बिजनेस
बदलते दौर के साथ मार्केट में कई ऐसे नए और अछूते सेक्टर्स उभर कर आए हैं, जहां ग्राहकों की मांग तो बहुत ज्यादा है, लेकिन सर्विस देने वाले नाममात्र के हैं.
भारत में जब भी बिजनेस शुरू करने की बात आती है, तो ज्यादातर लोग किराना दुकान, कपड़ों का शोरूम या कैफे खोलने के बारे में सोचते हैं. नतीजा ये होता है कि इन सेक्टर्स में मुकाबला बहुत कड़ा हो जाता है. लेकिन भारत के बदलते बाजार में आज भी कुछ ऐसे अनोखे और नए बिजनेस आइडियाज मौजूद हैं, जहां डिमांड तो बहुत ज्यादा है, लेकिन कंपटीशन न के बराबर है.
अगर आप भी किसी ऐसे बिजनेस की तलाश में हैं जहां आपको मुकाबला कम और मुनाफा ज्यादा मिले, तो आपको फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) की मार्केट रिसर्च रिपोर्ट्स और भारतीय एमएसएमई सेक्टर के नए बिजनेस सर्वे के आधार पर ऐसे ही 7 बेहतरीन बिजनेस आइडियाज के बारे में बताते हैं.
आजकल मेट्रो शहरों से लेकर छोटे शहरों तक में लोग शौक से कुत्ता या बिल्ली पाल रहे हैं. लेकिन जब उन्हें कहीं बाहर जाना होता है, तो वे अपने पेट्स यानी पालतू जानवरों को छोड़ने के लिए सुरक्षित जगह ढूंढते हैं. इसके अलावा उनकी कटिंग और ग्रूमिंग के लिए भी एक्सपर्ट्स की कमी है. इस फील्ड में आज भी बहुत कम लोग काम कर रहे हैं.
बड़े शहरों में एक पेट की सिर्फ एक बार की ग्रूमिंग के ₹1,500 से ₹3,000 लिए जाते हैं. वहीं त्योहारों या छुट्टियों के सीजन में पेट्स को रखने के लिए प्रति दिन के ₹500 से ₹1,000 तक चार्ज किया जाता है. अगर आपके पास रोज के सिर्फ 5-6 पेट्स भी आ रहे हैं, तो कमाई बहुत शानदार होगी.
बिना मिट्टी के, सिर्फ पोषक तत्वों वाले पानी में पौधे उगाने की तकनीक को हाइड्रोपॉनिक्स कहते हैं. इस तरीके से छतों या छोटे कमरों में भी विदेशी सब्जियां, जैसे लेट्यूस, चेरी टमाटर, उगाई जा सकती हैं. बड़े होटलों और फिटनेस पसंद लोगों में इसकी भारी डिमांड है, लेकिन सही जानकारी न होने के कारण इस बिजनेस में अभी कंपटीशन बहुत कम है.
साधारण पालक या धनिया के बजाय जब आप हाइड्रोपॉनिक्स से इटैलियन बेसिल, लेट्यूस, और चेरी टमाटर जैसी विदेशी सब्जियां उगाते हैं, तो ये बाजार में ₹200 से ₹400 प्रति किलो तक बिकती हैं. इन्हें सीधे बड़े होटलों, कैफे या प्रीमियम ग्रॉसरी स्टोर्स को सप्लाई करके 50% से ज्यादा का शुद्ध मुनाफा मिलता है.
मेडिकल क्षेत्र, जैसे नकली दांत या हड्डियां बनाना, से लेकर आर्किटेक्चरल मॉडल और कस्टमाइज्ड गिफ्ट्स तक में 3D प्रिंटिंग का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. यह एक एडवांस तकनीक है, इसलिए अभी स्थानीय स्तर पर इसके गिने-चुने स्टार्टअप्स ही मौजूद हैं. इस बिजनेस में मटीरियल की लागत बहुत कम होती है, पैसा आपकी स्किल्स और डिजाइन का होता है.
एक कस्टमाइज्ड गिफ्ट या आर्किटेक्चरल मॉडल बनाने में लागत अगर ₹200 आ रही है, तो वह बाजार में ₹1,500 से ₹2,000 में आसानी से बिक जाता है. मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रोटोटाइप के ऑर्डर्स मिलने पर यह कमाई लाखों में जा सकती है.
रोजाना टनों के हिसाब से निकलने वाला कचरा, खासकर इलेक्ट्रॉनिक कचरा एक बड़ी समस्या है. ई-वेस्ट को रीसायकल करके कीमती धातुएं निकालना या प्लास्टिक कचरे से नई चीजें बनाना एक बेहद मुनाफे वाला काम है. सरकार भी इसके लिए मदद दे रही है, फिर भी इस फील्ड में अभी बड़े प्लेयर्स की कमी है.
कबाड़ या ई-वेस्ट को बहुत ही सस्ते दामों पर (या कई बार मुफ्त में) कलेक्ट किया जाता है. इसके बाद कबाड़ से अलग की गई कीमती धातुएं, जैसे तांबा, एल्युमिनियम या रीसायकल किया गया प्लास्टिक दाना बड़ी फैक्ट्रियों को भारी मात्रा में और अच्छे दामों पर बेचा जाता है. यह पूरी तरह 'लो कॉस्ट-हाई रिटर्न' वाला काम है.
भारत में बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है और कई युवा काम के सिलसिले में विदेशों या दूसरे शहरों में रहते हैं. ऐसे में बुजुर्गों को डॉक्टर के पास ले जाने, उनके लिए दवाइयां प्रबंधित करने या बस उनका साथ देने के लिए पेशेवर एल्डर केयर एजेंसियों की सख्त जरूरत है. यह एक बहुत ही संवेदनशील और कम कंपटीशन वाला बिजनेस है.
आजकल लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल और मेडिकल असिस्टेंस के लिए प्रोफेशनल एजेंसियों को महीने के ₹15,000 से ₹30,000 प्रति बुजुर्ग तक देने को तैयार हैं. अगर आपकी एजेंसी के पास शुरुआती दौर में सिर्फ 5 से 10 परमानेंट क्लाइंट्स भी आ जाते हैं, तो आपकी बंधी-बंधाई मोटी इनकम शुरू हो जाती है.
ई-कॉमर्स और ऑनलाइन डिलीवरी के इस दौर में हर छोटे-बड़े ब्रांड को अपने सामान को पैक करने के लिए कस्टमाइज्ड डिब्बों, कागजी थैलों और टेप की जरूरत होती है. इस कस्टमाइज्ड पैकेजिंग की मांग बहुत ज्यादा है, लेकिन सप्लाई करने वाले वेंडर अभी बहुत कम हैं. चूंकि ई-कॉमर्स ब्रांड्स को हर महीने हजारों डिब्बों और लिफाफों की जरूरत होती है, इसलिए यह बल्क ऑर्डर वाला बिजनेस है. एक बॉक्स पर भले ही ₹2 से ₹5 का मुनाफा हो, लेकिन जब ऑर्डर 20,000 या 50,000 डिब्बों का आता है, तो एक ही क्लाइंट से तगड़ी कमाई हो जाती है.
आजकल के माता-पिता अपने बच्चों को शुरुआत से ही फ्यूचर-रेडी बनाना चाहते हैं. बच्चों को खेल-खेल में रोबोटिक्स, कोडिंग और एआई सिखाने वाले सेंटर्स की मांग तेजी से बढ़ रही है. स्कूल ट्यूशन के मुकाबले इस फील्ड में अभी बहुत ही सीमित विकल्प मौजूद हैं. अगर आप एक छोटे से सेंटर से भी शुरुआत करते हैं और प्रति बच्चा महीने की फीस ₹2,000 से ₹3,500 भी रखते हैं, तो सिर्फ 30-40 बच्चों के बैच से ही आप आराम से ₹1 लाख तक का रेवेन्यू जेनरेट कर सकते हैं. इसमें रोबोटिक्स किट्स वन-टाइम इन्वेस्टमेंट होती हैं, इसलिए बाद में सिर्फ प्रॉफिट ही प्रॉफिट है.