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ISRO में बिताए दिन – वह ईमानदारी मज़े की थी

वैज्ञानिकों की ज़िंदगी के आस-पास आज बहुत ग्लैमर पसरा हुआ है. क्या सब दिन इतना ही ग्लैमर था या कैसी थी विक्रम साराभाई के मूल्यों से सींची वह ज़िंदगी?

ISRO में बिताए दिन – वह ईमानदारी मज़े की थी
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पिता एक बात बार-बार कहा करते थे, "ईमानदार वह होता है, जिसे मौका नहीं मिलता." यह उन दिनों की बात है जब सरकारी नौकर होने का मतलब मलाई खाना ही था, नमक का दरोगा तो पढ़ी होगी ना? उन दिनों लड़की वाले पूछा करते थे कि ऊपर की कितनी कमाई हो जाती है? और लोग शान से बताया भी करते थे, ओवरसियर तक के परिवार ठाठ से सरकारी गाड़ी का उपयोग किया करते थे.

उत्तर भारत में यह स्थिति ज्यादा बदली नहीं, अभी कल की घटना में यू पी  एक आई पी एस के तहखाने में करोड़ो के नोट मिले हैं. खैर जब तक मेरी शादी ईसरो (ISRO) के वैज्ञानिक से नहीं हुई थी, मुझे मालूम नहीं था कि ईमानदारी का मतलब गरीबी और समाज का उपहास होता है. यह 1975 का समय था. IIT Kanpur के 10 pointer को जब बस के डन्डे पकड़ कर दफ्तर जाकर 10-20 घन्टे काम करते देखती तो मुझे बुरा नहीं लगता, क्योंकि सभी वैज्ञानिक एक सी स्थिति में थे. दूसरा युवाकालीन साम्यवादी आदर्शवादिता भी सन्तुष्ट होती थी लेकिन जैसे ही मैं किसी शादी विवाह या पारिवारिक  समारोह में उत्तर भारत पहुंचती, हमारी गरीबी का जिस तरह से मखौल बनाया जाता था कि मन क्षुब्ध हो जाया करता था.

इसरो साराभाई की कल्पना थी

उन दिनों इसरो साराभाई की कल्पना थी, केवल उन्नति के रास्ते खोजती. यह कुछ करने की इच्छा करने वाले लोअर मिडिल क्लास पृष्ठभूमि से आने वाले वैज्ञानिकों की कर्म भूमि थी.

एक बात बताऊं, हममे से शायद कोई ही दुखी दिखता था, सब ठहाके मारते, खाली चाय या मट्ठी पर मिक्सचर के साथ शाम बिताते. किसी को किसी तरह की चिन्ता नहीं थी क्योंकि इसरो ने बड़े अच्छे डॉक्टरों की क्लीनिक चला रखी थी. हालांकि प्राइवेट ईलाज की ज्यादा सुविधा नहीं थी पर ये डाक्टर वास्तव में अद्भुत थे और हमारे दोस्त भी थे.

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हमारे शौक बहुत नन्हे -नन्हे होते थे. साथ त्यौहार मनाना, एक दूसरे के घर जाना और किसी ठहाकेदार उस्ताद के साथ ठहाके लगाना.

हम आराम से खटर -खटर कर सेकंड क्लास में घर चले जाते. कोई दुराव छिपाव नहीं. एक बीमार होता, पचास सेवा के लिए पहुंच जाते. किसी की बीवी मायके जाती, वह दोस्तों के घर रोटियां खाता यानी दाल में पानी डालने की नौबत नहीं थी. चार लोगों को खिलाने की ताकत थी. हर त्यौहार में हर मिठाई घर में बनती थी क्योंकि तब केरल में कुछ भी उत्तर भारतीय नहीं मिलता था.

यदि साराभाई ने मजबूत नींव न डाली होती

वही बात, यदि साराभाई ने मजबूत नींव न डाली होती तो हम उस फकीरी में खुश नहीं रहते. आज भी हमारे बच्चे अपने बचपनों को याद कर के खुश होते हैं.

आज इसरो में वह फकीरी नहीं है लेकिन किसकी नींव पर? सरकारी नौकरियों के भ्रष्टाचार के दिनों में साराभाई ये चमत्कार कैसे कर पाए? कहा जाता है कि उन्होंने इन्दिरा गान्धी को भी इसरो के मसलों में बात करने के लिए मना कर दिया था. उन दिनों इसरो खुद खड़ा होने की कोशिश में था, लगातार मेहनत कर रहा था. अब तो इसरो बस एक इकाई है,काम तो प्राइवेट शाखाओं के पास चला गया.

आज धन है, पैसा है, ईमानदारी तो होनी चाहिये लेकिन मुफलिसी नहीं होगी.

ईमानदारी की कमाई खुल के ठहाके लगाने का अवसर देती है, यह बात सिर्फ हम जानते है. कई बार सरकारी नौकरी में क्या होता था, हम बहुत करीब से जानते हैं. जब पार्सल क्लब रिश्तेदार अपनी नोटबुक में दस पांच के नोट लिए घर में घुसते और सबको दिखाते या जब रिश्ते का ओवरसियर देवर शान से कहता, “मैं तो बस तन्खाह लेने एक तारीख को दफ्तर जाता हूं” तो मन में हंसने की इच्छा होती. हम ईश्वर को धन्यवाद देते कि “हमें यह मौका नहीं मिला.”

 

रति सक्सेना प्रसिद्ध कवि हैं. निवास केरल में है. भिन्न मुद्दों पर अपनी राय दर्ज करती रहती हैं.

(यहां प्रकाशित विचार लेखक के नितांत निजी विचार हैं. यह आवश्यक नहीं कि डीएनए हिन्दी इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे और आपत्ति के लिए केवल लेखक ज़िम्मेदार है.)

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