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आज हम आपको उस शख्स से मिलवाने जा रहे हैं जिन्होंने विप्रो की मोटी सैलरी वाली जॉब छोड़कर खेती में अपनी जमापूंजी लगा दी. उनके इस फैसले की वजह से उनके पिता ने 8 साल तक उनसे बात नहीं की, जानें Akshayakalpa के फाउंडर और सीईओ शशि कुमार की सक्सेस स्टोरी...
अक्सर लोग अपनी जिंदगी में कंफर्ट जोन का शिकार होकर रह जाते हैं. खासतौर से कॉरपोरेट सेक्टर में एक बार स्थिरता मिलने के बाद उससे बाहर निकलना कठिन हो जाता है. लेकिन जो लोग इस दायरे को तोड़कर अपने सपनों की राह चुनते हैं, उन्हें देर-सबेर सफलता जरूर मिलती है. ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी 'अक्षयकल्प ऑर्गेनिक' के फाउंडर और सीईओ शशि कुमार की है.
अगर अपनी सिक्योर्ड जॉब को छोड़ना, अपनी गाढ़ी कमाई को दांव पर लगाना और अपनों से दूरी बनाने की बात हो तो ज्यादातर लोग अपने कदम पीछे खींच लेंगे. लेकिन शशि कुमार ने यह रिस्क लिया. उन्होंने किसी टेक स्टार्टअप पर नहीं बल्कि एग्रीकल्चर सेक्टर पर दांव लगाया. उन्होंने बेंगलुरु यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद शिकागो के इलिनोइस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पोस्टग्रेजुएशन किया है.
इसके बाद आईटी सेक्टर में उनका शानदार करियर रहा. उन्होंने विप्रो जैसी दिग्गज कंपनी में सिस्टम इंजीनियर की भूमिका से लेकर सर्विस डिलीवरी प्लेटफॉर्म के लिए लीड आर्किटेक्ट के रूप में 12 साल बिताए. इसके बाद साल 2010 में उन्होंने कॉरपोरेट सेक्टर को अलविदा कहकर खेती-बाड़ी और डेयरी बिजनेस से जुड़ने का फैसला किया. इस फैसले ने उनके जीवन की कठिन परीक्षा भी ली. जिंदगीभर खेती करने वाले उनके पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा भी इसी काम में आए. इस बात से नाराज होकर उन्होंने आठ साल तक शशि से बातचीत बंद कर दी थी.
ऐसा भी नहीं था कि शशि के मन में खेती को लेकर दिलचस्पी नौकरी छोड़ने के बाद अचानक से जागी हो. इसकी नींव साल 1991 में कॉलेज के उन दिनों में ही पड़ गई थी, जब उन्होंने उडुपी के एक किसान चेरकडी रामचंद्र राव के दो एकड़ के फार्म का दौरा किया था. राव सिर्फ दो एकड़ जमीन पर नारियल, काली मिर्च, अनानास, सब्जियां, धान, बाजरा और आम जैसी विविध फसलें उगाकर खेती को एक फायदेमंद बिजनेस के रूप में चला रहे थे. इसने शशि कुमार को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या खेती में बढ़िया करियर बनाया जा सकता है. अपने इस आइडिया को हकीकत में बदलने के लिए उन्होंने साल 2010 में नौकरी छोड़ दी.
शुरुआत में उनका यह स्टार्टअप भारी वित्तीय संकटों से गुजरा. कंपनी 10 बार दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गई. ऐसे कठिन समय में उनकी पत्नी शिल्पा ने अपनी सेविंग से 30 लाख रुपये दिए. इसके अलावा उनके चाचा डॉ. मुनि रेड्डी ने 10 लाख रुपये लगाकर उनकी कंपनी को डूबने से बचाया.
अक्षयकल्प ने किसानों को नियमित आय देने के मकसद से सबसे पहले डेयरी बिजनेस शुरू किया. बाद में मधुमक्खी पालन, देशी मुर्गी पालन, केले की खेती और जैविक खाद उत्पादन जैसी चीजों में उन्होंने विस्तार किया जिससे किसानों की आय के कई सोर्स बन सकें. आज अक्षयकल्प ऑर्गेनिक 2,800 से ज्यादा गांवों में लगभग 1,200 महिला किसानों सहित कुल 2,800 से ज्यादा किसान परिवारों के साथ मिलकर काम कर रहा है.
पिछले वित्तीय वर्ष में इस मॉडल से जुड़े एक किसान परिवार की औसतन मासिक आय 1.28 लाख रुपये तक पहुंच गई है. उनकी कंपनी ने बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद में मजबूत पकड़ बना ली है और हाल ही में इसने मुंबई और पुणे जैसे प्रमुख शहरों में भी विस्तार किया है. आज अक्षयकल्प एक विशाल डेयरी और एग्री-एंटरप्राइज बन चुका है, जिसका लक्ष्य लगभग 600 करोड़ रुपये के रेवेन्यू को हासिल करना है.