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दुनिया को बुरा कहने से पहले एक बार आईने में देखना…

ज़रूरी नहीं कि जो सम्वेदनशीलता और अपनापे का व्यवहार कर रहा हो वह ठीक वैसा हो ही. हो सकता है ऐसा दिखना उसकी मजबूरी हो...

दुनिया को बुरा कहने से पहले एक बार आईने में देखना…
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  • ममता सिंह 

औरों द्वारा चाहे और सराहे जाने की मानव इच्छा इतनी स्वाभाविक और बलवती होती है कि इंसान असल में जैसा होना चाहिए पर वह होता नहीं, किन्तु वैसा दिखने की कोशिशों में हलकान रहता है. दौलत तो बड़ी चीज़ है ही पर वह महज़ शोहरत के लिए भी क्रूरता और मूर्खता की हद तक जा सकता है. होंठों पर झूठी मुस्कान सजाए,चेहरे पर सौम्यता का लेप लपेटे वह भीतर-भीतर कितना चालाक और निरंकुश होता है,यह उसके बहुत क़रीबी ही जान सकते हैं.

जो बहुत कोमल हृदय दिखे ज़रूरी नहीं कि वह सचमुच कोमल हृदयी हो

जो बहुत कोमल हृदय दिखे ज़रूरी नहीं कि वह सचमुच कोमल हृदयी हो ही. हो सकता है यह बूढ़े बाघ का कंगन दिखाकर शिकार करने की नृशंस कुचेष्टा मात्र हो...

ज़रूरी नहीं कि जो सम्वेदनशीलता और अपनापे का व्यवहार कर रहा हो वह ठीक वैसा हो ही. हो सकता है ऐसा दिखना उसकी मजबूरी हो ताकि वह रिश्तों,पहचानों,पदों के अनुसार अपनी दृष्टि और व्यवहार बदलकर उनका अधिकतम उपभोग कर सके...

mamta singh

हम सब बाज़ार के लिए उत्पाद भी हैं और उपभोक्ता भी

आज विज्ञापनों के दौर में हर सांस,हर कृत्य,हर मुस्कान यहां तक कि आंसू भी विज्ञापन की विषयवस्तु हैं...एक साधारण उदाहरण टीवी के रियलिटी शोज हैं,जहां हम इन भावनाओं को भुनाने की अश्लील कारोबार को बड़े शौक़ से देखते हैं. कोई ग़रीबी को भुना रहा है,कोई छोटे शहर के होने को तो कोई उम्र या शारीरिक व्याधि को ही भुनाकर वोट मांग रहा है. जबसे अभिनेताओं ने नेताओं और नेताओं ने अभिनेताओं का चोला पहन लिया कृत्रिम भावनाओं का बाज़ार उफान पर है.हम सब बाज़ार के लिए उत्पाद भी हैं और उपभोक्ता भी. यह बाज़ार नियंत्रित करेगा कि हम कब अपनी भावनाओं को बेचेंगे या खरीदेंगे.

कभी-कभी सोचती हूं  कि जब सोशल मीडिया नहीं था तब इंसान अपनी भावनाओं, अपनी ख़ुशी, अपने ग़म,अपने जुड़ने या टूटने को कैसे व्यक्त करता था? क्या हम बिना दूसरों की नज़र में आये, बिना उनसे प्रशंसा पाये चुपचाप कोई भी भावना या कार्य नहीं कर सकते या जी सकते? जाने कितनी बार ख़ुद मैंने भी अपनी भावनाओं को दूसरों की सम्मति,प्रशंसा याकि स्वीकार्यता हेतु इस्तेमाल किया पर यह लत न बन जाये इसकी निरन्तर कोशिश करती रहती हूं ...

टटकी भावनाएं और सच्चे कोमल हृदय विक्टिम कार्ड नहीं खेलते जानां. दुनिया को बुरा कहने से पहले एक हाथ में आरसी रखना,शायद इससे तुम्हें दुनिया को समझने में मदद मिले.

 

(ममता सिंह शिक्षिका हैं. पढ़ने-लिखने से विशेष सरोकार है. सामाजिक मुद्दों पर प्रखर विचार रखती हैं.)

(यहां दिये गये विचार लेखक के नितांत निजी विचार हैं. यह आवश्यक नहीं कि डीएनए हिन्दी इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे और आपत्ति के लिए केवल लेखक ज़िम्मेदार है.)

 

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