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बिहार में NDA का चमत्कार... इन फैक्टर्स के जरिये स्टार बने Nitish Kumar! 

महिलाओं और ईबीसी परिवारों पर लक्षित अनेक कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ तमाम मुद्दे ऐसे थे जिनपर नीतीश कुमार द्वारा काम किया गया और उनका सीधा फायदा एनडीए को बिहार में हासिल हुआ.

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बिहार में NDA का चमत्कार... इन फैक्टर्स के जरिये स्टार बने Nitish Kumar! 
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नतीजों के बाद बिहार में तमाम तरह के कयासों पर विराम लग गया है. बिहार की जनता ने जैसा जनादेश दिया सिद्ध हो गया कि चाहे वो सामाजिक गठबंधन हो या फिर चुनाव प्रबंधन और सुस्पष्ट नेतृत्व विकल्प यदि इन पर बारीकी से काम किया जाए तो परिणाम सोच और कल्पना के विपरीत हो सकते हैं.

बिहार में एनडीए का उत्कृष्ट प्रदर्शन के पीछे कोई एक वजह नहीं थी.  बिहार में एनडीए को जो प्रचंड जीत मिली, यदि उसे देखा जाए और उसका अवलोकन किया जाए तो मिलता है कि तमाम फैक्टर्स थे जिनकी बदौलत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन इतिहास रचने में कामयाब हुआ. 

तो अब देर किस बात की. आइये उन कारकों पर चर्चा की जाए, जो यदि न होते तो आज न तो एनडीए का जिक्र हो रहा होता. और न ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम पर चर्चा.

मज़बूत जातीय गठबंधन बना बड़ा हथियार 

एनडीए एक व्यापक और मज़बूत जातीय गठबंधन बनाने में कामयाब रहा. पारंपरिक अगड़ी जातियां गठबंधन के साथ मज़बूती से खड़ी रहीं, जबकि ओबीसी, ईबीसी और दलितों का एक बड़ा वर्ग इसके पीछे एकजुट हो गया. इस इंद्रधनुषी गठबंधन ने विपक्ष के किसी भी जातीय गणित को बेअसर कर दिया, जिस पर वह भरोसा कर रहा था.

बेहतर चुनाव प्रबंधन पर ढंग से काम 

2020 के चुनाव में सामने आई कमियों से सीखे गए सबक ने एनडीए को इस बार अपनी चुनावी मशीनरी को नए सिरे से गढ़ने में मदद की. पूरे अभियान के दौरान सहयोगियों के बीच समन्वय, तीक्ष्ण संदेश और बूथ-स्तरीय अधिक कुशल प्रबंधन स्पष्ट दिखाई दिया.

भारतीय जनता पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), लोक जनशक्ति पार्टी, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर तालमेल ने भी एक सहज और अधिक एकजुट पहुंच बनाने में योगदान दिया.

'जंगल राज' भी था एक बड़ा मुद्दा 

बिहार के मतदाताओं के एक बड़े हिस्से के दिलों में 'जंगल राज' के दौर की यादें आज भी गहरी हैं. राजनीतिक बदलावों और आलोचनाओं के बावजूद, नीतीश कुमार को एक उदारवादी नेता के रूप में देखा जाता है. 

नीतीश राज्य के राजनीतिक पटल पर एक स्थिर और ज़्यादा स्वीकार्य चेहरा हैं. इस धारणा ने एनडीए को खुद को एक सुरक्षित और ज़्यादा विश्वसनीय विकल्प के रूप में पेश करने में मदद की.

बिहार में एनडीए की जीत कोई रातोंरात नहीं हुई. यह जीत महिलाओं के नेतृत्व में मतदान, जातिगत एकजुटता, बेहतर प्रबंधन, बिखरा हुआ विपक्ष और एक ऐसे नेतृत्व पर आधारित थी जो अनिश्चितता के बजाय निरंतरता चाहने वाले मतदाताओं के दिलों में बस गया.

यह जनादेश सामाजिक बदलावों और बिहार की राजनीतिक यादों के स्थायी महत्व, दोनों को दर्शाता है.

महिलाओं ने जताया एनडीए और नीतीश पर भरोसा 

2025 के बिहार विधनसभा चुनावों पर नजर डालें तो इस बार के चुनाव की सबसे बड़ी खासियतों में से एक महिला मतदाताओं का असाधारण मतदान था.बिहार में कम से कम सात ज़िलों में, महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में 14 प्रतिशत या उससे अधिक अंकों से अधिक मतदान किया, जो एनडीए के पक्ष में था.

लिंग-भेद किशनगंज (19.5 प्रतिशत) में सबसे ज़्यादा रहा, उसके बाद मधुबनी (18.4 प्रतिशत), गोपालगंज (17.72 प्रतिशत), अररिया (14.43 प्रतिशत), दरभंगा (14.41 प्रतिशत) और मधेपुरा (14.24 प्रतिशत) का स्थान रहा.

सीवान, पूर्णिया, शिवहर, सीतामढ़ी, सहरसा, पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, खगड़िया, समस्तीपुर और बांका जैसे कई अन्य ज़िलों में भी महिलाओं ने पुरुषों से 10 अंकों से ज़्यादा की बढ़त हासिल की.

महिलाओं को लक्षित करने वाली अनेक कल्याणकारी योजनाएं, चाहे वो 10,000 रुपये नकद जमा से लेकर जीविका दीदी तक कुछ भी रही हों. इनसे एनडीए को बड़ा फायदा मिला और इनका नतीजा क्या निकला चुनाव परिणामों के रूप में हमारे सामने है.

विपक्ष का बंटा हुआ लगना... 

एनडीए ने जहां एक ओर समन्वित प्रदर्शन किया, वहीं महागठबंधन बिखरा हुआ दिखाई दिया. कई निर्वाचन क्षेत्रों में, गठबंधन को दोस्ताना मुकाबलों और वोट हस्तांतरण में स्पष्टता की कमी का सामना करना पड़ा. एकीकृत रणनीति के अभाव ने विपक्ष की चुनौती को स्पष्ट रूप से कमज़ोर बना दिया, जिससे एनडीए को स्वाभाविक बढ़त मिल गई.

M-Y बेस को मज़बूत करने में महागठबंधन हुआ नाकाम 

पारंपरिक मुस्लिम-यादव वोट बैंक महागठबंधन की अपेक्षा के अनुसार मज़बूत नहीं हुआ. सीमांचल क्षेत्र में, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का प्रदर्शन स्पष्ट रूप से मुस्लिम वोटों में विभाजन का संकेत देता है, जिससे महागठबंधन की संभावनाएं  उसके मज़बूत क्षेत्रों में भी कमज़ोर हो गई हैं.

यादव वोटों में भी विविधता के संकेत दिखाई दिए, जिसमें एक वर्ग राष्ट्रीय जनता दल के मूल आधार से दूर चला गया.

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