बिहार चुनाव 2025
बिहार चुनाव से कुछ दिन पूर्व राज्य की 1.3 करोड़ से ज्यादा महिलाओं के खातों में 10,000 रुपये ट्रांसफर किए गए, जिससे नीतीश कुमार सरकार का 'महिला' मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित करने का संकेत मिलता है।
बिहार चुनावों पर गौर करें और शुरुआती रुझानों को देखें तो, 'एम' फ़ैक्टर ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को निर्णायक जीत दिलाई है. आगे कुछ बात हो उससे पहले ये बता देना जरूरी है कि यहां 'एम' का तात्पर्य महिला है, जोकि एक ऐसा वर्ग जिसे नीतीश कुमार दो दशकों से संजो रहे हैं.
बता दें कि मतदान से पहले 1.3 करोड़ से ज़्यादा महिलाओं के खातों में 10,000 रुपये की राशि हस्तांतरित होने से मतदाताओं में उत्साह का संचार हुआ था. इसका फायदा यह हुआ कि महिलाओं और पुरुषों के बीच मतदान प्रतिशत में नौ प्रतिशत से ज़्यादा का अंतर आया.
बहरहाल अब जबकि नतीजे लगभग आ ही चुके हैं. कहना गलत नहीं है कि एक बार फिर, सत्तारूढ़ गठबंधन की जीत की भविष्यवाणी करने वाले एग्ज़िट पोल सही साबित हुए हैं.
बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में कहा जा रहा है कि एक मज़बूत सत्ता समर्थक लहर ने एनडीए की बढ़त को गति दी है. व्यापक जनादेश की संभावना से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार को बड़ा बढ़ावा मिला है.जहां नीतीश कुमार ने बिहार में महिलाओं को सशक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित किया है, वहीं मोदी ने राष्ट्रीय स्तर पर भी इसी तरह के कदम उठाए हैं.
महाराष्ट्र, हरियाणा और मध्य प्रदेश में महिलाएं भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण मतदाता रही हैं, जहां नकद हस्तांतरण एक प्रमुख वादा था. जदयू द्वारा 2020 के चुनावों में लगभग 30 सीटें जोड़ने के साथ, नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री के रूप में वापसी सुनिश्चित लग रही है. महिला मतदाताओं के समर्थन से इस पद के लिए उनका दावा मज़बूत हुआ है.
नीतीश कुमार ने कई योजनाओं के माध्यम से महिला सशक्तिकरण पर काम किया है. लड़कियों को स्कूल में उपस्थिति बढ़ाने के लिए साइकिलें प्रदान की गईं, और शराब से होने वाले नुकसान को कम करने के उद्देश्य से शराबबंदी नीति को इसकी प्रभावशीलता पर लगातार सवालों के बावजूद महिलाओं का समर्थन प्राप्त हुआ.
एक अन्य महत्वपूर्ण पहल जीविका दीदी कार्यक्रम रही है. इसकी लोकप्रियता को देखते हुए, महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने श्रमिकों को स्थायी दर्जा और 30,000 रुपये मासिक भुगतान का वादा किया.
शुरुआती नतीजे बताते हैं कि महिला मतदाताओं ने उस नेता का समर्थन किया है जिसे वे अपना सबसे विश्वसनीय समर्थक मानती हैं. तेजस्वी का मुख्य मुद्दा सरकारी नौकरियों का था. लेकिन जैसा कि रुझान बता रहे हैं, युवा भी सत्तारूढ़ एनडीए के पक्ष में हैं क्योंकि उनकी सीटें 70 से ज़्यादा बढ़ गई हैं.
आने वाले दिनों में, यह 'एम' फ़ैक्टर राजनीतिक दलों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित कर सकता है.
विश्लेषकों का कहना है कि बिहार में महिलाओं के नेतृत्व में निर्णय लेने की प्रक्रिया अन्य हिंदी भाषी राज्यों की तुलना में ज़्यादा स्वतंत्र दिखाई देती है, जहां मतदाता पारंपरिक पारिवारिक या सामुदायिक दबावों के बजाय अपने हितों को प्राथमिकता देते हैं.