बिजनेस
आज हम आपको उस शख्स की कहानी बताएंगे जिन्होंने भारत में टीवी के लिए पिक्चर ट्यूब बनाने से शुरुआत की और आगे चलकर अपनी टेक्निकल एक्सपर्टीज को लड़ाकू विमानों की एवियोनिक्स और डिस्प्ले टेक्निक तक पहुंचाया...
आईआईटी में एडमिशन पाने के लिए हर साल लाखों स्टूडेंट्स जेईई का एग्जाम देते हैं. आईआईटी से पढ़े स्टूडेंट्स की बात होती है तो अक्सर टेक कंपनियां खड़ी करने वाले उद्यमियों, नई तकनीक विकसित करने वाले साइंटिस्ट और बड़े संस्थान बनाने वाले इंजीनियरों का जिक्र होता है. लेकिन आईआईटी के कुछ पूर्व छात्र ऐसे भी हैं जिन्होंने देश के औद्योगिक विकास में अहम योगदान दिया है. ऐसे ही एक शख्स हैं सतीश कुमार कौरा.
सतीश कुमार कौरा ने भारत में टीवी के लिए पिक्चर ट्यूब बनाने से शुरुआत की और आगे चलकर अपनी टेक्निकल एक्सपर्टीज को लड़ाकू विमानों की एवियोनिक्स और डिस्प्ले टेक्निक तक पहुंचाया. सतीश कुमार कौरा का जन्म 18 दिसंबर 1944 को हुआ था. वह किसी बिजनेस फैमिली से नहीं आते. उनके पिता ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में काम करते थे.
सतीश कौरा ने आईआईटी कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और साल 1966 में अपनी बीटेक की डिग्री हासिल कर ली. इसके बाद वह कनाडा चले गया. यहां उन्होंने कार्लटन यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रॉनिक्स में मास्टर्स की डिग्री हासिल की. पढ़ाई खत्म होने के बाद उन्होंने नॉर्थ अमेरिका में काम का एक्सपीरियंस लिया. उनके पास विदेश में करियर बनाने का शानदार मौका था लेकिन उन्होंने इसके बावजूद भारत लौटने का फैसला किया और यहां से उनके औद्योगिक सफर की शुरुआत हुई.
भारत लौटने के बाद उन्होंने साल 1973 में सैमटेल ग्रुप की नींव रखी. इसके एक साल के बाद 1974 में उन्होंने टेलेट्यूब इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड की स्थापना की. यह कंपनी टीवी में इस्तेमाल होने वाली पिक्चर ट्यूब बनाती थी. उस दौर में भारत को इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स और कंपोनेंट्स के लिए विदेश से आयात पर निर्भर रहना पड़ता था. ऐसे समय में देश में ही पिक्चर ट्यूब बनाना आसान नहीं था लेकिन सतीश कौरा ने इस चुनौती को अपने बिजनेस के लिए मौका बनाया.
धीरे-धीरे सैमटेल ने अपने कारोबार का विस्तार किया. साल 1981 में सेमटेल इंडिया लिमिटेड और साल 1986 में सैमटेल कलर लिमिटेड की स्थापना हुई. सैमटेल कलर ने पिक्चर ट्यूब के काम को आगे बढ़ाया और मित्सुबिशी इलेक्ट्रिक और सुमितोमो कॉरपोरेशन जैसी इंटरनेशनल कंपनियों के साथ पार्टनरशिप की.
धीरे-धीरे कैथोड रे ट्यूब तकनीक की जगह फ्लैट-पैनल डिस्प्ले लेने लगे. जिस तकनीक ने सैमटेल को खड़ा किया था, वह धीरे-धीरे पुरानी पड़ने लगी थी. अब सतीश कौरा के सामने दो रास्ते थे. पहला था कि वह अपने पुराने कारोबार के खत्म होने का इंतजार करें या दूसरा रास्ता अपनी डिस्प्ले टेक्निक की एक्सपर्टीज को नए क्षेत्र में इस्तेमाल करने का था. उन्होंने दूसरा रास्ता चुना.
सैमटेल ने धीरे-धीरे टेलीविजन से आगे बढ़कर प्रोफेशनल डिस्प्ले और एवियोनिक्स तकनीक की दिशा में कदम बढ़ाया. डीआरडीओ की मदद से कंपनी ने ऐसे डिस्प्ले विकसित करने की दिशा में काम किया, जो विमान के कठिन वातावरण में भी काम कर सकें. यही वह मोड़ था, जहां टेलीविजन की स्क्रीन बनाने का अनुभव धीरे-धीरे डिफेंस टेक्निक का हिस्सा बनने लगा.
उनकी कंपनी ने सुखोई-30 MKI, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस और इंटरमीडिएट जेट ट्रेनर जैसे भारत के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों के लिए स्वदेशी मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले बनाए. उनकी कहानी बताती है कि कोई भी तकनीक सिर्फ एक मार्केट तक सीमित नहीं होती. अगर सही समय पर बदलाव किया जाए तो वही विशेषज्ञता नई इंडस्ट्री की नींव बन सकती है. सतीश कुमार कौरा ने अपनी तकनीक का इस्तेमाल भारत में टेलीविजन की स्क्रीन बनाने से शुरू किया और फिर उनका सफर आगे चलकर लड़ाकू विमानों के कॉकपिट तक पहुंच गया.