटी खड़गपुर में हुआ. यहां उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में ड्यूल डिग्री हासिल की. IIT में बिताए पांच साल ने उन्हें सिर्फ टेक्निकल नॉलेज ही नहीं दिया, बल्कि कठिन इंजीनियरिंग प्रॉब्लम्स को सॉल्व करने का प्रैक्टिकल एक्सपीरियंस भी दिया.
साल 2012 में पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका सिलेक्शन ISRO में हुआ. किसी भी इंजीनियर के लिए ISRO में नौकरी मिलना एक बड़े सपने के पूरा होने जैसा होता है. करीब 6 साल तक उन्होंने इंडियन स्पेस प्रोग्राम से जुड़े कई अहम प्रोडेक्ट्स पर काम किया. इस दौरान उन्होंने रॉकेट टेक्निक, लॉन्च सिस्टम और स्पेस इंजीनियरिंग की बारीकियों को बेहद करीब से समझा.
ISRO में काम करते हुए पवन कुमार चंदना ने देखा कि अमेरिका और यूरोप में स्पेसएक्स और रॉकेट लैब जैसी प्राइवेट कंपनियां स्पेस इंडस्ट्री में तेजी से बदलाव ला रही हैं. उन्हें महसूस हुआ कि भारत में भी प्राइवेट कंपनियां रॉकेट निर्माण और सैटेलाइट लॉन्चिंग में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं. इस सोच ने उनके अंदर उद्यमिता का सपना जगाया. उन्होंने तय किया कि वह सरकारी नौकरी की सिक्योरिटी छोड़कर भारत में एक प्राइवेट स्पेस टेक कंपनी बनाएंगे.
साल 2018 में पवन कुमार चंदना ने अपने सहयोगी और ISRO के पूर्व साइंटिस्ट नागा भरत डाका के साथ मिलकर हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की. उस समय भारत में प्राइवेट अंतरिक्ष कंपनियों के लिए रास्ता आसान नहीं था. न तो कोई स्थापित मॉडल था और न ही प्रॉपर इन्वेस्टमेंट. इसके बावजूद दोनों ने रिस्क लिया औप पूरी तरह स्वदेशी टेक्निक के साथ रॉकेट विकसित करने का काम शुरू किया.
स्काईरूट को पहली बड़ी सफलता नवंबर 2022 में मिली. कंपनी ने Vikram-S सबऑर्बिटल रॉकेट की सफल लॉन्चिंग की. यह भारत के किसी प्राइवेट स्टार्टअप का पहला लॉन्च किया गया रॉकेट था. इस मिशन ने साबित कर दिया कि कंपनी के पास रॉकेट डिजाइन करने, बनाने और लॉन्च करने की क्षमता है. इसके बाद कंपनी ने लगातार अपने लॉन्च व्हीकल्स, इंजन और स्पेस टेक्नोलॉजी पर काम जारी रखा.
यह भी पढ़ें- जूपिटर जितना आकार, लेकिन रूई जैसा हल्का वजन...वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाले अंतरिक्ष के सबसे सूजे हुए ग्रह
शनिवार, 18 जुलाई को विक्रम-1 की सफल उड़ान ने स्काईरूट एयरोस्पेस को भारत की पहली प्राइवेट कंपनी बना दिया, जिसने अपने ऑर्बिटल रॉकेट के जरिए सफलतापूर्वक उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया. यह उपलब्धि केवल एक लॉन्च की सफलता नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि भारत का निजी स्पेस सेक्टर अब ग्लोबल लॉन्च मार्केट में प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार है.
पवन कुमार चंदना की कहानी से यह सीख मिलती है कि बड़े सपने देखने के लिए सिर्फ प्रतिभा ही नहीं, बल्कि रिस्क लेने का साहस भी होना चाहिए. ISRO की नौकरी छोड़कर उन्होंने एक ऐसा सपना देखा जिसे पूरा होने को लोग नामुमकिन मानते थे लेकिन आज विक्रम-1 की सफलता के बाद उनका नाम उन भारतीय उद्यमियों में शामिल हो गया है, जिन्होंने यह साबित किया है कि भारत का प्राइवेट स्पेस सेक्टर अब नई ऊंचाइयों को छूने के लिए पूरी तरह तैयार है.