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इस साल की शुरुआत में रिकॉर्ड स्तर छूने के बाद अब सोने के भाव में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे निवेशकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या सोना और सस्ता होगा?
आजकल सोने के भाव और इसकी चाल को लेकर बाजार में हर कोई अपने-अपने अंदाजे लगा रहा है. एक तरफ जहां ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ सोने की कीमतों पर दबाव साफ नजर आ रहा है. आमतौर पर जब भी दुनिया में कोई संकट या युद्ध जैसे हालात बनते हैं, लोग सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने में पैसा लगाना सही मानते हैं. लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग दिख रही है.
इस साल की शुरुआत में, यानी जनवरी में सोने ने ₹1.91 लाख प्रति 10 ग्राम का रिकॉर्ड स्तर छुआ था. लेकिन उस रिकॉर्ड के बाद से अब तक सोने के दाम में 25% से भी ज्यादा की गिरावट आ चुकी है. फिलहाल 24 कैरेट सोने की कीमत ₹1.41 लाख प्रति 10 ग्राम के आसपास बनी हुई है. बाजार के बड़े-बड़े जानकार भी इस समय सोने को लेकर बहुत ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आ रहे हैं, और कइयों का तो मानना है कि आने वाले दिनों में गिरावट और बढ़ सकती है. ऐसे में आम निवेशक उलझन में हैं कि सोने में रुकें या निकल जाएं.
कॉइनकोडेक्स जैसे कुछ तकनीकी संकेतकों का अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना इस साल के अंत तक गिरकर $2,780 तक जा सकता है, जो कि इसके उच्चतम स्तर से करीब 50% की गिरावट होगी. हालांकि, वॉल स्ट्रीट के बड़े ब्रोकरेज हाउस जैसे गोल्डमैन सैक्स और जेपी मॉर्गन इससे इत्तेफाक नहीं रखते.
उनका मानना है कि सोना $3,800 से $4,000 के आसपास अपना मजबूत सपोर्ट बनाए रखेगा और इसमें किसी क्रैश की संभावना कम ही है. अगर इतिहास पर नजर डालें, तो रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद सोने में 50% या उससे अधिक की गिरावट सिर्फ एक ही बार देखने को मिली है, हालांकि 20% से 30% तक की गिरावट कई बार दर्ज की गई है.
जनवरी 2026 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने ने $5,595 प्रति औंस का नया रिकॉर्ड बनाया था. लेकिन मिडिल ईस्ट के तनाव और अमेरिका में दोबारा ब्याज दरें बढ़ने की आशंका से यह ऊपरी स्तरों से करीब 30% गिरकर $4,000 के नीचे आ गया. तकनीकी विश्लेषकों का मानना है कि पिछले दो सालों में सोने में जो जबरदस्त उछाल आया था, वह थोड़ा ज्यादा ही तेज था और बाजार के नियम के मुताबिक अब यह अपने सही स्तर की तरफ लौट रहा है.
रही बात भारत की, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में 40% या 50% की गिरावट का पूरा असर भारतीय खरीदारों पर सीधे तौर पर नहीं दिखता. इसका सबसे बड़ा कारण डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का कमजोर होना और भारत में सोने पर लगने वाला इंपोर्ट टैक्स है. यही वजह है कि जब दुनिया में सोने का भाव आधा भी हो जाता है, तब भी भारतीय बाजार में यह गिरावट अक्सर 15% से 20% तक ही सिमट कर रह जाती है.
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