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त्योहारों या छुट्टियों के सीजन में ट्रेन का सफर करने वाले हर शख्स का सामना कभी न कभी वेटिंग टिकट से जरूर होता है. टिकट बुक करने के बाद जब वेटिंग लिस्ट लंबी दिखती है, तो अक्सर लोग मायूस हो जाते हैं.
अक्सर जब ट्रेन का टिकट बुक करने पर 'वेटिंग 50' या 'वेटिंग 100' दिखता है तो दिल बैठ जाता है. इसके बाद शुरू होता है जुगाड़ और कयासों का दौर. कोई कहता है कि रेलवे के बाबू से सेटिंग कर लो, तो कोई कहता है कि टीटीई (TTE) को कुछ 'सेवा पानी' दे दो, टिकट कंफर्म हो जाएगा. लेकिन क्या वाकई वेटिंग टिकट कंफर्म होने के पीछे कोई इंसानी सेटिंग या खेल होता है? जवाब है- बिल्कुल नहीं.
रेलवे का टिकट बुकिंग और कंफर्मेशन सिस्टम पूरी तरह से एक एडवांस कंप्यूटर प्रोग्राम यानी एल्गोरिदम पर काम करता है. इसमें किसी भी तरह की इंसानी दखलंदाजी या भाई-भतीजावाद की गुंजाइश नहीं होती. आसान शब्दों में समझते हैं कि इसके पीछे का असली सच क्या है और रेलवे का यह सिस्टम कैसे काम करता है.
भारतीय रेलवे के मुताबिक, जब कोई यात्री अपना कंफर्म टिकट कैंसिल कराता है, तो वह सीट वेटिंग लिस्ट वाले अगले यात्री को मिल जाती है. लेकिन यह इतना सीधा भी नहीं है. रेलवे में कई तरह के कोटा होते हैं, जैसे- जनरल कोटा, लेडीज कोटा, सीनियर सिटीजन कोटा और सबसे महत्वपूर्ण तत्काल और प्रीमियम तत्काल कोटा.
इसके अलावा एक 'एचओ कोटा' (Headquarters/High Official Quota) भी होता है, जिसे अक्सर लोग वीआईपी कोटा समझ लेते हैं. यह कोटा आपातकालीन स्थितियों, सरकारी काम से यात्रा कर रहे अधिकारियों, सांसदों या गंभीर मरीजों के लिए रिजर्व होता है. अगर ट्रेन छूटने के कुछ घंटे पहले इस कोटे की सीटें खाली रह जाती हैं, तो सिस्टम इन्हें अपने आप आम वेटिंग लिस्ट वाले यात्रियों को अलॉट कर देता है. लोगों को लगता है कि यह किसी सेटिंग से हुआ, जबकि यह एल्गोरिदम का पहले से तय नियम है.
ट्रेन खुलने के करीब 4 घंटे पहले पहला चार्ट बनता है. इसी वक्त सबसे ज्यादा वेटिंग टिकट कंफर्म होते हैं. रेलवे का एल्गोरिदम देखता है कि किस कोटे में कितनी सीटें खाली हैं. उदाहरण के लिए, यदि सीनियर सिटीजन कोटे की 5 सीटें खाली रह गईं, तो वे सीटें सबसे पहले रिमोट लोकेशन वेटिंग लिस्ट (RLWL) या जनरल वेटिंग लिस्ट (GNWL) के टॉप यात्रियों को दे दी जाती हैं. यह सब कुछ कंप्यूटर खुद करता है, इसमें कोई क्लर्क या अधिकारी अपनी मर्जी से किसी का नाम ऊपर-नीचे नहीं कर सकता.
कई बार लोगों को लगता है कि ट्रेन चलने के बाद टीटीई ने किसी को सीट दे दी, तो वह सेटिंग थी. सच यह है कि ट्रेन का चार्ट फ्रीज होने के बाद अगर कोई यात्री ट्रेन में नहीं चढ़ता, तो वह सीट खाली हो जाती है. टीटीई के पास जो हैंडहेल्ड टर्मिनल डिवाइस होता है, वह सीधे रेलवे के मुख्य सर्वर से जुड़ा होता है. जैसे ही टीटीई किसी खाली सीट को मार्क करता है, वह सीट अगले स्टेशन के वेटिंग लिस्ट वाले यात्री को सिस्टम के जरिए ही अलॉट होती है.
टीटीई अपनी जेब से सीट नहीं दे सकता, वह सिर्फ खाली सीट की जानकारी सिस्टम में दर्ज करता है. तो अगली बार जब आपकी वेटिंग क्लियर हो जाए, तो किसी जुगाड़ू दोस्त को थैंक्यू बोलने के बजाय रेलवे के ऑटोमैटिक एल्गोरिदम को शुक्रिया कहिए. रेलवे के इस डिजिटल सिस्टम में किसी भी एजेंट या दलाल के बहकावे में न आएं, क्योंकि टिकट कंफर्म होने का एकमात्र तरीका सिर्फ और सिर्फ नियमों के तहत कैंसिलेशन और कोटे का खाली होना ही है.
(नोट- ये जानकारी भारतीय रेलवे के आधिकारिक टिकट बुकिंग नियमों, पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम के वर्किंग मॉडल और रेलवे मंत्रालय द्वारा जारी गाइडलाइंस पर आधारित है.)