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बॉन्ड टोकनाइजेशन क्या है और इसके सामने क्या चुनौतियां हैं? जानिए मुंबई में आयोजित Zee Business Summit 2026 में एक्सपर्ट्स ने डिजिटल बॉन्ड्स और RWA के भविष्य पर क्या कहा.
Zee Business Bond Tokenization Summit 2026: बॉन्ड टोकनाइजेशन यानी डिजिटल बॉन्ड बनाने की होड़ दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है. लेकिन इस सेक्टर के एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ बॉन्ड का डिजिटल टोकन बना देना ही सब कुछ नहीं है, असली सफर तो इसके बाद शुरू होता है.
बुधवार (9 सितंबर 2026) को मुंबई में जी बिजनेस बॉन्ड टोकनाइजेशन समिट 2026 का आयोजन किया गया. इस समिट में देश के बड़े-बड़े फाइनेंस, पॉलिसी और टेक्नोलॉजी लीडर्स एक साथ आए. समिट का मुख्य मकसद यह समझना था कि रियल-वर्ल्ड एसेट्स और डिजिटल बॉन्ड्स भारत के वित्तीय बाजार को कैसे बदल सकते हैं और आम निवेशकों के लिए पैसिव इनकम का रास्ता कैसे आसान बना सकते हैं.
समिट के एक अहम पैनल में इस बात पर चर्चा हुई कि इस नई तकनीक के लिए कड़े नियम और निवेशकों की सुरक्षा कितनी जरूरी है. STOEX के CEO सुदीप चटर्जी ने बताया कि सिक्योरिटी टोकन ऑफरिंग्स (STOs) की वजह से एसेट्स जारी करने का काम काफी आसान तो हुआ है, लेकिन इसे संभालने के लिए अभी और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है.
चटर्जी ने कहा कि सिर्फ टोकन मिंट यानी जनरेट कर देना काफी नहीं है. असली चुनौती तो इसके बाद आने वाली कानूनी, तकनीकी और ऑपरेशन्स से जुड़ी दिक्कतों को सुलझाने की है. उन्होंने जोर देकर कहा कि इस पूरे सिस्टम को मौजूदा कैपिटल मार्केट के नियमों का समर्थन मिलना बेहद जरूरी है.
सुदीप चटर्जी ने सिंगापुर का उदाहरण देते हुए समझाया कि तकनीक का तैयार होना और बाजार का उसके लिए तैयार होना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं. सिंगापुर को डिजिटल फाइनेंस की दुनिया का सबसे बड़ा टेस्टिंग ग्राउंड माना जाता है. सिंगापुर की रेगुलेटरी अथॉरिटी के प्रोजेक्ट गार्जियन के तहत वित्तीय संस्थानों ने करीब 15 अलग-अलग प्रयोग किए.
इन ट्रायल्स से यह तो साबित हो गया कि डिजिटल लेजर पर टोकनाइज्ड बॉन्ड आसानी से जारी किए जा सकते हैं. लेकिन इसने यह भी साफ कर दिया कि अभी इनके लिए एक व्यवस्थित सेकेंडरी मार्केट गायब है.
सुदीप चटर्जी के मुताबिक, इस सिस्टम को आगे बढ़ाने के लिए दो बड़े जोखिमों से निपटना होगा- साइबर सुरक्षा और कानूनी मान्यता. एसेट ओनरशिप का यह बिल्कुल नया तरीका है. डिजिटल बॉन्ड को कानूनी तौर पर वही दर्जा मिलना चाहिए जो पुराने कागजी दस्तावेजों को कोर्ट में मिलता है. ब्लॉकचेन और स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स में नए तरह के साइबर हमलों का खतरा रहता है. इसके लिए बेहद मजबूत सिक्योरिटी सिस्टम की जरूरत है.
उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी से जुड़ी ये खामियां और खतरे फाइनेंस की दुनिया के विकास का एक स्वाभाविक हिस्सा हैं. बीते 30 सालों में जब भी बैंकिंग सेक्टर में डिजिटलाइजेशन हुआ है, तब-तब आईटी और तकनीकी चुनौतियां सामने आई हैं. टोकनाइजेशन भी इससे अलग नहीं है. जब तक हम कानून और साइबर सुरक्षा को मजबूत नहीं करेंगे, तब तक डिजिटल बॉन्ड आम निवेशकों तक नहीं पहुंच पाएंगे.
चटर्जी के मुताबिक, कानूनी मालिकाना हक और इस नई तकनीक का सही मेल बनाकर ही इंडस्ट्री साइबर सुरक्षा और ढांचे से जुड़ी इन चुनौतियों को समय रहते हल कर सकती है और डिजिटल बॉन्ड्स को आम लोगों तक पहुंचाने से पहले यह कदम उठाना बेहद जरूरी है.
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