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RBI यह देखता है कि बाज़ार में इतना पैसा रहे कि उद्योग, व्यापार और उपभोक्ता अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें, लेकिन चलन में पैसा इतना भी न हो जाए कि महंगाई बेकाबू हो जाए.
नई मौद्रिक नीति आनेवाली है. 3 से 5 जून तक मॉनेटरी पॉलिसी यानी मौद्रिक नीति कमेटी की बैठक है. छह सदस्यों वाली इस कमेटी की बैठक में तय होगा कि आपके मकानों पर लोन की EMI घटेगी या बढ़ेगी या यथावत रहेगी. आपके एफडी पर मिलनेवाले ब्याज की दर के कम ज्यादा होने का फैसला भी होगा. यह मौद्रिक नीति RBI का टूलकिट है. यही टूलकिट इस्तेमाल करके RBI देश की इकॉनमी और पैसों के बहाव को कंट्रोल करता है. इस बार दुर्भाग्य से ऐसा है कि कई चीज़ें भारत सरकार के नियंत्रण में है ही नहीं. वैश्विक दबाव चरम पर हैं. मौसम विभाग का अनुमान भी औसत से कम बरसात का है. इमर्जिंग एकॉनमी के चैलेंजेस तो हैं ही. ऐसा लगता है कि शायद इस बार टूलकिट का इस्तेमाल होने के बाद भी नतीजे अपेक्षा के अनुरूप न रहे.
इस टूल किट के दो प्रमुख औजार हैं : रेपो रेट यानी रिपर्चेस ऑप्शन रेट और ओएमओ यानी ओपन मार्केट ऑपरेशंस. रेपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को शार्ट टर्म लोन देता है. वाणिज्यिक बैंक RBI से पैसे उधार लेते हैं और इसके बदले सरकारी प्रतिभूतियाँ गिरवी रखते हैं. तय समय पर बैंक पैसे लौटाते हैं और ब्याज चुकाते हैं. यह मौद्रिक नीति का मुख्य हथियार है. अगर आपका होम लोन है और रेपो रेट घटता है, तो बैंक आपका ब्याज दर कम कर सकते हैं जिससे EMI घट जाती है.
अगर RBI रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट घटा दे तो ब्याज भी काम हो जायेगा. आजकल होम लोन 'EBLR' (एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट) से जुड़े होते हैं. यानी अगर RBI 25 बेसिस पॉइंट (0.25%) घटाएगा, तो बैंक को भी पूरा 0.25% ही घटाना होगा. अगर किसी ने 50 लाख रुपये का फ्लोटिंग रेट वाला होम लोन 20 साल के लिए ले रखा हो तो उसकी लगभग 750-800 रुपये की EMI घट जाएगी. अगर बेसिस पॉइंट्स बढ़ा दिए जाएं तो इसका उल्टा भी हो सकता है. नया लोन ले रहे हो तो रेपो रेट कम होने पर बेहतर डील मिल सकती है.
अभी RBI का रेपो रेट सवा पांच प्रतिशत है. उम्मीद की जा रही है कि कमिटी इसे नहीं छेड़ेगी, क्योंकि अगर इसे घटाती है तो भी मुश्किल और नहीं घटाती तो भी दुश्वारियां. RBI का सबसे मुख्य काम है मुद्रा स्फीति को काबू में रखना और साथ ही देश की आर्थिक वृद्धि को भी नहीं रुकने देना. कानूनन RBI को जिम्मेदारी दी गई है कि वह खुदरा महंगाई दर को 4% के स्तर पर रखे, जिसमें परिस्थितियों के अनुसार 2% ऊपर या 2% नीचे जाने की छूट होती है. यानी महंगाई की दर हर हाल में 2% से 6% के बीच बनी रहनी चाहिए. अगर महंगाई बहुत बढ़ने लगती है, तो RBI ब्याज दरें बढ़ा देता है ताकि लोग कम लोन लें, बाजार में पैसों का फ्लो कम हो, मांग घटे और कीमतें नीचे आएं. इसके विपरीत, अगर अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ रही हो, तो RBI दरें घटा देता है ताकि लोग आसानी से लोन लेकर घर, कार खरीदें और कंपनियां नए फैक्ट्रियां लगाएं.
RBI यह देखता है कि बाज़ार में इतना पैसा रहे कि उद्योग, व्यापार और उपभोक्ता अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें, लेकिन चलन में पैसा इतना भी न हो जाए कि महंगाई बेकाबू हो जाए.
यदि अर्थव्यवस्था एक कार है, तो सरकार उसका चालक है और मौद्रिक नीति उस कार का एक्सीलेटर तथा ब्रेक दोनों है. जब अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ने लगे तो RBI एक्सीलेटर दबाता है, यानी ब्याज दरें घटाकर कर्ज़ सस्ता करता है. जब महँगाई तेज़ हो जाए तो वह ब्रेक लगाता है, यानी ब्याज दरें बढ़ाकर खर्च और उधारी कम करने की कोशिश करता है. RBI को अक्सर दो विरोधी लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है.
आपको मौद्रिक नीति शायद एक तकनीकी विषय लगे, लेकिन इसका असर रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ता है. घर खरीदने का फैसला हो, बच्चों की शिक्षा के लिए ऋण लेना हो, कारोबार शुरू करना हो या बैंक में बचत जमा करनी हो, हर जगह RBI की मौद्रिक नीति की छाप दिखाई देती है. इस बार चुनौतियां ज्यादा हैं तो नए नए टूल्स भी खोजे जा रहे हैं. बेचिंत रहिये.