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कभी इसरो में साइंटिस्ट के तौर पर काम करते थे, फिर कैसे अपनी प्राइवेट स्पेस कंपनी बनाकर रच दिया इतिहास, जानें स्काईरूट एयरोस्पेस के को-फाउंडर और COO नागा भरत डाका की प्रेरणादायक कहानी...
भारत विक्रम-1 की सफलता का जश्न मना रहा है. इस मिशन से देश के प्राइवेट स्पेस सेक्टर ने एक नया इतिहास रच दिया है. इस सफलता के पीछे स्काईरूट एयरोस्पेस के दो को-फाउंडर हैं. दोनों कभी इसरो में साइंटिस्ट के तौर पर काम करते थे. फिर सरकारी जॉब छोड़कर उन्होंने भारत के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल लॉन्च कंपनी बनाने का सपना देखा और अब उसे हकीकत में बदल चुके हैं. पवन कुमार चंदना की सफलता की कहानी हम आपको पहले ही बता चुके हैं और अब पढ़िए स्काईरूट एयरोस्पेस के को-फाउंडर और COO नागा भरत डाका की प्रेरणादायक कहानी.
नागा भरत डाका बचपन से ही पढ़ाई में बेहद मेधावी थे. उन्होंने विशाखापत्तनम के लिटिल एंजेल्स हाईस्कूल से 10वीं की परीक्षा 87% मार्क्स के साथ पास की. इसके बाद उन्होंने हैदराबाद के नारायणा जूनियर स्कूल से 12वीं की पढ़ाई की और उसमें भी 96% नंबर लाए. अपनी शानदार पढ़ाई के दम पर उन्हें आईआईटी मद्रास में दाखिला मिला. यहां उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक और माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स और VLSI डिजाइन में एमटेक की ड्यूल डिग्री पूरी की.
पढ़ाई पूरी करने के बाद नागा भरत ने ISRO के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में साइंटिस्ट के तौर पर काम किया. यहां उन्होंने लॉन्च व्हीकल के ऑनबोर्ड कंप्यूटर, एवियोनिक्स, गाइडेंस, नेविगेशन और कंट्रोल सिस्टम से जुड़े हार्डवेयर और फर्मवेयर के विकास में बड़ी भूमिका निभाई. रॉकेट के उड़ान के दौरान दिशा, गति और नियंत्रण को संभालने वाली तकनीकों पर काम करने का यह अनुभव आगे चलकर उनके स्टार्टअप की सबसे बड़ी ताकत बना. बाद में उन्होंने अमेरिकी सेमीकंडक्टर कंपनी Xilinx में भी काम किया. यहां एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स एंड स्केलेबल इंजीनियरिंग में उनकी विशेषज्ञता और मजबूत हुई.
ISRO में नौकरी के दौरान भरत डाका की मुलाकात पवन कुमार चंदना से हुई. दोनों न सिर्फ साथ काम करते थे बल्कि जल्द ही अच्छे दोस्त और फ्लैटमेट भी बन गए. दोनों अक्सर इस बारें में बात करते थे कि भारत में बेस्ट साइंटिस्ट और इंजीनियर तो हैं, लेकिन यहां प्राइवेट सेक्टर में रॉकेट लॉन्च करने वाली कंपनियां न के बराबर हैं. एलन मस्क की स्पेसएक्स की सफलता देखकर उन्होंने तय किया कि क्यों न भारत में भी ऐसी कंपनी बनाई जाए तो ग्लोबल लेवल पर अपनी पहचान बना सके.
यही सोच साल 2018 में स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की वजह बना. उस समय भारत में प्राइवेट स्पेस सेक्टर अपने शुरुआती दौर में था और स्टार्टअप के लिए फंडिंग जुटाना भी आसान नहीं था. इन सब चुनौतियों से हार न मानते हुए उन्होंने स्वदेशी तकनीक के दम पर लॉन्च व्हीकल विकसित करने का काम शुरू किया. बाद में भारत सरकार के स्पेस सेक्टर में सुधार, IN-SPACe जैसी संस्थाओं की स्थापना और प्राइवेट कंपनियों के लिए बढ़ते मौकों ने स्काईरूट की रफ्तार को और तेज कर दिया.
स्काईरूट एयरोस्पेस ने बहुत कम समय में बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं. साल 2020 में स्काईरूट ने भारत के पहले प्राइवेट रॉकेट इंजन का सफल स्टैटिक फायर टेस्ट किया. इसके बाद 2021 में कंपनी ने देश के पहले निजी तौर पर विकसित क्रायोजेनिक इंजन 'धवन-1' की टेस्टिंग की. इन सफलताओं ने यह साबित कर दिया कि स्काईरूट सिर्फ एक स्टार्टअप नहीं, बल्कि एडवांस्ड स्पेस टेक्निक विकसित करने वाली भारतीय कंपनी बन चुकी है.
18 नवंबर 2022 को स्काईरूट ने 'मिशन प्रारंभ' के तहत विक्रम-एसरॉकेट का सफलतापूर्व लॉन्चिंग की. इसके बाद कंपनी ने ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल विक्रम-1 पर काम तेज किया. 18 जुलाई 2026 को 'मिशन आगमन' के तहत विक्रम-1 ने सफलतापूर्वक अपने पेलोड को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया.
आज नागा भरत डाका स्काईरूट एयरोस्पेस में को-फाउंडर और चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर के रूप में कंपनी के संचालन, एवियोनिक्स, मिशन ऑपरेशंस, गाइडेंस, नेविगेशन और कंट्रोल सिस्टम के विकास की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. उनकी कहानी सिखाती है कि मजबूत शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और बड़ा सपना देखने का साहस कैसे मिलकर इतिहास रच सकता है. ISRO साइंटिस्ट से सफल उद्यमी बनने तक का उनका सफर आज देश के हजारों युवा इंजीनियरों और स्टार्टअप फाउंडर्स के लिए प्रेरणा बन चुका है.